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राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: आयकर विभाग मनमाने ढंग से पुराने आकलन नहीं खोल सकता, कार्रवाई के लिए आपत्तिजनक सामग्री होना जरूरी।

Rajasthan High Court Quashes Tax Action, Says Old Assessments Cannot Be Reopened Arbitrarily

हाईकोर्ट ने कहा- किसी अन्य व्यक्ति के यहां तलाशी में मिले दस्तावेजों के आधार पर दूसरी कंपनी या व्यक्ति के खिलाफ आयकर अधिनियम की धारा 153C के तहत कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने आयकर मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल किसी अन्य व्यक्ति के यहां तलाशी में दस्तावेज मिलने भर से किसी कंपनी या व्यक्ति के खिलाफ आयकर अधिनियम की धारा 153C के तहत कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक तलाशी में मिली सामग्री स्पष्ट रूप से “आपत्तिजनक” (Incriminating) न हो और उससे आय छिपाने का प्रथमदृष्टया संकेत न मिले, तब तक विभाग को पुराने आकलन दोबारा खोलने का अधिकार नहीं है।

यह रिपोर्टेबल जजमेंट Superb Infotech Pvt. Ltd. की ओर से दायर याचिका पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने दिया है।

हाईकोर्ट ने Superb Infotech Pvt. Ltd. के पक्ष में फैसला देते हुए आयकर अधिकारी, आयुक्त (अपील) और आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) के आदेश को रद्द कर दिया है।

क्या था पूरा मामला?

कंपनी ने आकलन वर्ष 2007-08 के लिए 29 अक्टूबर 2007 को अपनी आयकर रिटर्न दाखिल की थी, जिसमें कुल आय 2,31,210 रुपये घोषित की गई थी।

बाद में आयकर विभाग ने 17 सितंबर 2008 को Kamdhenu Group से जुड़े मामलों में तलाशी कार्रवाई की।

इस कार्रवाई के दौरान मिले कुछ दस्तावेजों के आधार पर आयकर विभाग ने कंपनी के खिलाफ धारा 153C के तहत नोटिस जारी किया और 28 दिसंबर 2010 को आकलन करते हुए 18,63,34,965 रुपये को करयोग्य आय मान लिया।

विभाग ने कहा कि कृषि भूमि की बिक्री वास्तव में व्यापारिक गतिविधि थी और इससे हुआ लाभ “बिजनेस इनकम” है।

जबकि आयकर विभाग ने Superb Infotech Pvt. Ltd. के कार्यालय या परिसर पर कोई तलाशी नहीं की थी।

विभाग ने किस आधार पर की कार्रवाई?

विभाग की ओर से तैयार “संतुष्टि नोट” (Satisfaction Note) में कहा गया कि तलाशी के दौरान कुछ दस्तावेज मिले, जिनमें Partnership Deed, Dissolution Deed और अन्य कागजात शामिल थे, जो कंपनी से संबंधित बताए गए। इसी आधार पर कंपनी पर धारा 153C लगाई गई।

लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि इन दस्तावेजों में कहीं भी यह नहीं बताया गया कि वे आकलन वर्ष 2007-08 से संबंधित थे या उनसे कोई छिपी हुई आय सामने आती थी।

Superb Infotech Pvt. Ltd. कंपनी का पक्ष

कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर.बी. माथुर ने पैरवी करते हुए कहा कि आयकर विभाग द्वारा धारा 153C के तहत नोटिस जारी करना पूरी तरह कानून के विपरीत था।

तलाशी कंपनी पर नहीं हुई

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि 17 सितंबर 2008 को तलाशी Kamdhenu Group के मामलों में हुई थी। कंपनी के कार्यालय, परिसर या निदेशकों के यहां कोई सर्च नहीं हुई। इसलिए कंपनी को सीधे तलाशी मामलों की धारा में लाना गलत है।

कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली

कंपनी ने तर्क दिया कि तलाशी में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि कंपनी ने आय छिपाई है। विभाग ने केवल कुछ दस्तावेजों का उल्लेख किया, लेकिन वे न तो अवैध थे और न ही उनसे कर चोरी सिद्ध होती थी।

