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CISF अनुशासित बल, जानबूझकर या बिना अनुमति लंबे समय तक अनुपस्थित रहना गंभीर कदाचार-हाईकेार्ट ने CISF कांस्टेबल बर्खास्तगी को रखा बरकरार

Rajasthan HC Upholds CISF Constable’s Removal from Service Over Unauthorized Absence

मां की बीमारी की सूचना पर घर गया, तीन महीने की अनधिकृत अनुपस्थिति पर पर हटाया गया सेवा से

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने CISF से जुड़े एक कांस्टेबल को सेवा से हटाने के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आर्मी द्वारा कास्टेबल को हटाने के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में केहा कि CISF एक अनुशासित बल है और इसमें जानबूझकर तथा बिना अनुमति लंबे समय तक अनुपस्थित रहना गंभीर कदाचार माना जाता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता कांस्टेबल के खिलाफ विभागीय जांच निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुई थी और उसे जांच रिपोर्ट पर अपनी आपत्ति रखने का अवसर भी दिया गया था। ऐसे में सेवा से हटाने की सजा को न तो अत्यधिक और न ही असंगत माना जा सकता है।

जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश शीशराम की ओर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.

2009 में CISF में कांस्टेबल के पद पर हुई थी नियुक्ति

याचिकाकर्ता शीश राम की नियुक्ति 31 अक्टूबर 2009 को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में कांस्टेबल (G.D.) के पद पर हुई थी।

वर्ष 2012 में वह अस्वस्थ होने के कारण यूनिट लाइन में मेडिकल रेस्ट पर था।

इसी दौरान उसे अपनी मां के गंभीर रूप से बीमार होने की सूचना मिली।

याचिकाकर्ता के अनुसार, आपात परिस्थितियों में वह अधिकारियों से अनुमति लिए बिना अपने घर चला गया। इसके बाद वह स्वयं भी बीमार हो गया और उसका इलाज चला।

विभाग ने उसकी अनुपस्थिति को अनधिकृत और जानबूझकर की गई अनुपस्थिति माना।

इसके बाद CISF Rules, 2001 के Rule 36 के तहत आरोप-पत्र जारी किया गया। इसमें मुख्य रूप से जानबूझकर अनुपस्थित रहने और असंतोषजनक प्रदर्शन से संबंधित दो आरोप लगाए गए।

विभागीय नोटिस के बावजूद ड्यूटी पर नहीं लौटने का आरोप

केन्द्र सरकार की ओर से अधिवक्त दिव्येश माहेश्वरी ने अदालत में बताया गया कि याचिकाकर्ता बिना पूर्व अनुमति या अवकाश स्वीकृत कराए अचानक ड्यूटी से अनुपस्थित हुआ।

उसे ड्यूटी पर वापस लौटने के लिए कई नोटिस जारी किए गए, लेकिन वह न तो ड्यूटी पर वापस आया और न ही पर्याप्त स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया।

केन्द्र के अनुसार, आरोप-पत्र की एक प्रति उसके घर पंजीकृत डाक से भेजी गई और दूसरी प्रति 26 मार्च 2013 को उसके पिता को व्यक्तिगत रूप से दी गई। इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने आरोप-पत्र का जवाब नहीं दिया।

इसके बाद जांच अधिकारी नियुक्त किया गया।

जांच अधिकारी ने भी याचिकाकर्ता को उसके घोषित घर के पते पर कई नोटिस भेजे, लेकिन वह जांच में शामिल नहीं हुआ।

इसके परिणामस्वरूप एकतरफा (ex parte) विभागीय जांच की गई। दस्तावेज रिकॉर्ड पर लिए गए और संबंधित गवाहों के बयान दर्ज किए गए। जांच अधिकारी ने 5 जून 2013 को अपनी रिपोर्ट अनुशासनात्मक प्राधिकारी को सौंप दी।

जांच रिपोर्ट मिलने के बाद भी नहीं दिया जवाब

याचिकाकर्ता की ओर से मुख्य आपत्ति यह थी कि जांच रिपोर्ट उसे दंड आदेश पारित होने के बाद दी गई, जिससे उसे रिपोर्ट के निष्कर्षों के खिलाफ अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिला और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।

हालांकि, विभाग ने रिकॉर्ड के आधार पर बताया कि जांच रिपोर्ट की प्रति 6 जून 2013 को पंजीकृत डाक से याचिकाकर्ता को भेजी गई थी, लेकिन डाक वापस लौट आई।

इसके बाद 30 जून 2013 को जांच रिपोर्ट और संबंधित नोटिस की भौतिक प्रति याचिकाकर्ता के पिता बजरंगलाल को सौंप दी गई। इसकी प्राप्ति की रसीद भी रिकॉर्ड पर मौजूद थी।

हाईकोर्ट ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि जांच रिपोर्ट 30 जून 2013 को याचिकाकर्ता के पिता को दे दी गई थी, जबकि सेवा से हटाने का आदेश 23 जुलाई 2013 को पारित हुआ।

अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ने विभाग के इस जवाब का खंडन करने के लिए कोई rejoinder दाखिल नहीं किया।

Commandant को सेवा से हटाने का अधिकार, कोर्ट ने खारिज की आपत्ति

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया था कि CISF Rules के तहत Commandant को सेवा से हटाने की सजा देने का अधिकार नहीं था और इसलिए दंड आदेश सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित नहीं किया गया।

हाईकोर्ट ने CISF Rules के साथ संलग्न Schedule का परीक्षण करने के बाद इस दलील को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि नियमों के तहत Senior Commandant/Commandant को गंभीर कदाचार साबित होने की स्थिति में सेवा से हटाने की सजा देने का अधिकार है। चूंकि इस मामले में अनुशासनात्मक प्राधिकारी Commandant के पद पर था, इसलिए उसके पास दंड लगाने की पूरी क्षमता थी।

Article 226 के तहत हाईकोर्ट जांच के साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा नहीं करेगा

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के Article 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार में विभागीय जांच में दर्ज साक्ष्यों की उसी तरह दोबारा समीक्षा नहीं की जा सकती, जैसे कोई अपीलीय अदालत करती है।

कोर्ट ने पाया कि विभाग ने नियमों के तहत निर्धारित जांच प्रक्रिया का पालन किया और याचिकाकर्ता ने स्वयं विभिन्न चरणों में उपलब्ध अवसरों का इस्तेमाल नहीं किया।

उसने न तो आरोप-पत्र का जवाब दिया, न जांच कार्यवाही में हिस्सा लिया और न ही जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों के खिलाफ कोई प्रतिनिधित्व दिया।

CISF जैसे अनुशासित बल में अनधिकृत अनुपस्थिति को गंभीर माना

सजा की मात्रा को लेकर भी राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की चुनौती हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सजा की मात्रा में हस्तक्षेप का दायरा सीमित है।

रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्ता ने आरोप-पत्र जारी होने से पहले लगभग तीन वर्ष ही सेवा की थी।

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से CISF के अनुशासित बल होने की प्रकृति को ध्यान में रखा।

कोर्ट ने कहा कि CISF में जानबूझकर और अनधिकृत अनुपस्थिति को गंभीर कदाचार माना जाता है। इन परिस्थितियों में याचिकाकर्ता पर लगाई गई सेवा से हटाने की सजा न तो अत्यधिक थी और न ही उसके कदाचार की तुलना में असंगत।

हाईकोर्ट ने रिट याचिका की खारिज

सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में याचिकाकर्ता सीआईएसएफ कांस्टेबल की याचिका को खारिज कर दिया.
वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

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