टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

राजस्थान की बिजली कंपनी के PEKB कोल ब्लॉक पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सामुदायिक वन अधिकार मामले में केंद्र-छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस; माइनिंग पर रोक नहीं

Supreme Court Sets Aside Rajasthan HC Order on Stamp Duty, Says Actual Property Use Determines Value

नई दिल्ली। राजस्थान की बिजली कंपनी से जुड़े छत्तीसगढ़ के PEKB कोल ब्लॉक में माइनिंग और सामुदायिक वन अधिकार का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति और छह अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिका पर केंद्र, छत्तीसगढ़ सरकार, राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और सरगुजा की जिला स्तरीय वन अधिकार समिति को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

याचिका में छत्तीसगढ़ के घाटबर्रा गांव के सामुदायिक वन अधिकार को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

याचिकाकर्ताओं ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 21 अप्रैल 2026 के फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनकी अपील खारिज कर दी गई थी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की ओर से PEKB कोल ब्लॉक में चल रही माइनिंग पर फिलहाल कोई रोक नहीं लगाई है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि नोटिस जारी होने से राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की मौजूदा माइनिंग गतिविधियां प्रभावित नहीं होंगी।

मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की।

यह भी पढ़ें: राजस्थान की स्कूलों में चिप्स, कोल्ड ड्रिंक और जंक फूड पर सख्ती, हाईकोर्ट ने Gen-Z, Gen-Alpha और Gen-Beta के भविष्य को लेकर लिया स्वप्रेणा प्रसंज्ञान

सुप्रीम कोर्ट ने किनसे मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति और छह अन्य की याचिका पर केंद्र सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार, राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और सरगुजा की जिला स्तरीय वन अधिकार समिति को नोटिस जारी किया है।

याचिका में मुख्य मुद्दा घाटबर्रा गांव के लोगों के सामुदायिक वन अधिकार से जुड़ा है।

सु्प्रीम कोर्ट यह देखना चाहता है कि क्या इस मामले में ग्रामीणों के पास वास्तव में सामुदायिक वन अधिकार था।

अगर ऐसा अधिकार था, तो उसे लागू कराने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं, इस पर भी आगे विचार होगा।

यह भी पढ़ें: जोेजरी, बांडी और लूणी नदी बेसिन क्षेत्रों में नदी के किनारे से 100 मीटर के भीतर किसी भी प्रकार के निर्माण या विकास गतिविधि पर रोक- सुप्रीम कोर्ट

माइनिंग पर फिलहाल कोई रोक नहीं

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि नोटिस जारी होने से PEKB कोल ब्लॉक में चल रही माइनिंग गतिविधियां प्रभावित नहीं होंगी।

यानी राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की ओर से चल रही मौजूदा माइनिंग फिलहाल जारी रहेगी।

कोर्ट इस चरण में सामुदायिक वन अधिकार से जुड़े सवाल की जांच कर रहा है। माइनिंग रोकने का कोई आदेश अभी नहीं दिया गया है।

यह इसलिए अहम है क्योंकि याचिका में सामुदायिक वन अधिकार खत्म करने और उसके बाद PEKB में माइनिंग से जुड़ी मंजूरियों को लेकर भी आपत्ति जताई गई है।

यह भी पढ़ें: हाईकोर्ट भवन की दुर्दशा पर जिम्मेदारों को राजस्थान की किसी अदालत से नहीं मिलेगा अग्रिम संरक्षण, हाईकोर्ट ने पुलिस को भी दिया सख्त आदेश

घाटबर्रा गांव के वन अधिकार पर विवाद

घाटबर्रा गांव में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि गांव के लोगों को वन अधिकार अधिनियम के तहत सामुदायिक वन अधिकार दिए गए थे।

बाद में इन अधिकारों को रद्द किए जाने और PEKB कोल ब्लॉक में आगे की माइनिंग से जुड़ी मंजूरियों को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति और अन्य याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि सामुदायिक वन अधिकारों को खत्म करने और जंगल की जमीन से जुड़े फैसलों में वन अधिकार अधिनियम के जरूरी प्रावधानों का पालन नहीं किया गया।

उन्होंने ग्राम सभा की सहमति और वन अधिकारों की मान्यता से जुड़े नियमों को भी मुद्दा बनाया है।

