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“पढ़ी-लिखी, कमाऊ पत्नी से घरेलू खर्च और EMI की मांग ‘क्रूरता’ नहीं : कलकत्ता हाईकोर्ट”

कोलकाता, 12 सितंबर।

शादीशुदा जीवन में पति और पत्नी दोनों के बीच समझौता और सहयोग कितना जरूरी है, यह बात कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में स्पष्ट कर दी.

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि एक पढ़ी-लिखी और कामकाजी पत्नी से घरेलू खर्चों में योगदान देने या संयुक्त संपत्ति के लिए EMI का भुगतान करने के लिए कहना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत ‘क्रूरता’ नहीं है.

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि हर वैवाहिक मतभेद को दहेज उत्पीड़न या क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

मामला भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के एक कर्मचारी और उनके बेटे के खिलाफ उनकी बहू द्वारा दायर शिकायत से संबंधित था.

मामलें में बेटे की पत्नी ने आरोप लगाया था कि पति और ससुराल वालों ने उसे मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया.

आरोपों में पति द्वारा जातिवादी टिप्पणियाँ करना, संयुक्त संपत्ति के लिए EMI का भुगतान करने के लिए दबाव डालना, और आवश्यक वस्त्र, भोजन और दवाइयाँ न देना शामिल था.

पत्नी की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि उसे ऑनलाइन खरीदारी करने के लिए मजबूर किया गया था.

हाईकोर्ट ने मामले में दोनो पक्षों बहस सुनने के बाद अदालत ने कहा कि पति ने केवल सामान्य घरेलू और वित्तीय जिम्मेदारियों को निभाने के लिए पत्नी से योगदान मांगा था, न कि किसी प्रकार का शारीरिक या गंभीर मानसिक उत्पीड़न किया.

जस्टिस अजय कुमार गुप्ता की पीठ ने कहा कि वैवाहिक जीवन में आर्थिक साझेदारी और जिम्मेदारियों का साझा होना स्वाभाविक हैं.

“यह वैवाहिक जीवन में स्वाभाविक है कि दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ सम्मान बनाए रखें, जिम्मेदारियाँ साझा करें और समाज की भलाई में योगदान करें.

पत्नी एक शिक्षित और कामकाजी महिला हैं, और घरेलू खर्चों में योगदान देना, कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन खरीदारी करना, या सास द्वारा बच्चे को खिलाने के लिए कहना, किसी भी स्थिति में धारा 498A IPC के तहत ‘क्रूरता’ नहीं हो सकता।”

अदालत ने कहा कि संयुक्त रूप से खरीदी गई संपत्ति के लिए EMI का भुगतान करना या पिता द्वारा बच्चे को बाहर ले जाना घरेलू जीवन की सामान्य घटनाएँ हैं.

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर वैवाहिक विवाद को धारा 498A के तहत क्रूरता के रूप में नहीं लिया जा सकता.

अदालत ने कहा कि “यह स्थापित कानून है कि हर असहमति या मतभेद को धारा 498A IPC के तहत ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता.”

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