राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ के प्रथम रजिस्ट्रार जनरल रहे पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश गणपतसिंह भंडारी द्वारा अपने न्यायिक जीवन के अनुभव पर लिखी पुस्तक “Delivering instant justice” का हाल ही में केन्द्रीय कानून मंत्री ने विमोचन किया था.
देशभर के न्यायिक जगत में पूर्व जज गणपतसिंह भंडारी द्वारा लिखी इस पुस्तक की काफी चर्चा हैं.
लॉ एंड लीगल से “Delivering instant justice” पुस्तक पर बातचीत करते हुए पूर्व जज गणपतसिंह भंडारी ने अपने न्यायिक जीवन पर विस्तार से चर्चा की.
पेश हैं उनसे हुई बातचीत के अंश
“Delivering instant justice” पुस्तक पर विशेष बातचीत :
सवाल – आपने ‘इंस्टेंट जस्टिस’ का तरीका क्यों अपनाया, और इसके पीछे आपकी मुख्य सोच क्या थी?
जवाब– इंस्टेंट जस्टिस का मतलब न्याय को जल्दी देना है, लेकिन बिना किसी प्रक्रिया की अनदेखी किए. मुझे लगा कि अगर न्याय जल्दी और ईमानदारी से दिया जाए तो लोगों का भरोसा व्यवस्था में बढ़ता है.
मेरा उद्देश्य था कि लंबित मामलों को टालना नहीं चाहिए, बल्कि तैयारी और समझदारी से तेजी से निपटारा करना चाहिए.
सवाल – आप गवाहों का बयान अपने हाथ से क्यों लिखते थे? इससे आपको क्या फायदा होता था?
जवाब – गवाहों का बयान अपने हाथ से लिखने से हर बात मेरी समझ में सीधे और स्पष्ट आती थी. इससे मैं मामले की बारीकियों को अच्छे से समझ पाता था और बाद में किसी भी उलझन या भ्रम की गुंजाइश नहीं रहती थी.
सवाल – आप फैसला देने से पहले साइट इंस्पेक्शन किया करते थे. इससे न्याय प्रक्रिया में क्या बदलाव आया?
जवाब – साइट इंस्पेक्शन से तुरंत पता चल जाता था कि असल हालत क्या है. इससे झूठ, देरी और भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम हो जाती थी.
कई पुराने और उलझे हुए मामलों को मैंने एक ही दिन में इसी वजह से निपटा दिया. जयपुर के एमआई रोड़ के एक बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति के शोरूम का केस जो उस समय करोड़ों रूपए का था, मौका निरीक्षण के कारण तीन दिन में ही सफल हो गया था.
वर्तमान में जज मौका निरीक्षण नहीं करते इसलिए कई बार वे सही स्थिती का आंकलन नहीं लगा पाते.
सवाल – तुरंत फैसला सुनाने में आपको किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा? क्या आपके सहकर्मी या अन्य अधिकारी आलोचक थे?
जवाब – शुरू में कुछ वकील और अधिकारी कहते थे कि यह तरीका परंपरागत नहीं है या बहुत जल्दीबाजी है.कुछ ने शिकायत भी की, लेकिन जब मेरे फैसले अपील में बरकरार रहे, तो धीरे-धीरे लोगों को विश्वास हुआ कि जल्दी भी न्याय हो सकता है, अगर तैयारी और ईमानदारी हो.
सवाल – कभी आपके फैसलों की वैधता पर सवाल उठे? तब आपने क्या जवाब दिया या क्या किया?
जवाब – कोई भी मेरा फैसला हाईकोर्ट में कानूनी आधार पर खारिज नहीं हुआ.
मेरे ज्यादातर फैसले बरकरार रखे गए, जिससे मेरी विधिक प्रक्रिया पर किसी ने संदेह नहीं किया.
मेरे अधिकांश फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने अपनी मुहर लगाई हैं.
सवाल – आज के युवा जजों को तेज, पारदर्शी और ईमानदार न्याय के लिए आपकी क्या सलाह होगी?
जवाब – मेरा सुझाव है कि वे पूरी तैयारी के साथ मामलों को समझें, गवाहों की बात खुद सुनें, और जब शक हो तो सीधे सवाल पूछें.
