मां और शिशु के अधिकारों पर राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला, मां के ट्रांसफर आदेश पर रोक, हाईकोर्ट ने सरकार से ट्रांसफर पॉलिसी बनाने को कहा
जोधपुर। नर्सिंग मदर और उसके शिशु के अधिकारों को अहमियत देते हुए ट्रांसफर से जुड़े एक मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट ने दो माह के शिशु की मां और सीनियर टीचर को राहत देते हुए उसके दूर किए गए ट्रांसफर पर 6 सप्ताह तक रोक लगा दी है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि मां बनने का अधिकार, बच्चे को स्तनपान कराने का अधिकार और शिशु का मां का दूध पाने व देखभाल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार का हिस्सा हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक जरूरत के नाम पर किसी दो महीने के बच्चे को उसकी मां से दूर नहीं किया जा सकता। ऐसे मामले में प्रशासनिक सुविधा से ज्यादा बच्चे के हित और उसके कल्याण को प्राथमिकता देनी होगी।
हाईकोर्ट ने महिला को 7 दिन के भीतर संबंधित विभाग के सामने नई रिप्रेजेंटेशन देने को कहा है। साथ ही ट्रांसफर ऑर्डर पर 6 सप्ताह तक रोक लगा दी है। इस दौरान महिला अपनी मौजूदा पोस्टिंग पर काम कर सकेगी।
वहीं, इस आदेश के साथ हाईकोर्ट ने सरकार को छोटे बच्चों की देखभाल कर रहीं महिला कर्मचारियों के ट्रांसफर के लिए विशेष पॉलिसी या कानून बनाने की जरूरत भी बताई है।
मई में बच्चे को जन्म दिया, जुलाई में हो गया ट्रांसफर
मामला एक सीनियर टीचर से जुड़ा है, जिसने मई 2026 में बच्चे को जन्म दिया था। बच्चे के जन्म के करीब दो महीने बाद जुलाई 2026 में उसका ट्रांसफर कर दिया गया।
महिला की पोस्टिंग PM श्री गवर्नमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल, गंगापुर सिटी में थी। ट्रांसफर के बाद उसे गवर्नमेंट गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल, मसालपुर, जिला करौली भेज दिया गया।
महिला ने इस ट्रांसफर को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसका कहना था कि बच्चा अभी सिर्फ दो महीने का है और इस उम्र में उसे मां की लगातार देखभाल और स्तनपान की जरूरत है। ऐसे में दूर की जगह ट्रांसफर होने से मां और बच्चे दोनों को परेशानी होगी।
‘ट्रांसफर सरकारी सेवा का हिस्सा, लेकिन बच्चे का हित भी जरूरी’
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्य तौर पर ट्रांसफर सरकारी सेवा का हिस्सा होता है। कोर्ट भी आमतौर पर ऐसे प्रशासनिक फैसलों में दखल देने से बचता है।
लेकिन हर मामले में सिर्फ प्रशासनिक जरूरत को ही सबसे ऊपर नहीं रखा जा सकता। अगर किसी ट्रांसफर से छोटे बच्चे की देखभाल पर गंभीर असर पड़ रहा हो, तो उसके हित और कल्याण को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि शिशु अवस्था में बच्चे के लिए मां का प्यार, साथ और देखभाल बेहद जरूरी होती है। दो महीने का बच्चा अपनी मां पर काफी हद तक निर्भर होता है।
ऐसे में मां को दूर की जगह भेजने से बच्चे के पोषण, स्वास्थ्य, देखभाल और मां-बच्चे के भावनात्मक जुड़ाव पर असर पड़ सकता है। इसलिए इस तरह के मामले में प्रशासनिक सुविधा के साथ बच्चे के हित को भी बराबर महत्व देना होगा।
‘मां का मातृत्व और बच्चे की देखभाल भी अनुच्छेद 21 का हिस्सा’
हाईकोर्ट ने कहा कि मां बनने का अधिकार, बच्चे को स्तनपान कराने का अधिकार और शिशु का मां से दूध, देखभाल और पालन-पोषण पाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीवन के अधिकार का हिस्सा हैं।
कोर्ट ने कहा कि इतनी कम उम्र में बच्चे को उसकी मां से अलग करने से उसके पोषण, स्वास्थ्य और देखभाल पर असर पड़ सकता है। इसलिए ऐसे मामले में सिर्फ कर्मचारी की पोस्टिंग या प्रशासनिक जरूरत को देखकर फैसला नहीं किया जा सकता।
नर्सिंग मदर्स के लिए संवेदनशील रवैया जरूरी-हाईकोर्ट
जस्टिस ढंड ने कहा कि बाल देखभाल, मातृत्व देखभाल और शिशु का कल्याण सामाजिक न्याय के अहम हिस्से हैं। इसलिए छोटे बच्चों को स्तनपान कराने वाली महिला कर्मचारियों के मामलों में सरकार और प्रशासन को ज्यादा मानवीय और संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी महिला कर्मचारियों के ट्रांसफर से जुड़े मामलों में बच्चे की जरूरत और उसकी देखभाल को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यानी नर्सिंग मदर के ट्रांसफर को सिर्फ सामान्य प्रशासनिक मामला मानकर फैसला नहीं किया जा सकता।
महिला की पिछली परिस्थिति भी कोर्ट ने देखी
हाईकोर्ट ने महिला की पिछली परिस्थिति को भी ध्यान में रखा। कोर्ट ने नोट किया कि महिला इससे पहले दो बार मैटरनिटी लीव ले चुकी थी।
पहली बार पैदा हुआ बच्चा दुर्भाग्य से जन्म के कुछ समय बाद ही चल बसा था। इसके बाद महिला को दोबारा मैटरनिटी लीव के मामले में भी तकनीकी आधार पर परेशानी का सामना करना पड़ा।
ऐसी परिस्थितियों के बीच जब उसका मौजूदा बच्चा सिर्फ दो महीने का था, तब उसका दूर ट्रांसफर कर दिया गया। कोर्ट ने माना कि इससे महिला और बच्चे को गंभीर परेशानी हो सकती है।
6 सप्ताह तक ट्रांसफर ऑर्डर पर रोक
हाईकोर्ट ने फिलहाल ट्रांसफर ऑर्डर के अमल पर 6 सप्ताह की रोक लगा दी है। इस दौरान महिला अपनी मौजूदा पोस्टिंग पर काम कर सकेगी।
हाईकोर्ट ने उसे 7 दिन के भीतर सक्षम अथॉरिटी के सामने नई रिप्रेजेंटेशन देने को कहा है। यानी हाईकोर्ट ने अभी ट्रांसफर को हमेशा के लिए रद्द नहीं किया है, बल्कि संबंधित अथॉरिटी को महिला की परिस्थिति पर दोबारा विचार करने का मौका दिया है।
सरकार से नर्सिंग मदर्स के लिए पॉलिसी बनाने को कहा
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने गौर किया कि हाल ही में बच्चे को जन्म देने वाली और शिशु को स्तनपान कराने वाली महिला सरकारी कर्मचारियों के ट्रांसफर को लेकर कोई स्पष्ट सरकारी पॉलिसी नहीं है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि अब समय आ गया है कि सरकार ऐसी परिस्थितियों के लिए उचित ट्रांसफर पॉलिसी या कानून बनाने पर विचार करे। स्पष्ट व्यवस्था नहीं होने से मां और छोटे बच्चे दोनों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश की कॉपी केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय और राजस्थान के विधि एवं विधिक कार्य विभाग के प्रमुख सचिव को भेजने का निर्देश भी दिया है, ताकि इस दिशा में उचित कार्रवाई पर विचार किया जा सके।