जयपुर, 16 सितंबर
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए ऋण वसूली अधिकरण DRT के उस आदेश् को रद्द कर दिया हैं, जिसमें याचिकाकर्ताओं की सिक्योरिटाइजेशन एप्लिकेशन SA केवल इस आधार पर खारिज कर दी गई थी कि सभी उधारकर्ताओं ने आवेदन और शपथपत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए थे.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश मे यह स्पष्ट किया कि यह अनिवार्य नहीं है कि प्रत्येक आवेदक को आवेदन और शपथपत्र पर हस्ताक्षर करना ही होगा.
जस्टिस अनूप कुमार धंड कि एकलपीठ ने कहा कि एक बार जब याचिका वर्ष 2020 में स्वीकार कर ली गई थी और अंतरिम आदेश भी जारी किया गया था, तब इसे पाँच वर्षों तक लंबित रखने के बाद केवल तकनीकी कारणों से खारिज करना न्यायिक प्रक्रिया की मूल भावना के विपरीत है.
हाईकोर्ट ने DRT के आदेश को खारिज करते हुए मामले को दो महीने के भीतर निपटारे के लिए DRT को वापस भेजने के आदेश दिए.
ये हैं मामला
याचिकाकर्ता किशनलाल व अन्य को बैंक से ऋण स्वीकृत हुआ था. ऋण अदायगी में चूक होने पर बैंक ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ SARFAESI अधिनियम के तहत कार्यवाही शुरू की.
मामले में याचिकाकर्ताओं ने कार्रवाई के खिलाफ SA दायर की गई.
सिक्योरिटाइजेशन एप्लिकेशन पर सभी उधारकर्ताओं में से एक उधारकर्ता ने हस्ताक्षर करते हुए शपथपत्र पेश किया, जबकि बाकी अन्य ने वकालतनामा पर हस्ताक्षर किए.
याचिकाकर्ताओं का आवेदन प्रारंभ में स्वीकार कर लिया गया जिस पर अंतरिम आदेश भी पारित किया गया.
लेकिन पाँच साल बाद DRT ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि सिक्योरिटाइजेशन एप्लिकेशन पर सभी उधारकर्ताओं के हस्ताक्षर और शपथपत्र नहीं हैं.
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं कि ओर से अधिवक्ता ने दलीलें पेश करते हुए कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है जिसमें हर आवेदक का हस्ताक्षर और अलग शपथपत्र अनिवार्य बताया गया हो.
याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने अपने वकालतनामा पर हस्ताक्षर किए थे.
सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के सत्यनाथ बनाम सरोजमणि मामले का भी हवाला दिया गया. जिसमें कहा गया कि तकनीकी कारणों से किसी पक्षकार को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता.
बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने DRT का आदेश निरस्त करते हुए मामले को अंतिम निपटारे के लिए पुनः DRT को भेजने के आदेश दिए.