जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में अहम फैसला सुनाया और पति की तलाक अर्जी मंजूर करते हुए 22 साल पुरानी शादी खत्म कर दी है।
हाईकोर्ट ने पत्नि द्वारा लंबे समय तक वैवाहिक संबंध और साथ रहने से इनकार करना और पति के खिलाफ झूठा आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने को मानसिक क्रूरता माना।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को भी रद्द कर दिया, जिसमें पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी।
जस्टिस इंदरजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की डिवीजन बेंच ने कहा कि इस मामले में पति-पत्नी के बीच वैवाहिक रिश्ता बहुत पहले ही खत्म हो चुका है। दोनों 2010 से अलग रह रहे हैं और अब उनके दोबारा साथ आने की कोई उम्मीद नहीं है।
हाईकोर्ट ने 29 अप्रैल 2004 को हुई शादी को खत्म करते हुए तलाक की डिक्री जारी करने का आदेश दे दिया।
ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दी थी पति की तलाक याचिका
मामला पति मनोज कुमार यादव और उनकी पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा था। दोनों की शादी को करीब 22 साल हो चुके थे, लेकिन वैवाहिक जीवन लंबे समय से सामान्य नहीं था।
पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक की मांग करते हुए ट्रायल कोर्ट में याचिका दायर की थी। उसने पत्नी पर मानसिक क्रूरता और उसे छोड़कर चले जाने का आरोप लगाया था।
पति का कहना था कि पत्नी उसके और उसके परिवार के साथ ठीक व्यवहार नहीं करती थी। उसने आत्महत्या करने और पति को झूठे आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी भी दी थी।
पति ने यह भी कहा कि पत्नी ने शादी के बाद उसके साथ वैवाहिक संबंध बनाने से इनकार किया और बाद में उसे छोड़कर अलग रहने लगी।
पत्नी ने पति के आरोपों से इनकार किया। उसने आरोप लगाया कि पति ने उसके साथ मारपीट की और दहेज की मांग की। पत्नी ने यह भी कहा कि वह पति के साथ रहने के लिए तैयार थी।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ट्रायल कोर्ट ने पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद पति ने इस फैसले के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।
पत्नी ने माना, शादी के एक साल बाद से नहीं रहा संबंध
मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी ने इन आरोपों से इनकार किया। लेकिन उसने ये भी स्वीकार किया कि दोनों के बीच शादी के कुछ समय बाद से ही वैवाहिक संबंध नहीं थे।
हाईकोर्ट ने पत्नी के इस बयान पर भी विशेष रूप से गौर किया।
जिरह के दौरान पत्नी ने माना था कि 2004 में शादी के करीब एक साल बाद से दोनों के बीच वैवाहिक संबंध नहीं रहे थे। पति ने भी कहा था कि पत्नी ने 2005 से साथ रहने से इनकार किया।
लंबे समय से वैवाहिक संबंध ना होने को भी क्रूरता माना
हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में लंबे समय तक बिना उचित कारण के पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध न होना भी मानसिक क्रूरता के दायरे में आ सकता है।
हाईकोर्ट ने माना कि मनोज और उनकी पत्नी भी इतने लंबे समय से अलग है और पत्नी का पति के साथ वैवाहिक संबंध नहीं रखना सामान्य वैवाहिक जीवन नहीं कहा जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस मामले में पत्नि लगातार साथ रहने से इनकार करने को पति के प्रति क्रूरता माना।
हाईकोर्ट ने माना- मानसिक क्रूरता सिर्फ मारपीट नहीं
हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी हवाला दिया।
इनमें साफ कहा गया है कि क्रूरता सिर्फ मारपीट या शारीरिक परेशानी तक सीमित नहीं है। किसी पति या पत्नी को लगातार मानसिक तनाव देना, लंबे समय तक वैवाहिक संबंध से दूर रखना या ऐसी परिस्थितियां पैदा करना जिनसे वैवाहिक जीवन पूरी तरह टूट जाए, मानसिक क्रूरता के दायरे में आ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि बिना किसी उचित वजह के लंबे समय तक वैवाहिक संबंध बनाने से एकतरफा इनकार करना मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।
यानी क्रूरता साबित करने के लिए हर मामले में शारीरिक हिंसा होना जरूरी नहीं है। रिश्ते में लगातार ऐसा व्यवहार भी महत्वपूर्ण हो सकता है, जिससे दूसरे पक्ष के लिए शादी को निभाना मुश्किल हो जाए।
पत्नी के झूठे आपराधिक केस में बरी हो चुका था पति
मामले में पत्नी ने मनोज कुमार और उनके परिवार के खिलाफ 498-A और 406 IPC के तहत आपराधिक केस भी दर्ज कराया था। हालांकि इस केस में मनोज कुमार को 2 सितंबर 2015 को बरी कर दिया गया था।
पति ने हाईकोर्ट में इस झूठे केस और बरी होने के फैसले को भी अपने पक्ष में रखा।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद माना कि इस मामले में पत्नी की ओर से पति के खिलाफ झूठा आपराधिक केस दर्ज कराना भी उसके प्रति क्रूरता है।
हाईकोर्ट ने माना कि अगर पति के खिलाफ लगाए गए आपराधिक आरोप झूठे पाए गए हैं और ऐसी कार्रवाई ने उसे मानसिक परेशानी और सामाजिक नुकसान पहुंचाया है, तो परिस्थितियों के आधार पर इसे भी मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।
हालांकि, कोर्ट ने सिर्फ केस दर्ज होने को क्रूरता नहीं माना। पूरे वैवाहिक विवाद, लंबे अलगाव, साथ रहने से इनकार और आपराधिक मामले समेत सभी परिस्थितियों को एक साथ देखकर फैसला सुनाया।
लंबे समय तक साथ न रहना भी बना अहम आधार
हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि पति-पत्नी 2010 से अलग रह रहे हैं। यानी अलगाव कुछ महीनों या कुछ सालों की बात नहीं थी, बल्कि काफी लंबा समय बीत चुका था और वैवाहिक जीवन लगभग खत्म हो चुका था।
हाईकोर्ट ने माना कि अब दोनों के बीच दोबारा साथ रहने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे में दोनों को फिर से साथ रहने के लिए मजबूर करना भी ठीक नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब वैवाहिक रिश्ता पूरी तरह टूट चुका हो और दोबारा साथ आने की कोई संभावना न हो, तो ऐसे रिश्ते को केवल कानूनी तौर पर बनाए रखना भी क्रूरता की स्थिति पैदा कर सकता है।
ट्रायल कोर्ट का फैसला बदला, पति को तलाक दिया
हाईकोर्ट ने इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखते हुए ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को सही नहीं माना, जिसमें पति की ओर से बताई गई क्रूरता को साबित नहीं माना गया था।
हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने पति के खिलाफ क्रूरता के आरोपों को सही तरीके से नहीं परखा था।
डिवीजन बेंच ने पति की अपील मंजूर कर ली और ट्रायल कोर्ट का 12 सितंबर 2018 का फैसला रद्द कर दिया।
इसके साथ ही 29 अप्रैल 2004 को हुई मनोज कुमार यादव और सरोज देवी की शादी को खत्म करते हुए तलाक की डिक्री जारी करने का आदेश दिया।
