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‘स्पीडी ट्रायल’ केवल आरोपी का ही नहीं, पीड़ित का भी संवैधानिक अधिकार, 7 साल से हत्या के पेंडिंग मुकदमे को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट सख्त

Rajasthan High Court: Speedy Trial is a Constitutional Right of Victims Too, Orders Day-to-Day Hearing in 7-Year-Old Murder Case

हत्या के मुकदमे की प्रतिदिन सुनवाई कर अगले दो माह में निस्तारण के आदेश, अनावश्यक स्थगन भी नहीं दिया जा सकेगा।

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा हत्या जैसे गंभीर मुकदमों की सुनवाई को लेकर अपनाए जा रहे तरीके को लेकर अहम फैसला सुनाया है

राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर बेंच ने करीब 7 साल से अधिक समय से पेंडिंग एक हत्या के मुकदमे की ट्रायल को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है

राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई प्रतिदिन करने और अगले दो माह में मुकदमे का निस्तारण करने का आदेश देते हुए कहा है कि त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) का अधिकार केवल आरोपी तक सीमित नहीं है, बल्कि अपराध के पीड़ित को भी मुकदमे के शीघ्र निस्तारण का संवैधानिक अधिकार है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया है कि अनावश्यक स्थगन दिए बिना मामले का निस्तारण प्राथमिकता से करे।

स्पीडी ट्रायल” केवल आरोपी का अधिकार नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि “स्पीडी ट्रायल” केवल आरोपी का अधिकार नहीं, बल्कि पीड़ित के न्याय पाने के अधिकार का भी अहम हिस्सा है।

अदालतों को निष्पक्ष सुनवाई और समयबद्ध न्याय के बीच संतुलन बनाते हुए अनावश्यक देरी को रोकना होगा।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट बीरबल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है

मामला वर्ष 2019 में दर्ज एक हत्या के मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें मुकदमा सात वर्ष से अधिक समय से लंबित है।

2019 के हत्या मामले में 7 साल से लंबित था ट्रायल

याचिकाकर्ता/शिकायतकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आपराधिक मामले के शीघ्र और समयबद्ध निस्तारण की मांग की थी।

मामला कोटपूतली थाने में 1 जुलाई 2019 को दर्ज मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें आईपीसी की धाराओं 147, 148, 149, 341 और 302 के तहत मामला दर्ज हुआ था।

याचिका में कहा गया कि मुकदमे की सुनवाई काफी आगे बढ़ चुकी है। अभियोजन साक्ष्य पूरे हो चुके हैं, आरोपियों के बयान दर्ज हो चुके हैं और बचाव पक्ष के साक्ष्य भी बंद हो चुके हैं।

याचिका में कहा गया कि मामला अंतिम बहस के चरण में पहुंच चुका था, लेकिन इसके बावजूद ट्रायल लंबित रहा।

आरोपियों पर देरी की रणनीति अपनाने का आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि अंतिम बहस के चरण में पहुंचने के बाद भी विभिन्न कारणों से स्थगन मांगे गए।

आदेश के अनुसार, आरोपियों की ओर से गवाहों को दोबारा बुलाने के लिए धारा 311 सीआरपीसी के तहत आवेदन भी दायर किया गया था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने 27 फरवरी 2026 को खारिज कर दिया था।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए कहा कि मुकदमा अंतिम चरण में पहुंच चुका है और सात साल से अधिक समय से लंबित आपराधिक कार्यवाही को अब और लंबा नहीं खींचा जाना चाहिए।

पीड़ित का भी है स्पीडी ट्रायल का अधिकार

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में सबसे अहम टिप्पणी की कि अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।

न्याय में अनावश्यक देरी केवल आरोपी ही नहीं, बल्कि पीड़ित, गवाहों और पूरे समाज को प्रभावित करती है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले Keshvendra Singh vs. Shankar Singh and Another, 2026 INSC 866 का भी उल्लेख किया और कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार केवल आरोपी का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि पीड़ित का भी महत्वपूर्ण अधिकार है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि लंबे समय तक मुकदमे लंबित रहने से पीड़ित को मानसिक पीड़ा, अनिश्चितता और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

रोजाना सुनवाई, अनावश्यक तारीखों पर रोक

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि त्वरित सुनवाई का अर्थ आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को समाप्त करना नहीं है। आरोपी को कानून के तहत उपलब्ध वैध प्रक्रियात्मक अधिकारों का पूरा लाभ मिलना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि हालांकि, यदि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो कि केवल मुकदमे में देरी करने के उद्देश्य से अनावश्यक या बाधक तरीके अपनाए जा रहे हैं, तो अदालत मूकदर्शक नहीं रह सकती।

दो महीने में ट्रायल पूरा करने का निर्देश

याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि मामले की दिन-प्रतिदिन सुनवाई की जाए और किसी भी पक्ष को अनावश्यक या नियमित स्थगन न दिया जाए।

अदालत ने आदेश दिया कि फैसले की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से अधिमानतः दो महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने के लिए हरसंभव प्रयास किए जाएं।

साथ ही, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से आरोपी या अभियोजन पक्ष के कानूनन उपलब्ध किसी भी वैध अधिकार पर रोक नहीं लगेगी।

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