नई दिल्ली, 13 सितंबर।
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला की वो अपील खारिज कर दी, जिसमें उसने पति द्वारा विवाह के दौरान खरीदी गई संपत्ति में 50% हिस्सेदारी की मांग की थी-
इस मामले में कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि गृहिणियों का काम घर और समाज की नींव है, इसे “अदृश्य श्रम” मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
लेकिन साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि शादी के दौरान खरीदी गई संपत्ति में बराबरी का हक तभी बनता है जब ”गृहिणी का योगदान स्पष्ट और मापन योग्य हो।”
मामला क्या था
दरअसल दिल्ली हाईकोर्ट में एक महिला ने याचिका दाखिल की थी। उसने कहा कि शादी के दौरान उसके पति ने जो संपत्ति खरीदी है, उसमें उसका भी बराबरी का हक़ है.
महिला का तर्क था कि गृहिणी होकर उसने अपने घर और परिवार को चलाने में अहम भूमिका निभाई है और यही उसकी हिस्सेदारी का आधार है।
याचिका क्यों खारिज हुई?
मामले की सुनवाई जस्टिस अनिल खेतरपाल और जस्टिस हरीश वैद्यानाथन शंकर की बेंच ने की। अदालत ने कहा कि गृहिणी का काम अँधेरे में नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि घर-परिवार का संतुलन उन्हीं के कारण चलता है.
लेकिन अदालत ने महिला की अपील को खारिज करते हुए कहा कि गृहस्थ जीवन निभाना और घरेलू जिम्मेदारियों का निर्वहन करना, संपत्ति पर स्वामित्व का सीधा हक़ नहीं देता.
अगर पत्नी साबित कर दे कि संपत्ति की ख़रीद में उसका वित्तीय या अन्य ठोस योगदान रहा है, तभी उसका अधिकार बन सकता है।
महिलाओं के हक
कोर्ट ने इस बहस को सामाजिक संदर्भ में रखते हुए टिप्पणी करते हुए कहा कि गृहिणी का काम अमूल्य है और इसे आर्थिक नजरिए से भी मान्यता मिलनी चाहिए।
क्यों ज़रूरी है कानूनी बदलाव?
हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि मौजूदा कानून गृहिणियों के योगदान को संपत्ति पर स्वामित्व का अधिकार नहीं देता। लेकिन अब समय आ गया है जब नीति और कानून में बदलाव कर गृहिणी के योगदान को आर्थिक मूल्य के रूप में परिभाषित किया जाए।
ऐसा होने पर लाखों महिलाओं की सामाजिक स्थिति और आर्थिक सुरक्षा और मज़बूत हो सकती है।