PEKB कोल ब्लॉक से राजस्थान का कनेक्शन

इस मामले में राजस्थान कनेक्शन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि PEKB कोल ब्लॉक राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित है।

यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में चल रही माइनिंग से जुड़ा यह विवाद राजस्थान की बिजली व्यवस्था और उसकी सरकारी बिजली कंपनी से भी जुड़ जाता है।

PEKB यानी पारसा ईस्ट एंड कांते बासन कोल ब्लॉक में फेज-1 की माइनिंग पूरी हो चुकी है।

वहीं फेज-2 माइनिंग के लिए फरवरी 2022 में मंजूरी दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं ने इन्हीं बाद की मंजूरियों और वन अधिकारों से जुड़े फैसलों को भी चुनौती दी है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की थी याचिका

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 21 अप्रैल 2026 के फैसले के खिलाफ आया है।

हाईकोर्ट ने हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति और अन्य की अपील खारिज कर दी थी।

इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पहले सिंगल जज के 8 अक्टूबर 2025 के फैसले को बरकरार रखा था।

सिंगल जज ने पीईकेबी कोयला ब्लॉक में खनन से जुड़ी मंजूरियों को जारी रखने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद संघर्ष समिति और अन्य याचिकाकर्ता डिवीजन बेंच के सामने पहुंचे थे।

हाईकोर्ट ने कहा था कि जिन मामलों में पहले ही अंतिम फैसला हो चुका है, उन्हें किसी नए या अप्रत्यक्ष तरीके से दोबारा चुनौती नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट ने माना था कि पहले से तय हो चुके मामलों को किसी दूसरे रास्ते से दोबारा खोलने की कोशिश नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि एक ही मुद्दे को बार-बार या अलग तरीके से उठाकर फिर से चुनौती नहीं दी जा सकती।

इसी वजह से रेस ज्यूडिकाटा यानी पहले तय हो चुके मामले को दोबारा उठाने पर रोक और मुकदमे की अंतिमता का सिद्धांत लागू होता है।

याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा

हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पक्ष रखा।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अगर ग्रामीणों के सामुदायिक वन अधिकार मौजूद थे तो उन्हें खत्म करने से पहले वन अधिकार अधिनियम में तय सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना जरूरी था।

उन्होंने यह भी दलील दी कि जंगल से होने वाले पर्यावरणीय और सांस्कृतिक नुकसान की भरपाई सिर्फ पैसे से नहीं की जा सकती।

उनका जोर इस बात पर है कि आदिवासी समुदायों के पारंपरिक वन अधिकार और ग्राम सभा की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पुराने फॉरेस्ट क्लियरेंस भी बने मुद्दा

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि याचिकाकर्ताओं ने कुछ पुराने और अहम आदेशों को सीधे चुनौती नहीं दी थी।

इनमें 2011 और 2012 के फॉरेस्ट क्लियरेंस और 28 मार्च 2012 के राज्य सरकार के फॉरेस्ट डायवर्जन आदेश शामिल थे।

हाईकोर्ट के मुताबिक, जब किसी मूल आदेश को ही चुनौती नहीं दी गई तो उसके आधार पर बाद में लिए गए फैसलों को अलग से चुनौती नहीं दी जा सकती।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी।

अब सुप्रीम कोर्ट में विवाद का एक अहम पहलू सामुदायिक वन अधिकार को लेकर है।

अब सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या होगा

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह तय नहीं किया है कि घाटबर्रा गांव के लोगों का सामुदायिक वन अधिकार कानून के तहत कायम है या नहीं।

अब केंद्र सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार, राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और संबंधित वन अधिकार समिति को अपना जवाब देना होगा।

इसके बाद कोर्ट यह देखेगा कि घाटबर्रा के लोगों के पास सामुदायिक वन अधिकार था या नहीं। अगर यह अधिकार मौजूद था तो उसे लागू कराने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं, इस पर भी विचार होगा।

इस बीच PEKB कोल ब्लॉक में चल रही माइनिंग जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल माइनिंग रोकने का कोई आदेश नहीं दिया है।

यानी अभी इस मामले का राजस्थान की बिजली कंपनी की माइनिंग गतिविधियों पर सीधा असर नहीं पड़ा है।

आगे की तस्वीर संबंधित पक्षों के जवाब और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद साफ होगी।

सबसे अधिक लोकप्रिय