किसी भी भय, दबाव या लालच से दूर रहकर काम करें, तभी सिस्टम में भरोसा लौटेगा.
सवाल – कोर्ट में सवाल पूछकर सच सामने लाने का तरीका आपने कैसे अपनाया? क्या इसका कोई खास किस्सा है?
जवाब – अगर मुझे लगता था कि कोई पक्ष झूठ बोल रहा है तो मैं कोर्ट से खुद सवाल करता था। एक बार एक ड्राई क्लीनर के केस में, मेरे सवालों से ही सच सामने आया और सही इंसान को उसका हक मिल सका.
सवाल – रिटायरमेंट के बाद यूरोपीय यूनियन के साथ कैसे जुड़े और आपने राजस्थान/ओडिशा में क्या नए कानूनी कदम सुझाए?
जवाब – रिटायरमेंट के बाद मुझे यूरोपीय यूनियन ने जल संरक्षण के कानून बनाने में सलाहकार नियुक्त किया.राजस्थान में जल प्राधिकरण के बिल का ड्राफ्ट तैयार किया और ओडिशा में गंदे पानी और सफाई व्यवस्था सुधारने के कानूनी उपाय सुझाए.
सवाल – 1977 में जयपुर हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की गयी, उस समय आपका अनुभव कैसा रहा?
जवाब – यह एक बड़ा चैलेंज था। मुझे नयी बेंच खड़ी करने की जिम्मेदारी मिली थी. जगह खाली करानी थी, रिकॉर्ड्स शिफ्ट करने थे, और कम समय में सब सेटअप तैयार करना था. टीम का सहयोग मिला और समय पर काम पूरा हो गया.
सवाल – आपके काम को जब मीडिया और विदेशों में मान्यता मिली, तो आपको कैसा महसूस हुआ?
जवाब – बहुत गर्व महसूस हुआ कि मेरे काम को देश-विदेश में सराहा गया। यह देख कर खुशी हुई कि न्याय में सरलता, तेजी और ईमानदारी की अलख बाकी दुनिया में भी फैल सकती है.
मैनें 20 साल में 4 हजार से अधिक फैसले “instant justice” के रूप में जिस दिन बहस पूर्ण होती थी उसी दिन दिए हैं.
एक समय ऐसा भी आया जब मेरा नाम गिनिज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए भी चर्चा की जा रही थी.
लेकिन वे जजों के मामले में ऐसा कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं करते.
उस समय के कई युरोपियन अधिकारियों ने कहा भी था कि आपके रिकॉर्ड विशिष्ट श्रेणी में रखा जाना चाहिए.
लेकिन मैंने ये किसी रिकॉर्ड या अवार्ड के लिए नहीं किया, बल्कि मुझे यह अच्छा लगता था कि लोगो को न्याय मिले, इसलिए किया.
सवाल – जब राजनीतिक या किसी का दबाव पड़ा, आपने ईमानदारी और निष्पक्षता कैसे बरकरार रखी?
जवाब – मैंने न्यायपालिका में आने से पहले ईमानदारी की शपथ ली थी और हमेशा उसी पर कायम रहा. मुझे गुरुदेव और परिवार का आशीर्वाद और अपने कर्तव्यों में सच्चाई ही मेरी ताकत रही.
एक पत्नी चाहें तो किसी भी पुरूष को जीवन के लिए ईमानदार बना सकती हैं. मेरे जीवन में भी मेरी पत्नी का सहयोग सबसे ज्यादा है, उसकी वजह से भी मैं जीवन भर ईमान पर चल पाया.
सवाल – अब जब आप 88 साल की उम्र में भी जरूरतमंदों को मुफ्त कानूनी मदद दे रहे हैं, तो आपके जज़्बे और प्रेरणा का स्रोत क्या है?
जवाब – मेरे लिए न्याय एक सेवा है, न कि सिर्फ नौकरी. जब भी कोई जरूरतमंद इंसान मेरे पास आता है, मुझे वही संतुष्टि मिलती है, जो मैंने अपनी पूरी नौकरी में पाई थी. यही मेरे जीवन का मकसद है.