जोधपुर, 24 सितंबर 2025
Rajasthan Highcourt ने वर्ष 1991 में अपनी पत्नी और पुत्र की हत्या के आरोप के मामले में आरोपी को ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है।
जस्टिस डॉ. पुष्पेन्द्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए जालोर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के 1992 के फैसले पर मुहर लगा दी है।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने इस मामले में अपनी पत्नी और पुत्र की हत्या के आरोपी मोतीलाल को बरी कर दिया है।
सरकार की अपील
जिला एवं सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने अपील दायर कर फैसले को चुनौती दी थी। Highcourt में दायर अपील में सरकार ने कहा कि 18 अगस्त 1991 को मोतीलाल ने अपनी पत्नी पुष्पा और पुत्र को हैंडपम्प की लोहे की रॉड से पीटा और पुलिस थाने जाकर घटना की सूचना दी।
आरोपी के हमले के बाद पत्नी और पुत्र की मृत्यु हो गई। अभियोजन ने इसे हत्या और दहेज उत्पीड़न का मामला बताया।
राज्य की ओर से लोक अभियोजक ने तर्क दिया कि आरोपी का पुलिस को दिया गया बयान स्वीकारोक्ति है, और खून से सने कपड़े तथा हथियार की बरामदगी उसे अपराध से जोड़ती है।
साथ ही अभियोजन ने कहा कि मृतका के परिजनों ने भी दहेज मांगने और प्रताड़ना का आरोप लगाया था।
बचाव पक्ष की दलील
प्रतिवादी पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेंद्र सिंह और अधिवक्ता प्रियंका बोराना ने बचाव पक्ष में दलील पेश करते हुए कहा कि अभियोजन की कहानी विरोधाभासी है, गवाहों के बयानों में अंतर है और जांच प्रक्रिया में गंभीर संदेह है।
अधिवक्ताओं ने कहा कि आरोपी प्रतिवादी द्वारा पुलिस को दी गई सूचना साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है। पुलिस अधिकारी को दी गई कोई भी स्वीकारोक्ति 1872 के एक्ट की धारा 25 के तहत साक्ष्य में मान्य नहीं होती।
कोई भी बरामदगी आरोपी-प्रतिवादी के निर्देश पर नहीं हुई। गवाहों के बयानों में विरोधाभास हैं और आरोपी-प्रतिवादी के बयान को पूरी तरह रिकॉर्ड नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट का हवाला
अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि घर आरोपी के कब्जे में नहीं था। आरोपी ने अपनी पत्नी और बच्चों की घायल स्थिति देखकर तुरंत पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई।
बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के Sharad Birdhichand Sarda vs. State of Maharashtra (1984) 4 SCC 116 फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य या दृष्टि साक्षी नहीं है। जब मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित हो, तो साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी होनी चाहिए ताकि अन्य सभी संभावनाएं खारिज हो जाएं और केवल प्रस्तावित तथ्य साबित हों।
अधिवक्ताओं ने कहा कि यह मान्यता है कि पुलिस अधिकारी को दी गई किसी भी स्वीकारोक्ति को आरोपी के खिलाफ साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। धारा 27 के तहत दी गई जानकारी को ही साक्ष्य के रूप में पढ़ा जा सकता है, जो केवल उस तथ्य से संबंधित हो जिसे उसने उजागर किया।
हाईकोर्ट की मुहर
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद Highcourt ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का निर्णय सही और न्यायसंगत है और इसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है।
Highcourt ने पाया कि इस मामले में कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं है और सभी आरोप केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित हैं।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब ट्रायल कोर्ट का फैसला “कानूनी रूप से संभव दृष्टिकोण” हो, तो अपीलीय अदालत को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों में कई विरोधाभास और अनियमितताएं हैं, जैसे कि एफआईआर और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में समय का अंतर। इन कारणों से अभियोजन आरोपी की दोष सिद्धि साबित करने में असफल रहा।