जोधपुर। जमानत की अर्जी दाखिल होने के बाद सिर्फ केस डायरी का इंतजार करते हुए सुनवाई में 15 से 20 दिन लग जाएं, तो इसका सीधा असर आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर पड़ता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने जमानत मामलों में होने वाली इसी देरी को कम करने के लिए अहम दिशा-निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि खासकर छोटे और सामान्य अपराधों में जमानत अर्जी पर सुनवाई के लिए हर बार पूरी केस डायरी मंगाने की जरूरत नहीं है।
शुरुआत में FIR से जुड़े जरूरी तथ्यों की फैक्टुअल रिपोर्ट मंगाकर भी मामले की स्थिति समझी जा सकती है।
अगर शुरुआती रिपोर्ट से मामला समझ में आ जाता है, तो सिर्फ केस डायरी के इंतजार में सुनवाई आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं होगी। इससे उस व्यक्ति को भी राहत मिल सकती है, जो जमानत मिलने तक जेल में रह रहा है।
जस्टिस रवि चिरानिया ने निर्देश दिया कि संबंधित पुलिस थाने से यह फैक्टुअल रिपोर्ट 3 से 7 दिन के भीतर मंगाने की कोशिश की जाए। इससे पहली सुनवाई के समय ही कोर्ट के पास मामले से जुड़ी जरूरी जानकारी उपलब्ध हो सकेगी।
हाईकोर्ट की इस पहल का मकसद जमानत की प्रक्रिया में होने वाली अनावश्यक देरी को कम करना है।
अभी जमानत में कहां हो रही है देरी?
हाईकोर्ट ने जमानत मामलों में चल रही प्रक्रिया पर गौर किया तो सामने आया कि अर्जी दाखिल होने के बाद भी सुनवाई तुरंत नहीं हो पाती। कई मामलों में पहली सुनवाई तक ही करीब 4-5 दिन लग जाते हैं।
इसके बाद कोर्ट की ओर से केस डायरी मंगाई जाती है। पुलिस से डायरी आने और उसे कोर्ट के रिकॉर्ड का हिस्सा बनने में भी समय लगता है। इस वजह से जमानत अर्जी पर फैसला होने में कई बार 15-20 दिन तक का समय निकल जाता है।
हाईकोर्ट ने माना कि हर मामले में इतनी लंबी प्रक्रिया जरूरी नहीं है। अगर FIR और दूसरी जरूरी जानकारी फैक्टुअल रिपोर्ट में मिल जाती है, तो उसी आधार पर जमानत अर्जी पर शुरुआती सुनवाई की जा सकती है।
यानी जरूरत पूरी केस डायरी की हो तभी उसे मंगाया जाए। सिर्फ रिकॉर्ड आने में लगने वाले समय की वजह से जमानत की सुनवाई को लंबा नहीं खींचा जाना चाहिए।
अब 3-7 दिन में फैक्टुअल रिपोर्ट देने की कोशिश
हाईकोर्ट ने GA-cum-AAG कार्यालय को निर्देश दिया है कि जमानत अर्जी दाखिल होने के बाद संबंधित पुलिस थाने को इसकी जानकारी दी जाए।
हाईकोर्ट ने कोशिश करने को कहा है कि पुलिस से 3 से 7 दिन के भीतर फैक्टुअल रिपोर्ट मिल जाए और इसे पहली सुनवाई के समय कोर्ट के सामने रखा जा सकेगा।
इससे जमानत अर्जी पर विचार करने के लिए जरूरी शुरुआती जानकारी पहले ही उपलब्ध हो जाएगी।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में केस डायरी की जरूरत खत्म हो जाएगी।
अगर कोर्ट को फैक्टुअल रिपोर्ट से पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती या मामले की गंभीरता को देखते हुए पूरी केस डायरी जरूरी लगती है, तो उसे मंगाया जा सकेगा।
यानी नई व्यवस्था का मकसद केस डायरी को हटाना नहीं, बल्कि जहां इसकी जरूरत न हो, वहां सिर्फ उसके इंतजार में जमानत की सुनवाई में देरी से बचना है।
पुलिस से होने वाली बातचीत का रिकॉर्ड रखना होगा
हाईकोर्ट ने GA-cum-AAG कार्यालय को पुलिस थानों के साथ होने वाले कम्युनिकेशन का रिकॉर्ड रखने का भी निर्देश दिया है।
इससे यह पता चल सकेगा कि जमानत अर्जी की जानकारी पुलिस को कब दी गई और फैक्टुअल रिपोर्ट के लिए क्या कार्रवाई हुई।
इस तरह अब कोशिश होगी कि जमानत अर्जी के बाद शुरुआती 3-7 दिनों में जरूरी तथ्य कोर्ट तक पहुंच जाएं।
अगर इन्हीं तथ्यों से जमानत पर विचार किया जा सकता है, तो सिर्फ केस डायरी के इंतजार में सुनवाई को लंबा खींचने की जरूरत नहीं होगी। वहीं जरूरत पड़ने पर कोर्ट पूरी केस डायरी भी मंगा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में जल्द सुनवाई की जरूरत को लेकर सुप्रीम कोर्ट के Sunny Chauhan बनाम State of Haryana के फैसले का भी संदर्भ दिया।
हाईकोर्ट ने माना कि जमानत की सुनवाई में देरी का असर सीधे उस व्यक्ति पर पड़ता है जो हिरासत में है।
इसलिए जहां पूरी केस डायरी के बिना भी शुरुआती तौर पर मामला समझा जा सकता है, वहां अनावश्यक इंतजार से बचने की कोशिश होनी चाहिए।
छोटे अपराधों में ज्यादा मदद की उम्मीद
नई व्यवस्था का फायदा खास तौर पर छोटे अपराधों से जुड़े जमानत मामलों में ज्यादा हो सकता है।
ऐसे मामलों में FIR में दर्ज आरोप और आरोपी की भूमिका जैसी शुरुआती जानकारी से कोर्ट को जमानत पर विचार करने में मदद मिल सकती है।
हाईकोर्ट का जोर इस बात पर है कि केवल रिकॉर्ड मंगाने की प्रक्रिया के कारण जमानत की सुनवाई अनावश्यक रूप से आगे न बढ़े। हर मामले में फैसला उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही होगा।