नई दिल्ली: पुलिस की वर्दी पहनकर किए गए किसी भी काम को सरकारी ड्यूटी नहीं माना जा सकता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐसे ही मामले में SDM कोर्ट परिसर में एक शख्स को कथित तौर पर बंद कर पीटने के आरोपी पुलिस कांस्टेबल को राहत देने से इनकार कर दिया है।
जस्टिस रवि चिरानिया ने कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी और उसके खिलाफ चल रहा केस रद्द करने से इनकार कर दिया है।
हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस की वर्दी और सरकारी ड्यूटी का मतलब यह नहीं कि ड्यूटी के दौरान किया गया हर काम सरकारी काम मान लिया जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को बंद कर लाठी से पीटना पुलिस की आधिकारिक ड्यूटी का हिस्सा नहीं है, इसलिए मुकदमा चलाने से पहले सरकार से मंजूरी लेने की जरूरत भी नहीं थी।
दरअसल कांस्टेबल पर SDM कोर्ट परिसर में एक शख्स को कथित तौर पर बंद कर पीटने का आरोप था। उसने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि घटना के वक्त वह प्रदर्शन के दौरान अपनी ड्यूटी कर रहा था।
उसका कहना था कि वह दूसरे पुलिसकर्मियों के साथ वहां तैनात था और इसलिए CrPC की धारा 197 के तहत उसे सुरक्षा मिलनी चाहिए।
लेकिन हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद आरोपों और चोट की रिपोर्ट को देखते हुए इस दलील को नहीं माना।
हाईकोर्ट के सामने आरोप था कि शिकायतकर्ता को SDM कोर्ट परिसर में बंद किया गया और उसे डंडे से बुरी तरह पीटा गया।
हाईकोर्ट ने माना कि अगर कोई पुलिसकर्मी ड्यूटी के दौरान ऐसा काम करता है जो उसकी आधिकारिक ड्यूटी से जुड़ा नहीं है, तो सिर्फ पुलिसकर्मी होने के आधार पर उसे कानूनी सुरक्षा नहीं मिल सकती।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी।
2018 में दर्ज हुई थी कांस्टेबल के खिलाफ FIR
मामला 2018 का है। शिकायतकर्ता एक सोशल वर्कर था। उसने आरोप लगाया था कि उसे जबरन पुलिस स्टेशन ले जाया गया और उसके साथ मारपीट की गई।
5 अक्टूबर 2018 को कांस्टेबल के खिलाफ FIR दर्ज हुई। इसमें गलत तरीके से रोकने, मारपीट, गंभीर चोट पहुंचाने, गाली देने और सरकारी आदेश की अवहेलना से जुड़ी धाराएं लगाई गई थीं।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसे जबरन पुलिस थाने ले जाया गया और उसके साथ मारपीट की गई। इस घटना के बाद पुलिस कार्रवाई के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन भी हुआ था।
जांच के बाद पुलिस ने मामले में नेगेटिव फाइनल रिपोर्ट पेश कर दी थी।
हालांकि, शिकायतकर्ता ने इसे स्वीकार नहीं किया और ट्रायल कोर्ट में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल कर दी।
ट्रायल कोर्ट से नहीं मिली राहत
ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद 1 फरवरी 2020 को मामले में संज्ञान ले लिया।
ट्रायल कोर्ट ने कांस्टेबल के खिलाफ गलत तरीके से रोकने, मारपीट और गंभीर चोट पहुंचाने जैसे आरोपों पर आगे कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया।
कांस्टेबल ने इस आदेश को रिविजन कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली।
इसके बाद कांस्टेबल ने हाईकोर्ट का रुख किया।
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कांस्टेबल ने सरकारी ड्यूटी पर होने की दलील दी
राजस्थान हाईकोर्ट में कांस्टेबल ने सरकारी ड्यूटी पर होने की दलील दी।
उसने कहा कि घटना के समय उसकी पोस्टिंग उसी जगह थी और वह दूसरे पुलिसकर्मियों के साथ कानून-व्यवस्था की ड्यूटी कर रहा था।
