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जोधपुर के व्यापारी सुरेश शर्मा हत्याकांड के सभी आरोपी Supreme Court से भी बरी, हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

नई दिल्ली, 26 सितम्बर 2025

Supreme Court ने वर्ष 2006 के बहुचर्चित जोधपुर के व्यापारी सुरेश शर्मा हत्याकांड में राजस्थान सरकार और शिकायतकर्ता द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया.

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस जॉयमल्या बागची की खंडपीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के वर्ष 2011 के फैसले पर मुहर लगाते हुए तीनों आरोपियों को बरी करने का फैसला सुनाया हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के निर्णय में न तो कोई कानूनी त्रुटि है और न ही सबूतों के मूल्यांकन में कोई गंभीर खामी हैं.

राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा और शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील कुमार जैन ने पक्ष रखा, जबकि आरोपियों की ओर से अधिवक्ता चित्रांगदा राष्ट्रवारा पेश हुईं.

ये हैं मामला

जोधपुर के व्यापारी सुरेश शर्मा 22 जनवरी 2006 अपने घर से लापता हो गए और अगले दिन उनका शव मिला.

बाद में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि उनका गला दबाकर हत्या कि गयी हैं उनके शरीर पर गंभीर चोटों के निशान मिले.

अपील खारिज

ट्रायल कोर्ट ने 10 जनवरी 2008 को इस मामले में पुलिस द्वारा तय किए गए आरोपी हेमलता, नरपत चौधरी और भंवर सिंह को हत्या और साज़िश का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा दी.

ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर राजस्थान हाईकोर्ट ने 14 दिसम्बर 2011 को सबूत कमजोर और अस्वीकार्य होने के आधार पर तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया.

मामले में मृतक के परिजनों और राजस्थान सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की.

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इस मामले में दायर अपीलों पर अपना फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की अपील खारिज कर दी.

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा आरोपियों को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा.

अपील खारिज करने के मुख्य बिंदू

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष की परिस्थितिजन्य साक्ष्य की तीन मुख्य कड़ियाँ मकसद, आखिरी बार साथ देखा जाना और बरामदगी संदेह से परे साबित नहीं हो पायी हैं.

आखिरी बार साथ देखे जाने के गवाहों के बयान देर से सामने आए, जिससे उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध साबित हुई.

आरोपी महिला से बरामद खून के धब्बों वाली चुन्नी निर्णायक नहीं थी, क्योंकि मृतक से उसका ब्लड ग्रुप का मिलान ही नहीं हुआ.

कोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक सबूत के तौर पर कॉल डिटेल रिकॉर्ड धारा 65-बी के प्रमाणपत्र के बिना पेश किए गए और हस्तलिखित नोट्स पर भरोसा किया गया, जो अप्रमाणित थे.

इसके साथ ही कोर्ट नें कहा कि हत्या का मकसद भूमि विवाद और व्यक्तिगत दुश्मनी बताया गया लेकिन इस मामले में सभी गवाह विरोधाभासी और अतिरंजित थे.

आरोपी के पक्ष में

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बरी किए गए आरोपी के खिलाफ अपील में हस्तक्षेप केवल अपवाद स्वरूप ही किया जा सकता है जब निचली अदालत का फैसला स्पष्ट रूप से विकृत हो, जब महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी या गलत व्याख्या की गई हो या फिर सबूतों के आधार पर कोई दूसरा दृष्टिकोण संभव न हो और केवल दोषसिद्धि ही तार्किक निष्कर्ष हो.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो संभावित दृष्टिकोण होने पर आरोपी के पक्ष में आने वाले दृष्टिकोण को वरीयता दी जाएगी.

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