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‘जा, मर जा’ कहना आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं, पड़ोसियों के झगड़े रोज़मर्रा की बातें- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली, 12 सितम्बर

क्या दो पड़ोसियों के झगड़े और छोटी-बड़ी हाथापाई को आत्महत्या के लिए उकसाने के बराबर माना जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पड़ोस में होने वाले झगड़े, गाली-गलौज और कभी-कभार हाथापाई को आत्महत्या के लिए उकसाने के बराबर नहीं माना जा सकता.

अदालत ने कहा कि अगर झगड़े के दौरान गर्मा-गर्म बातें या अपशब्द कहे भी गए, तो यह अपने आप अपराध नहीं बन जाते। जब तक यह साबित न हो कि किसी ने साफ इरादा बनाकर आत्महत्या के लिए उकसाया है, तब तक भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 लागू नहीं होती.

यह टिप्पणी जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने उस मामले में की जिसमें 25 वर्षीय युवती सारिका ने 2008 में आत्मदाह कर लिया था।

क्या था मामल ?
कर्नाटक में 25 साल की सारिका, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थीं। उसके सामने वाले घर से शोरगुल होता था, तो उन्होंने कई बार शिकायतें की.

आरोप था कि सामने रहने वाली पड़ोसन गीता अक्सर शोरगुल करती और उन्हें अपशब्द कहती थी। पड़ोसन गीता ने कथित तौर पर उन्हें अपशब्द कहे और “निच” कहकर बुलाया.

12 अगस्त 2008 को विवाद के बाद सारिका ने खुद को आग लगा ली.

अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने गीता और उसके परिवार पर बार-बार गाली देने और तंग करने का आरोप लगाया। 2 सितंबर 2008 को सारिका की मौत हो गई.

ट्रायल कोर्ट से हाईकोर्ट तक

ट्रायल कोर्ट ने गीता को दोषी ठहराते हुए आत्महत्या के लिए उकसाने (Section 306 IPC) के साथ-साथ एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) कानून की धारा 3(2)(v) के तहत भी सज़ा सुनाई थी.

उन्हें धारा 306 में 5 साल कैद और SC/ST एक्ट में आजीवन कारावास की सज़ा दी गई थी.

बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए एससी/एसटी एक्ट के तहत दोष खत्म कर दिया और सज़ा को घटाकर 3 साल कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने का दोष कायम रखा।

सुप्रीम कोर्ट का रुख, गीता को राहत

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए गीता को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि मोहल्ले में झगड़े होना कोई असामान्य बात नहीं है। अक्सर ऐसे झगड़ों में गुस्से वाली बातें निकल जाती हैं, पर इसे सीधे-सीधे आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता.

कोर्ट ने पाया कि गीता और सारिका के परिवारों में लंबे समय से खींचतान थी। सारिका को शोर और गालियों से शिकायत थी, जबकि गीता का कहना था कि सारिका उनके बच्चों को डाँटती थीं। ऐसे हालात में यह मान लेना कि आरोपी ने जानबूझकर आत्महत्या करवाने की कोशिश की, सही नहीं होगा।

‘जा, मर जा’ कहना भी उकसावा नहीं

बेंच ने एक पुराने केस का ज़िक्र किया, जहां आरोपी ने गुस्से में मृतका से कहा था—“जा, मर जा।” और कुछ समय बाद उसने आत्महत्या कर ली.

कोर्ट ने तब भी कहा था कि यह सेक्शन 306 IPC (abetment to suicide) के तहत अपराध नहीं बनता, क्योंकि इसके लिए इरादा साबित होना ज़रूरी है.

सुप्रीम कोर्ट ने गीता को बरी कर दिया। कहा-“हम इस नतीजे पर नहीं पहुँच सकते कि झगड़े की वजह से सारिका के पास आत्महत्या करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।”

जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस विश्वनाथन ने मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि “Though love thy neighbour is the ideal scenario, neighbourhood quarrels are as old as community living itself.” यानी, पड़ोस में प्रेम आदर्श स्थिति हो सकती है, लेकिन समाज में रहने के साथ झगड़े उतने ही पुराने हैं जितना सामुदायिक जीवन.

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