नई दिल्ली: राजस्थान में अतिक्रमण नहीं हटाने के एक मामले में तहसीलदार और पटवारी को विभागीय जांच पूरी होने तक सस्पेंड रखने के राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश के उस हिस्से को हटा दिया है, जिसमें दोनों अधिकारियों को विभागीय जांच पूरी होने तक सस्पेंड रखने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच जरूर चल सकती है, लेकिन जांच पूरी होने से पहले उन्हें सस्पेंड रखना अपने आप में जरूरी नहीं है।
हालांकि, अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच जारी रखने की अनुमति बरकरार रखी गई है।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि अधिकारियों की जिम्मेदारी और लापरवाही पहले विभागीय जांच में तय होनी चाहिए।
इसके बाद ही संबंधित डिसिप्लिनरी अथॉरिटी कानून के मुताबिक आगे की कार्रवाई कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट के 2 जुलाई 2026 के आदेश के पैराग्राफ 5 को हटा दिया।
इसी हिस्से में दोनों अधिकारियों को विभागीय कार्यवाही पूरी होने तक सस्पेंड रखने का निर्देश दिया गया था।
अतिक्रमण नहीं हटने पर हाईकोर्ट ने लिया था एक्शन
मामला राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच में चल रहे एक मामले से जुड़ा है। हाईकोर्ट के सामने लगातार यह बात आई कि जिस जमीन से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए थे, वहां अतिक्रमण दोबारा हो रहा है।
27 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के निआदेश दिए थे और कहा था कि अगर 30 अप्रैल तक अतिक्रमण नहीं हटाया गया तो आगे कार्रवाई की जाएगी।
इसके बाद 30 अप्रैल को तहसीलदार और पटवारी से इस बारे में जवाब मांगा गया था।
मामला 2 जुलाई को फिर हाईकोर्ट के सामने आया। तब नादौती, करौली के तहसीलदार दीन दयाल शर्मा और पटवारी भारत सिंह गुर्जर कोर्ट में मौजूद थे।
दोनों अधिकारियों ने माना कि मौके पर अतिक्रमण मौजूद है और इसे हटाने के लिए सात दिन का और समय मांगा।
इस पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों ने उसके आदेश को गंभीरता से नहीं लिया और अपनी ड्यूटी भी ठीक से नहीं निभाई।
इसके बाद हाईकोर्ट ने रेवेन्यू सेक्रेटरी को दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश दिया।
साथ ही हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि जांच पूरी होने तक दोनों अधिकारी सस्पेंड रहेंगे।
इसी सस्पेंशन को लेकर तहसीलदार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
सस्पेंशन से पहले गलती तय होना जरूरी
तहसीलदार दीन दयाल शर्मा ने हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का विभागीय जांच कराने का निर्देश गलत नहीं है।
अतिक्रमण हटाने के आदेश का पालन नहीं हुआ है तो अधिकारियों की भूमिका और लापरवाही की जांच की जा सकती है। इस हिस्से में सुप्रीम कोर्ट ने दखल नहीं दिया।
लेकिन सस्पेंशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अलग बात कही।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की गलती या जिम्मेदारी अभी विभागीय जांच में तय होनी बाकी है।
ऐसे में जांच पूरी होने तक उन्हें पहले से सस्पेंड रखने का निर्देश देना उचित नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अधिकारियों की गलती और उनकी जिम्मेदारी विभागीय जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर विभाग को तय करनी होगी।
इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 2 जुलाई के आदेश के पैरा 5 में दोनों अधिकारियों को जांच पूरी होने तक सस्पेंड रखने वाला निर्देश हटा दिया।
सस्पेंशन हटा, लेकिन जांच जारी रहेगी
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से दोनों अधिकारियों को अतिक्रमण मामले में क्लीन चिट नहीं मिली है।
विभागीय जांच जारी रहेगी और उसमें उनकी भूमिका और लापरवाही तय की जाएगी।
अगर जांच में उनकी गलती सामने आती है, तो विभाग उनके खिलाफ आगे कार्रवाई कर सकता है। जरूरत पड़ने पर जांच के दौरान सस्पेंड भी किया जा सकता है।
अब फैसला विभाग करेगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों अधिकारियों को पहले ही हाईकोर्ट के आदेश के आधार पर सस्पेंड किया गया है, तो विभाग उनके सस्पेंशन की समीक्षा करे।
यानी अतिक्रमण हटाने में लापरवाही की जांच जारी रहेगी, लेकिन सस्पेंशन का फैसला जांच और रिकॉर्ड के आधार पर जिम्मेदार विभाग को करना होगा।