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दो साल बाद पुराने बिजली बकाये पर नहीं काट सकते कनेक्शन, सुप्रीम कोर्ट ने बताया नियम; बिलों में लगातार बकाया दिखाना जरूरी

Electricity Connection Cannot Be Cut for Old Dues After Two Years, Supreme Court Clarifies Rule

नई दिल्ली: अगर किसी उपभोक्ता पर बिजली का पुराना बकाया है, तो बिजली कंपनी दो साल बाद सिर्फ उस बकाये के आधार पर उसका कनेक्शन नहीं काट सकती, अगर वह रकम पिछले बिलों में लगातार बकाये के तौर पर नहीं दिखाई गई हो।

सुप्रीम कोर्ट ने बिजली के पुराने बकाये पर कार्रवाई की समय-सीमा को लेकर अहम फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि दो साल से अधिक पुरानी रकम की वसूली तभी हो सकती है, जब वह लगातार आने वाले बिजली बिलों में बकाया के तौर पर दर्ज होती रही हो।

अगर कंपनी ने वर्षों तक अपने बिलों में उस रकम का कोई जिक्र नहीं किया और अचानक कई साल बाद बड़ी रकम का बिल भेज दिया, तो ऐसी वसूली पर रोक लगेगी।

जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने यह फैसला दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए दिया।

बिजली कंपनी ने एक उपभोक्ता से करीब 57.74 लाख रुपये की मांग की थी। यह रकम 1998 की अवधि से जुड़ी थी, लेकिन इसकी मांग करीब 9 साल बाद 2007 में अचानक की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिजली कंपनी कई साल बाद किसी पुराने बकाये को पहली बार बिल में जोड़कर उसके आधार पर बिजली नहीं काट सकती। अगर पुरानी रकम का बकाया बना हुआ है, तो उसे लगातार जारी होने वाले बिलों में दिखाना जरूरी है।

उपभोक्ता को 9 साल बाद भेज दिया 57 लाख का बिल

मामला दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड और उसके एक उपभोक्ता से जुड़ा था।

उपभोक्ता ने 4000 KVA बिजली लोड के लिए आवेदन किया था। उस समय बिजली उपलब्ध नहीं होने के कारण कंपनी ने उसे पहले 2000 KVA लोड ही दिया था।

बाद में बिजली कंपनी ने कहा कि अब वह बाकी 2000 KVA लोड भी उपलब्ध करा सकती है। इसके लिए 31 जनवरी 1998 को उपभोक्ता को अतिरिक्त लोड लेने की पेशकश की गई।

हालांकि, उपभोक्ता ने 14 सितंबर 1998 को अतिरिक्त लोड लेने में रुचि नहीं होने की बात कही। रिकॉर्ड में ऐसा भी नहीं था कि यह अतिरिक्त 2000 KVA लोड वास्तव में उपभोक्ता को उपलब्ध कराया गया था।

इसके बावजूद बिजली कंपनी ने अचानक करीब नौ साल बाद 13 फरवरी 2007 को फरवरी 1998 से सितंबर 1998 की अवधि के लिए उपभोक्ता से 57,74,164 रुपये के न्यूनतम खपत गारंटी शुल्क की मांग कर दी।

कंपनी का कहना था कि अतिरिक्त लोड उपलब्ध कराने की पेशकश के बावजूद उपभोक्ता ने उसे नहीं लिया, इसलिए उस अवधि का न्यूनतम खपत गारंटी शुल्क उसे देना होगा।

बिजली लोकपाल ने कंपनी की मांग रद्द की

उपभोक्ता ने 13 फरवरी 2007 की इस मांग को चुनौती दी। मामला पहले कंज्यूमर ग्रीवांस रिड्रेसल फोरम और फिर इलेक्ट्रिसिटी ओम्बड्समैन तक पहुंचा।

