सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसला सुनते हुये वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन इसमें किए गए तीन प्रमुख बदलावों पर अंतिम निर्णय आने तक रोक लगा दी.
CJI बी.आर. गवई और जस्टिस अगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने साफ किया कि वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति सीमित रहेगी.
केंद्रीय वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम मेंबर्स की संख्या 4 से अधिक नहीं होगी, जबकि राज्यों के वक्फ बोर्ड में यह संख्या 3 तक सीमित रहेगी.
साथ ही, सरकारों को यह प्रयास करने की हिदायत दी गई है कि वक्फ बोर्ड में नियुक्त किए जाने वाले सरकारी सदस्य भी मुस्लिम समुदाय से ही हों।
तीन प्रमुख प्रावधानों पर रोक
- गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति की संख्या पर नियंत्रण।
- कलेक्टर के अधिकार सीमित, यानी वक्फ संपत्तियों पर कलेक्टर का फैसला अंतिम नहीं माना जाएगा।
- वक्फ बनाने की शर्त पर रोक, जिसमें कहा गया था कि किसी व्यक्ति को वक्फ बनाने के लिए कम से कम 5 वर्षों तक इस्लाम का अनुयायी होना जरूरी होगा।
मुस्लिम पक्ष ने की दलीलें आंशिक रूप से स्वीकार
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की कुछ आपत्तियों को स्वीकार करते हुए इन प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगा दी। हालांकि, सीजेआई गवई ने स्पष्ट किया कि पूरे कानून को रोकने का कोई ठोस आधार नहीं है।
केंद्र का रुख और मंत्री का बयान
केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने फैसले पर संतोष जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है और यह कदम कानून को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करेगा।
इससे पहले 22 मई को तीन दिन तक लगातार इस मामले में सुनवाई हुई थी। याचिकाकर्ताओं ने संशोधित कानून को मुसलमानों के अधिकारों के खिलाफ बताते हुए अंतरिम रोक की मांग की थी
केंद्र सरकार ने इसे संवैधानिक और समाजहित में ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने तब फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो अब सुनाया गया है।