जयपुर, 23 सितंबर
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह सहित अन्य के खिलाफ दायर याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट आज दोपहर 2 बजे सुनवाई करेगा.
अधिवक्ता पूरण चन्द्र सेन की ओर से दायर याचिका पर नोटिस जारी करने से पूर्व हाईकोर्ट आज इस याचिका की मेंटेबलिटी पर सुनवाई करेगी.
जस्टिस सुदेश बंसल की एकलपीठ ने याचिका पर औपचारिक रूप से सुनवाई शुरू करने और प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने से पहले कुछ अहम निर्देश जारी किए हैं.
साथ ही इस मामले में कोर्ट की सहायता के लिए राज्य के महाधिवक्ता और एडिशनल सॉलिस्टर जनरल को भी शामिल किया हैं.
याचिकाकर्ता और अधिवक्ता पूरण चन्द्र सेन को हाईकोर्ट ने सनद पेश करने के भी आदेश दिए थे. जिसकी पालना में आज सनद पेश कि जाएगी.
याचिका में आरोप है कि नागरिकता अधिनियम का संशोधन भारत की धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध है और शीर्ष पदाधिकारियों द्वारा संविधान की धारा 99 के तहत ली गई शपथ का उल्लंघन हुआ है.
क्या हैं मामला
याचिका में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) से संबंधित गंभीर आरोपों की अनदेखी करने के लिए पुलिस और न्यायालयों पर निष्क्रियता का आरोप लगाया गया है.
याचिका में राज्य सरकार, पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाम, पूर्व कानून मंत्री रविशंकर और अन्य प्रतिवादियों को पक्षकार बनाया हैं.
यह मामला नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 से जुड़ी कथित साम्प्रदायिक घटनाओं पर प्राथमिकी दर्ज न होने, पुलिस की निष्क्रियता और न्यायिक प्रक्रिया में अनदेखी को लेकर दायर कि गयी हैं.
याचिकाकर्ता पूरण चंदर सेन ने 12 अक्टूबर 2020 को थाना गोविंदगढ़, अलवर में गंभीर संज्ञेय अपराधों की रिपोर्ट दी थी.
एफआईआर दर्ज न होने पर उन्होंने पुलिस अधीक्षक को धारा 154(3) सीआरपीसी के तहत आवेदन दिया, लेकिन फिर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई।
इसके बाद उन्होंने लक्ष्मणगढ़ के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आपराधिक शिकायत प्रस्तुत की, जिसे क्षेत्राधिकार की कमी बताकर 21 अक्टूबर 2020 को खारिज कर दिया गया.
रिवीजन याचिका के स्थान पर उच्च न्यायालय में धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दाखिल की गई, जिस पर कोर्ट ने उन्हें 30 दिनों में रिवीजन दाखिल करने का निर्देश दिया.
समय रहते याचिकाकर्ता ने रिवीजन दाखिल कि लेकिन उसे भी 20 फरवरी 2025 को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि ‘ललिता कुमारी बनाम राज्य’ का मामला इस पर लागू नहीं होता.
मुख्य कानूनी मुद्दा
याचिकाकर्ता ने इस याचिका में कानूनी मुद्दा उठाते हुए कि क्या पुलिस को संज्ञेय अपराध की सूचना पर अनिवार्य रूप से एफआईआर दर्ज करनी चाहिए?
याचिकाकर्ता का कहना है कि पुलिस और निचली अदालतों की निष्क्रियता संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन है.
याचिका में यह भी आरोप है कि नागरिकता अधिनियम का संशोधन भारत की धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध है और शीर्ष पदाधिकारियों द्वारा संविधान की धारा 99 के तहत ली गई शपथ का उल्लंघन हुआ है.