कांस्टेबल का कहना था कि प्रदर्शन के दौरान वह अपनी सरकारी जिम्मेदारी निभा रहा था। ऐसे में उसके खिलाफ केस चलाने से पहले CrPC की धारा 197 के तहत सरकार से मंजूरी लेना जरूरी थी।
उसने यह भी दावा किया कि उसे अकेले निशाना बनाया गया और झूठे आरोप में फंसाया गया।
मारपीट सरकारी ड्यूटी का हिस्सा नहीं
राजस्थान हाईकोर्ट ने कांस्टेबल की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद आरोपों और मेडिकल रिपोर्ट को देखा।
हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता को SDM कोर्ट परिसर में बंद करने और उसके साथ मारपीट करने का आरोप कांस्टेबल पर सीधे लगाया गया था। रिकॉर्ड में चोट की रिपोर्ट भी मौजूद थी।
हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि उस समय प्रदर्शन कांस्टेबल के भाई के खिलाफ हो रहा था, जो खुद पुलिसकर्मी था। लेकिन शिकायतकर्ता ने दूसरे पुलिसकर्मियों पर ऐसा आरोप नहीं लगाया था।
इन बातों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि कांस्टेबल ने जो किया, उसे उसकी सरकारी ड्यूटी का हिस्सा नहीं कहा जा सकता।
यानी सिर्फ यह कहना कि घटना के समय पुलिसकर्मी ड्यूटी पर था, उसे हर कथित अपराध में कानूनी सुरक्षा देने के लिए पर्याप्त नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सुनीति तोतेजा बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले का भी सहारा लिया।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले मंजूरी की जरूरत से जुड़े नियम को समझाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि CrPC की धारा 197 की सुरक्षा तभी लागू हो सकती है, जब जिस काम को लेकर केस हुआ है, उसका सरकारी ड्यूटी से सीधा संबंध हो।
अगर आरोपित काम सरकारी जिम्मेदारी से अलग है, तो केवल सरकारी कर्मचारी होने के कारण उसे इस सुरक्षा का फायदा नहीं दिया जा सकता।
धारा 197 की सुरक्षा देने से हाईकोर्ट का इनकार
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने पुराने फैसले गुलाब सिंह बनाम राजस्थान सरकार का भी हवाला दिया।
इसमें कहा गया था कि किसी सरकारी कर्मचारी को धारा 197 की सुरक्षा तभी मिल सकती है, जब जिस काम को लेकर उसके खिलाफ केस चल रहा है, वह उसकी सरकारी ड्यूटी से जुड़ा हो।
इस मामले में हाईकोर्ट ने माना कि किसी शख्स को SDM कोर्ट परिसर में बंद करके पीटना कांस्टेबल की सरकारी ड्यूटी का हिस्सा नहीं था।
इसलिए CrPC की धारा 197 की सुरक्षा यहां लागू नहीं होगी और उसके खिलाफ आपराधिक केस चलाने के लिए पहले सरकार से मंजूरी लेना जरूरी नहीं था।
अब कांस्टेबल के खिलाफ केस चलेगा
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और रिविजन कोर्ट के आदेशों में कोई कानूनी गलती नहीं पाई और कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी।
यानी उसके खिलाफ ट्रायल कोर्ट में शुरू हुई आपराधिक कार्रवाई जारी रहेगी और मामला आगे चलेगा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अभी कांस्टेबल को दोषी नहीं माना है। उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं, यह ट्रायल के दौरान तय होगा।
इस फैसले से साफ कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सिर्फ सरकारी ड्यूटी पर तैनात होने से पुलिसकर्मी को हर काम के लिए कानूनी सुरक्षा नहीं मिल जाती।
अगर आरोपित काम उसकी सरकारी ड्यूटी का हिस्सा नहीं है, तो केस चलाने के लिए धारा 197 के तहत पहले सरकारी मंजूरी जरूरी नहीं होगी।