जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने मारपीट के एक मामले में सेशन कोर्ट का दोषी ठहराने वाला फैसला रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार करते हुए आरोपी को फिर से बरी कर दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि घटना के चश्मदीद नहीं थे और मारपीट में चोट लगने की पुष्टि के लिए मेडिकल रिपोर्ट भी पेश नहीं की गई थी। ऐसे में सिर्फ पुलिस जांच में कमी के आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस फरजंद अली ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया था, लेकिन सेशन कोर्ट इस फैसले को पलटने के लिए ठोस कारण नहीं दे पाया।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर ट्रायल कोर्ट का फैसला सबूतों के आधार पर उचित और संभव है, तो केवल अलग नजरिया होने के आधार पर बरी करने का फैसला नहीं पलटा जा सकता।
महिला ने मारपीट और रेप की कोशिश का लगाया था आरोप
मामला राजसमंद जिले का है। 13 नवंबर 2012 को एक महिला ने पुलिस में शिकायत दी थी कि हेमंत और उसके चाचा जमना लाल ने उसके साथ मारपीट की, उसके साथ अभद्रता की और रेप करने की कोशिश की। इस शिकायत पर पुलिस ने FIR दर्ज की थी।
जांच के बाद पुलिस ने निगेटिव फाइनल रिपोर्ट पेश कर दी। इसके बाद महिला ने विरोध याचिका दाखिल की।
महिला और गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद ट्रायल कोर्ट ने हेमंत के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 341 और 323 के तहत संज्ञान लिया। ये धाराएं गलत तरीके से रोकने और चोट पहुंचाने से जुड़ी हैं।
ट्रायल कोर्ट ने संदेह का लाभ देकर किया था बरी
मामले की सुनवाई के बाद 19 जनवरी 2017 को राजसमंद के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने हेमंत को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता महिला ने इस फैसले को सेशन कोर्ट में चुनौती दी।
सेशन कोर्ट ने 2018 में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए हेमंत को IPC की धारा 341 और 323 के तहत दोषी ठहरा दिया। हालांकि, कोर्ट ने सजा तय करने के लिए मामला वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया।
इस फैसले के खिलाफ हेमंत ने राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
‘घटना के चश्मदीद नहीं थे दोनों गवाह, बाद में पहुंचे थे मौके पर’
हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड को देखते हुए पाया कि सेशन कोर्ट ने मुख्य रूप से दो गवाहों प्रेम शंकर और अनुराग के बयानों के आधार पर ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा था।
हालांकि, अभियोजन के शुरुआती मामले में इन दोनों को घटना का चश्मदीद नहीं बताया गया था। वे घटना होने के बाद मौके पर पहुंचे थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि शुरुआती शिकायत में घटना को अपनी आंखों से देखने वाले किसी प्रत्यक्षदर्शी की मौजूदगी सामने नहीं आई थी।
ऐसे में दोनों गवाहों के बयानों को सावधानी से परखना जरूरी था। यह देखना भी जरूरी था कि उन्हें घटना के बारे में खुद कितनी जानकारी थी और उनके बयान मारपीट के आरोप को साबित करने के लिए कितने भरोसेमंद थे।
हाईकोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट नहीं होने पर भी उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला को चोट लगने की पुष्टि करने वाली कोई मेडिकल रिपोर्ट सबूत के तौर पर पेश नहीं की गई थी।
सेशन कोर्ट ने महिला को मेडिकल जांच के लिए अस्पताल नहीं ले जाने को लेकर पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए थे और इसे आरोपी के खिलाफ माना था।
इस पर इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि जांच में कमी को अपने आप आरोपी के खिलाफ ठोस सबूत नहीं माना जा सकता। पुलिस अधिकारी ने अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही की हो, तो भी अभियोजन पक्ष को आरोप भरोसेमंद सबूतों के आधार पर संदेह से परे साबित करना होगा।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरोसेमंद सबूत के बिना चोट लगने की बात भी मानकर नहीं चला जा सकता।
‘गवाहों की संख्या नहीं, बयान की विश्वसनीयता जरूरी’
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी तथ्य को साबित करने के लिए गवाहों की कोई तय संख्या जरूरी नहीं है। एक गवाह के बयान के आधार पर भी आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है।
लेकिन अगर गवाह की बात भरोसेमंद न लगे और मामले की परिस्थितियों से संदेह पैदा हो, तो उसके बयान की पुष्टि के लिए दूसरे ठोस सबूतों का होना जरूरी हो सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में गवाहों की स्थिति और मेडिकल सबूतों की कमी को एक साथ देखने पर सेशन कोर्ट का ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटना उचित नहीं था। ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष सबूतों के आधार पर संभव था।
सेशन कोर्ट ने फैसला पलटने की स्पष्ट वजह नहीं बताई– हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को बरी किए जाने के बाद उसके निर्दोष होने की धारणा और मजबूत हो जाती है। ऐसे में अपीलीय कोर्ट को बरी करने का फैसला पलटने के लिए ठोस कारण देने होते हैं।
सिर्फ इसलिए कि अपीलीय कोर्ट सबूतों की दूसरी व्याख्या कर सकता है, ट्रायल कोर्ट का फैसला नहीं पलटा जा सकता। इसके लिए यह दिखाना जरूरी है कि ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष गलत, स्पष्ट रूप से अनुचित या रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के विपरीत था।
इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों को देखते हुए हेमंत को बरी किया था। सेशन कोर्ट को इस फैसले को गलत ठहराने के लिए ठोस वजह बतानी थी।
लेकिन वह यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों को समझने में कहां गलती की थी। सिर्फ सबूतों को अलग तरीके से देखने के आधार पर बरी करने का फैसला पलटना सही नहीं है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल किया, आरोपी बरी
जस्टिस फरजंद अली ने हेमंत की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए सेशन कोर्ट का दोषी ठहराने वाला आदेश रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने 19 जनवरी 2017 को ट्रायल कोर्ट की ओर से दिए गए बरी करने के फैसले को बहाल कर दिया।
इस तरह हेमंत को संबंधित आरोपों से बरी कर दिया गया। कोर्ट ने उसके जमानत बॉन्ड, यदि कोई हों, समाप्त करने के भी निर्देश दिए।