कंपनी ने कहा कि Partnership Deed, Dissolution Deed और Miscellaneous Papers जैसे सामान्य दस्तावेजों को “Incriminating Material” नहीं कहा जा सकता।

दस्तावेज संबंधित वर्ष से जुड़े नहीं थे

कंपनी ने कहा कि यदि कोई दस्तावेज मिला भी हो, तो वह आकलन वर्ष 2007-08 से संबंधित नहीं था। इसलिए उसी वर्ष का आकलन खोलना गलत था।

विभाग के पास पहले से जानकारी थी

कंपनी ने कहा कि कृषि भूमि की बिक्री की जानकारी विभाग को पहले से थी। यह लेन-देन रिटर्न और रिकॉर्ड में उपलब्ध था। इसलिए बाद में उसी तथ्य को आधार बनाकर दोबारा कर लगाना कानून का दुरुपयोग है।

कृषि भूमि टैक्स योग्य नहीं थी

कंपनी का मुख्य तर्क था कि बेची गई भूमि ग्रामीण क्षेत्र में स्थित थी, नगर सीमा से बाहर थी और कृषि कार्य हेतु उपयोग में थी।

इसलिए आयकर अधिनियम की धारा 2(14)(iii) के अनुसार वह “Capital Asset” नहीं थी।

व्यापार नहीं, निवेश था

कंपनी ने कहा कि यह कोई नियमित खरीद-बिक्री का धंधा नहीं था। यह एक अलग निवेश था, इसलिए इसे “Adventure in the Nature of Trade” नहीं कहा जा सकता।

ITAT ने अधिकार क्षेत्र के मुद्दे नहीं सुने

कंपनी ने आरोप लगाया कि आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) ने अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) के महत्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय नहीं दिया और सीधे आय के स्वरूप पर टिप्पणी कर दी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

कंपनी ने कई निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें Abhisar Buildwell Pvt. Ltd., U.K. Paints, Sinhgad Technical Education Society और Misty Meadows Pvt. Ltd. शामिल हैं। जिनमें कहा गया है कि बिना आपत्तिजनक सामग्री पुराने आकलन नहीं खोले जा सकते।

आयकर विभाग का जवाब

मामले में आयकर विभाग की ओर से कहा गया कि आयकर अधिकारी द्वारा की गई कार्रवाई वैधानिक और उचित थी।

संतुष्टि नोट बनाया गया था

विभाग ने कहा कि धारा 153C लगाने से पहले विधिवत Satisfaction Note तैयार किया गया था। अधिकारी ने रिकॉर्ड देखकर संतुष्टि बनाई कि दस्तावेज कंपनी से संबंधित हैं।

दस्तावेज कंपनी के थे

विभाग का कहना था कि तलाशी में मिले कागजात Superb Infotech Pvt. Ltd. से जुड़े थे। इसलिए कानून के अनुसार मामला कंपनी को ट्रांसफर किया गया।

अधिकारी को जांच का अधिकार है

विभाग ने कहा कि यदि किसी तीसरे व्यक्ति से संबंधित दस्तावेज तलाशी में मिलते हैं, तो आयकर अधिकारी उस व्यक्ति की आय की जांच कर सकता है।

भूमि कारोबार का हिस्सा थी

विभाग ने कहा कि कंपनी लगातार जमीन खरीदने और बेचने का काम करती थी। इसलिए कृषि भूमि की बिक्री भी व्यापारिक गतिविधि थी।

भारी लाभ हुआ

विभाग ने तर्क दिया कि भूमि बिक्री से लगभग 18.63 करोड़ रुपये का लाभ हुआ, जो सामान्य कृषि निवेश नहीं बल्कि व्यापारिक लाभ था।

कंपनी का मुख्य व्यवसाय भूमि लेन-देन

विभाग ने कहा कि कंपनी के अन्य वर्षों के रिकॉर्ड से भी स्पष्ट है कि कंपनी भूमि खरीद-बिक्री में सक्रिय थी। इसलिए इस लाभ को बिजनेस इनकम माना जाना चाहिए।

कोई कानूनी त्रुटि नहीं

विभाग ने अदालत से कहा कि AO, CIT(A) और ITAT तीनों ने तथ्य देखकर आदेश दिए हैं, इसलिए हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता कंपनी Superb Infotech Pvt. Ltd. की दलीलों को मंजूर करते हुए कहा कि केवल दस्तावेज मिलना पर्याप्त नहीं, बल्कि दस्तावेज आपत्तिजनक होने चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों में आय छिपाने का संकेत होना चाहिए।

