जयपुर। नियुक्ति में हुई प्रशासनिक देरी की वजह से किसी कर्मचारी को उसकी पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने 81 साल के पूर्व न्यायिक अधिकारी मातादीन गर्ग के पेंशन मामले में बड़ा आदेश देते हुए उनकी पेंशन रोकने का पुराना ऑर्डर रद्द कर दिया है। कोर्ट ने मातादीन गर्ग की सर्विस की गणना 31 दिसंबर 1986 से करने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि उन्हें समय पर ज्वाइन नहीं करवाया जाना उनकी गलती नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक देरी का नतीजा था। इसलिए इस अवधि को पेंशन के लिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने संबंधित अथॉरिटी को पेंशन और दूसरे रिटायरमेंट बेनिफिट जारी करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने बकाया पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभ पर 9 फीसदी सालाना ब्याज देने का भी आदेश दिया है। पूरी राशि 15 दिन के भीतर जारी करनी होगी।
मामले में मातादीन गर्ग की ओर से डॉ. सौगत रॉय के साथ अधिवक्ता जगमोहन पारीक, यशवंत सिंह और शंकर लाल ने पैरवी की। राज्य और हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से भी अलग-अलग अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा।
मेरिट में Rank-1 आए, लेकिन समय पर नहीं मिली नियुक्ति
मातादीन गर्ग राजस्थान हायर ज्यूडिशियल सर्विस की सीधी भर्ती परीक्षा में Rank-1 पर आए थे, लेकिन इसके बावजूद उन्हें समय पर नियुक्ति नहीं मिली। इस मामले में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने 12 जुलाई 1991 को मातादीन गर्ग के पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें मूल मेरिट लिस्ट के आधार पर सीनियरिटी देने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को 31 दिसंबर 1986 से मानने को कहा, लेकिन यह भी साफ किया कि ज्वाइन करने से पहले की अवधि का वेतन उन्हें नहीं मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद मातादीन गर्ग को 25 फरवरी 1994 को नियुक्ति मिली। इसके बाद पेंशन की गणना को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
मातादीन गर्ग का कहना था कि जब उनकी सीनियरिटी और नियुक्ति को 31 दिसंबर 1986 से माना गया है, तो पेंशन के लिए उनकी क्वालिफाइंग सर्विस भी इसी तारीख से गिनी जानी चाहिए।
10 साल की सर्विस पूरी नहीं होने से अटकी पेंशन
राजस्थान सिविल सर्विस पेंशन रूल्स, 1996 के तहत नियमित पेंशन के लिए कम से कम 10 साल की क्वालिफाइंग सर्विस जरूरी है। इसी को लेकर मातादीन गर्ग की पेंशन का विवाद खड़ा हुआ।
अधिकारियों ने उनकी सर्विस 22 अगस्त 1991 से 31 मार्च 1999 तक मानी। यह अवधि 10 साल से कम थी, इसलिए उन्हें नियमित पेंशन के लिए पात्र नहीं माना गया।
वहीं, मातादीन गर्ग का कहना था कि उनकी सर्विस 31 दिसंबर 1986 से गिनी जानी चाहिए। अगर इस तारीख से सर्विस की गणना की जाए तो उनकी क्वालिफाइंग सर्विस 10 साल से ज्यादा हो जाती है और वे पेंशन के पात्र बनते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा- नियुक्ति में हुई देरी कर्मचारी की गलती नहीं
हाईकोर्ट ने मातादीन गर्ग की इस दलील को स्वीकार किया। हाईकोर्ट ने कहा कि मातादीन गर्ग को समय पर ज्वाइन नहीं करवाया गया था। इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी, बल्कि देरी प्रशासन की वजह से हुई। इसलिए इस देरी का नुकसान उन्हें पेंशन के मामले में नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश का मतलब सिर्फ सीनियरिटी देना नहीं था। मातादीन गर्ग को मूल मेरिट के आधार पर नियुक्त माना गया था। उन्हें ज्वाइन करने से पहले का वेतन नहीं मिलना अलग बात है, लेकिन पेंशन की गणना के लिए उनकी सर्विस अवधि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसलिए 31 दिसंबर 1986 से उनकी सेवा को पेंशन और रिटायरमेंट लाभों की गणना के लिए गिना जाएगा।
‘सरकारी आवास का बकाया पेंशन रोकने का आधार नहीं’
मामले में सरकारी आवास के किराये और दूसरे बकाया को लेकर भी विवाद था। अधिकारियों का कहना था कि कुछ रकम याचिकाकर्ता पर बकाया है और नो-ड्यूज संबंधी औपचारिकताएं पूरी नहीं हुई हैं। विभाग की ओर से करीब ₹57,454 की रकम का भी जिक्र किया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर सरकार की कोई रकम बकाया है तो नियमों के तहत उसकी अलग से रिकवरी की जा सकती है। बकाया रकम की रिकवरी पेंशन से की जा सकती है, लेकिन इसके आधार पर कर्मचारी की पेंशन को रोका नहीं जा सकता। कोर्ट ने कहा कि पेंशन कर्मचारी की सर्विस से अर्जित अधिकार है।
2 हफ्ते में पेंशन और एरियर देने का आदेश
हाईकोर्ट ने मातादीन गर्ग की याचिका मंजूर करते हुए 14 मार्च 2019 का वह ऑर्डर रद्द कर दिया, जिसमें उन्हें पेंशन देने से इनकार किया गया था।
हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को मातादीन गर्ग की सेवा की गणना 31 दिसंबर 1986 से करते हुए पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभ जारी करने के निर्देश दिए। बकाया पेंशन और अन्य लाभ पर 9 फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा।
हाईकोर्ट ने पूरी राशि 15 दिन के भीतर जारी करने को कहा है। यदि तय समय में भुगतान नहीं किया गया तो देरी की अवधि के लिए ब्याज की दर बढ़कर 12 फीसदी सालाना हो जाएगी और अतिरिक्त ब्याज की रकम संबंधित अधिकारी से वसूल की जाएगी।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की उम्र को देखते हुए यह भी निर्देश दिया कि यदि किसी दस्तावेज पर उनके हस्ताक्षर जरूरी हों तो रजिस्ट्री का अधिकारी उनके घर जाकर हस्ताक्षर करवाए। क्योंकि 80 साल से अधिक उम्र के याचिकाकर्ता को लंबे समय तक दफ्तरों के चक्कर लगाने की स्थिति में नहीं छोड़ा जा सकता।