जयपुर, 30 सितंबर
Rajasthan Highcourt ने जल संसाधन विभाग की सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं से संबंधित एक टेंडर मामले में याचिकाकर्ता कंपनी की बोली रद्द करते हुए 10 लाख का जुर्माना लगाया हैं.
Rajasthan Highcourt ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि टेंडर में निर्धारित आवश्यक दस्तावेज़, विशेषकर नवीनतम GSTR-3B रिटर्न, जमा करना अनिवार्य था और इसमें देरी करना बोली को अमान्य बनाता है।
भरतपुर जल संसाधन विभाग कार्यालय 30 अप्रैल 2025 को टेण्डर जारी करते हुए निविदाकर्ताओं के लिए अपने नवीनतम GSTR-3B रिपोर्ट को निविदा दस्तावेजों के साथ प्रस्तुत करने की शर्त रखी थी.
कार्यालय ने निविदाएं अपलोड करने की अंतिम तिथि 27 मई 2025 तय कि थी.
याचिकाकर्ता उम्मेद इंजीनियरिंग एंड कंस्ट्रक्शन द्वारा टेण्डर के लिए भरे गए आवेदन को विभाग ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि फर्म ने निर्धारित समय तक GSTR-3B रिटर्न जमा नहीं कराया था.
फर्म का दावा
मामले में याचिकाकर्ता फर्म की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवमित्रा ने पैरवी करते हुए कहा कि GSTR-3B रिटर्न जमा करना केवल एक प्रक्रियात्मक शर्त थी और अगर इसमें देरी हुई, तो उसे सुधार योग्य दोष माना जाना चाहिए.
इसके साथ ही अधिवक्ता ने कहा कि नियम 2013 की धारा 59, 60 और 61 के तहत यह शर्त केवल तकनीकी है और इसे बोली अमान्य करने का कारण नहीं बनाया जा सकता.
याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता फर्म ने कार्यालय आदेश के खिलाफ पहली और दूसरी अपील दायर की थी.
याचिका में आगे कहा गया कि अपीलीय प्राधिकारी ने बिना नियमों पर गौर किए गैर-स्पष्ट (Non-speaking) आदेश के माध्यम से अपील खारिज कर दी.
अधिवक्ता ने कहा कि फर्म ने अपने GSTR-3B जमा किए थे और “नवीनतम GSTR-3B” की परिभाषा टेंडर दस्तावेज़ या कानून में स्पष्ट रूप से नहीं दी गई थी।
अनिवार्य शर्त, तथ्यों को छुपाया
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता माही यादव ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि टेंडर में जीएसटी रिटर्न, PAN और वैध पंजीकरण प्रमाणपत्र जमा करना अनिवार्य शर्त थी.
अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता कंपनी ने मार्च 2024-25 का GSTR-3B रिटर्न 23 जून 2025 को जमा किया, जो टेंडर की अंतिम तिथि 27 मई 2025 के बाद था.
अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि यह न केवल टेंडर शर्तों का उल्लंघन था बल्कि तथ्यों को छुपाने का प्रयास भी था.
टेण्डर की शर्त संख्या 4 अनिवार्य थी और इसका पालन न करने से बोली अमान्य घोषित की गई।
अतिरिक्त महाधिवक्ता ने पैरवी हुए कहा कि टेण्डर मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा अत्यंत सीमित और न्यूनतम है, और यह अदालत संविदात्मक मामलों में निविदा प्राधिकरण के निर्णय के खिलाफ अपील नहीं कर सकती, जब तक कि साफ़-साफ़ दोषपूर्ण मंशा (mala fides) या मनमानी (arbitrariness) का मामला न बन जाए.
न्यायिक समीक्षा सीमित
Rajasthan Highcourt ने दोनो पक्षों की बहस सुनने के बाद Ummed Engineering And Construction की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया.
Rajasthan Highcourt ने अपने फैसले में कहा कि टेंडर जारी करने वाली एजेंसी को शर्तों की व्याख्या करने का सर्वोत्तम अधिकार है और याचिकाकर्ता के बहस करने का कोई ठोस आधार नहीं है.
Rajasthan Highcourt ने अपने फैसले में कहा कि टेंडर प्रक्रिया में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित होता है और केवल तभी हस्तक्षेप किया जा सकता है जब स्पष्ट रूप से किसी पक्षपात, मनमानी या दुर्भावना (mala fide) का मामला हो.
5-5 लाख की कोस्ट
Rajasthan Highcourt ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया कि टेंडर जारी करने में कोई मनमानी हुई हो.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बोली अमान्य होने की स्थिति में कोई अतिरिक्त राहत नहीं दी जाएगी, जिससे अन्य प्रतिस्पर्धी बोलीदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहें.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में Ummed Engineering And Construction द्वारा दायर दो अलग अलग याचिकाओं को खारिज करने के साथ ही प्रत्येक याचिका पर 5-5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया हैं.
Rajasthan Highcourt ने कहा कि जिस कार्य के लिए यह टेण्डर जारी हुआ वह सार्वजनिक हित से जुड़ा कार्य है और याचिकाकर्ताओं के चलते सार्वजनिक हित प्रभावित हुआ हैं इसलिए प्रत्येक याचिका पर 5-5 लाख की कोस्ट लगाई गयी हैं.
हाईकोर्ट ने जुर्माने की राशि 60 दिनों के भीतर जमा कराने के आदेश दिए हैं.