जयपुर, 24 सितम्बर।
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सेवानिवृत सरकारी कर्मचारी को बड़ी राहत दी है, जिसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति के बाद निलंबन अवधि का पूरा वेतन और अन्य लाभ देने से वंचित कर दिया गया था.
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि राजस्थान सर्विस रूल्स (RSR), 1951 का नियम 22 निलंबन अवधि का वेतन रोकने का अधिकार नहीं देता है.
हाईकोर्ट ने कहा कि 1951 के नियमों का नियम 54 सक्षम प्राधिकारी को यह अधिकार देता है कि वह निलंबन अवधि के दौरान शेष वेतन या अन्य वित्तीय लाभों को रोक सके या जब्त कर सके.
लेकिन यह प्रावधान भी केवल उन्हीं मामलों में लागू होता है जहाँ विभागीय जांच पूरी होने के बाद कर्मचारी को दोषी ठहराया गया हो।
कोर्ट ने कह कि इस मामले में जांच पूरी ही नहीं होने के दौरान ही कर्मचारी रूपसिंह हसाना को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई थी.
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर राज्य सरकार के 10 अप्रैल 2006 को मनमाना और अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया हैं.
मामला क्या था
याचिकाकर्ता के व्यवहार के चलते उसे विभाग द्वारा चार्जशीट दी गयी. याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत आरोपपत्र जारी हुआ और उन्हें 22 जुलाई 1996 से 13 मई 1997 तक निलंबित रखा गया.
इसकी जांच जारी रहने के दौरान ही 17 जून 2000 को राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 की धारा 53(1) के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई थी.
बाद में विभागीय जांचें बंद कर दी गईं और प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने भी प्रमाणपत्र जारी कर दिया कि उनके खिलाफ कोई जांच लंबित नहीं है.
इसके बावजूद, सरकार ने 10 अप्रैल 2006 को आदेश जारी कर केवल निर्वाह भत्ता देने की बात कही और बाकी वेतन व लाभ रोक दिए.
बचाव पक्ष की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विजय पाठक और गणेशदत्त गौतम ने दलील दी कि जब याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोपपत्र वापस ले लिए गए और कोई जांच लंबित नहीं रही, तो सरकार के पास निलंबन अवधि का वेतन रोकने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है.
बचाव पक्ष की इस दलील का सरकार की ओर से विरोध कर कहा गया कि कर्मचारी को गंभीर कदाचार के चलते “डेडवुड” मानकर अनिवार्य सेवानिवृत्त किया गया था, इसलिए वेतन और लाभ देने का वह हकदार नहीं है.