इस मामले में कृषि भूमि ग्रामीण क्षेत्र में थी और इसे व्यापारिक आय नहीं माना जा सकता।

इसलिए अदालत ने विभाग के सभी आदेश रद्द कर दिए।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि धारा 153C का उपयोग केवल तभी हो सकता है, जब तलाशी में ऐसी सामग्री मिले जो प्रथमदृष्टया यह दर्शाए कि संबंधित व्यक्ति ने आय छिपाई है।

कोर्ट ने कहा:

“केवल किसी अन्य व्यक्ति के पास से किसी तीसरे व्यक्ति के दस्तावेज मिल जाना, अपने आप में धारा 153C लगाने का आधार नहीं बनता।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि “Incriminating Material” का अर्थ ऐसी सामग्री है, जिससे आय छिपाने या कर चोरी का प्रारंभिक संदेह पैदा हो। यदि ऐसा कुछ नहीं है, तो विभाग केवल पुराने मामलों की दोबारा जांच के लिए इस धारा का इस्तेमाल नहीं कर सकता।

पहले से जानकारी थी, फिर दोबारा कार्रवाई क्यों?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जिस कृषि भूमि की बिक्री को लेकर विभाग ने नया आकलन किया, उसकी जानकारी पहले के आकलन के समय भी विभाग के पास थी। यदि उस समय कोई तथ्य छूट गया था, तो उसके लिए कानून में अन्य उपाय उपलब्ध थे, लेकिन धारा 153C का सहारा नहीं लिया जा सकता।

कृषि भूमि पर भी कंपनी को राहत

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू कृषि भूमि की बिक्री से जुड़ा था। कंपनी का कहना था कि बेची गई भूमि ग्रामीण कृषि भूमि थी, जो नगर सीमा से बाहर स्थित थी और आयकर अधिनियम की धारा 2(14)(iii) के अनुसार “Capital Asset” की श्रेणी में नहीं आती।

विभाग ने तर्क दिया कि कंपनी भूमि खरीद-बिक्री का कारोबार करती थी, इसलिए यह व्यापारिक लेन-देन है।

लेकिन अदालत ने पाया कि यहां बार-बार खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड नहीं था, बल्कि यह एकल लेन-देन था। इसलिए इसे “Adventure in the Nature of Trade” नहीं माना जा सकता।

इस फैसले की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति या कंपनी एक ही प्रकार की संपत्ति को अलग-अलग रूप में रख सकती है—कुछ निवेश के रूप में और कुछ व्यापारिक स्टॉक के रूप में।

इसलिए केवल भूमि कारोबार से जुड़े होने मात्र से हर भूमि बिक्री को व्यापार नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भूमि नगर सीमा से बाहर निर्धारित दूरी पर स्थित ग्रामीण कृषि भूमि है, तो उसकी बिक्री पर पूंजीगत लाभ कर (Capital Gains Tax) नहीं लगाया जा सकता।

तीनों आदेश रद्द

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में विभाग के संतुष्टि नोट को दोषपूर्ण मानते हुए उस पर आधारित संपूर्ण कार्यवाही को टिकाऊ नहीं माना।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 21 जुलाई 2010 का आदेश, 27 फरवरी 2013 का आदेश और 6 दिसंबर 2018 का ITAT आदेश तीनों को रद्द कर दिया।

क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण?

यह फैसला उन करदाताओं के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जिनके खिलाफ तलाशी से जुड़े मामलों में बिना ठोस साक्ष्य नोटिस जारी किए जाते हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट के इस फैसले में संदेश दिया है कि:

विभाग मनमाने ढंग से पुराने आकलन नहीं खोल सकता।
केवल दस्तावेज मिलने से कार्रवाई नहीं होगी।
आपत्तिजनक सामग्री जरूरी है।
ग्रामीण कृषि भूमि को कानूनन सुरक्षा प्राप्त है।
व्यापार और निवेश में अंतर तथ्यों से तय होगा, अनुमान से नहीं।

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