इलेक्ट्रिसिटी ओम्बड्समैन ने बिजली कंपनी की मांग को रद्द कर दिया। उसने माना कि उपभोक्ता ने अतिरिक्त 2000 KVA लोड लेने के लिए सहमति नहीं दी थी।

रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं था कि बिजली कंपनी ने अतिरिक्त 2000 KVA लोड वास्तव में उपभोक्ता को दिया था। बिजली लोकपाल ने यह भी माना कि 2007 में की गई 57.74 लाख रुपये की मांग Electricity Act की धारा 56(2) में तय दो साल की सीमा से बाहर थी।

हाईकोर्ट ने भी कंपनी को राहत नहीं दी

बिजली कंपनी ने ओम्बड्समैन के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने भी कंपनी की याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त 2000 KVA लोड के लिए 1998 में नियमित बिजली बिलों के साथ कोई अलग बिल नहीं भेजा गया था। साथ ही, ऐसा कोई रिकॉर्ड भी नहीं था जिससे पता चले कि इस रकम को लगातार बकाया मानकर आगे के बिलों में दिखाया जाता रहा।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि संबंधित रकम 1998 में ही बकाया हुई थी। ऐसे में 2007 में पहली बार उसकी मांग करना समय-सीमा के लिहाज से सही नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 56(2) का मतलब समझाया

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपने पुराने फैसले Assistant Engineer (D1), Ajmer Vidyut Vitran Nigam Limited बनाम Rahamatullah Khan का भी हवाला दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने समझाया कि बिजली का बिल जारी होने के बाद ही संबंधित रकम उपभोक्ता के लिए पहली बार बकाया मानी जाती है।

Electricity Act की धारा 56(2) में दो साल की सीमा तय है। इसके तहत दो साल बीतने के बाद बिजली कंपनी बकाये के आधार पर बिजली काटने की कार्रवाई नहीं कर सकती, अगर वह रकम पिछले बिलों में लगातार बकाये के तौर पर दिखाई नहीं गई है।

सिर्फ रिकॉर्ड में बकाया काफी नहीं, बिल में लगातार दिखाना जरूरी

इस फैसले का एक अहम पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि दो साल बीतने के बाद हर तरह की वसूली पूरी तरह खत्म हो जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बिजली कंपनियों के लिए स्थिति साफ कर दी। कोर्ट ने अपने पुराने फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 56(2) बिजली सप्लाई काटने के अधिकार को सीमित करती है।

कंपनी बाद में यह कहकर पुरानी रकम नहीं मांग सकती कि वह पहले से उपभोक्ता के खाते में बकाया थी। अगर कंपनी उस रकम को वसूल करना चाहती है तो उसे नियमित बिलों में लगातार उसका बकाया दिखाना होगा।

ऐसा रिकॉर्ड नहीं होने पर दो साल से पुरानी रकम की वसूली पर धारा 56(2) की रोक लागू होगी।

यानी बिजली कंपनी कई साल बाद अचानक किसी पुराने बकाये को सामने रखकर बिजली नहीं काट सकती। उसे यह भी दिखाना होगा कि संबंधित रकम पहले के बिलों में लगातार बकाये के रूप में दर्ज थी।

57.74 लाख की मांग वाली कंपनी की अपील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस मामले में 1998 की रकम की मांग पहली बार 13 फरवरी 2007 को की गई थी। रिकॉर्ड में यह नहीं था कि 1998 के बाद के बिलों में इस रकम को लगातार बकाया दिखाया गया हो।

इसके अलावा, उपभोक्ता ने अतिरिक्त 2000 KVA लोड स्वीकार नहीं किया था और बिजली कंपनी ने यह भी नहीं बताया कि अतिरिक्त लोड वास्तव में उसे उपलब्ध कराया गया था।

इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने बिजली कंपनी की अपील खारिज कर दी।

इसका सीधा मतलब यह रहा कि 1998 के बकाये के लिए 2007 में भेजी गई 57.74 लाख रुपये की मांग को वसूला नहीं जा सकेगा।

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