जयपुर, 21 अक्टूबर
Rajasthan High Court ने एक महत्वपूर्ण आदेश में 20 साल पुराने मामले को निस्तारित करते हुए यह स्पष्ट किया है कि किसी विवाहित महिला की मृत्यु को केवल इस आधार पर Dowry Death (दहेज हत्या) नहीं माना जा सकता कि उसकी मृत्यु विवाह के 7 वर्ष के भीतर हुई है।
Justice Anand Sharma की एकलपीठ ने मृतका के पिता Mohammad Ayub Ansari द्वारा दायर निगरानी याचिका (Criminal Revision Petition) को खारिज करते हुए आरोपी पति को बरी करने के Trial Court के फैसले को बरकरार रखा है।
High Court ने कहा कि Dowry Death के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि मृत्यु अस्वाभाविक परिस्थितियों में हुई हो और वह ससुराल पक्ष द्वारा Dowry demand से जुड़ी क्रूरता का परिणाम हो।
जयपुर जिला Sessions Court ने 16 मई 2005 को कानोता थाने में हुई शबनम की मृत्यु के मामले में आरोपी पति सलीम खान और ससुर हनीफ खान को बरी कर दिया था। अदालत ने आरोपियों को IPC की धारा 304-B (Dowry Death), 498-A (Cruelty), 120-B (Criminal Conspiracy) सहित अन्य धाराओं से भी बरी कर दिया था।
याचिकाकर्ता की दलील
मृतका के पिता ने 2006 में Rajasthan High Court में निगरानी याचिका दायर कर अधीनस्थ अदालत के फैसले को चुनौती दी थी।
उनकी ओर से अधिवक्ता Saurabh Vaishnav ने दलील दी कि Trial Court ने साक्ष्यों की गलत व्याख्या की। उन्होंने कहा कि IPC Section 304-B के तहत अभियोजन पक्ष को केवल यह साबित करना होता है कि मृतका की मृत्यु विवाह के सात वर्ष के भीतर अप्राकृतिक परिस्थितियों में हुई है।
यदि यह दोनों तथ्य सिद्ध हो जाते हैं, तो निर्दोष होने का भार आरोपियों पर आ जाता है।
याचिका में कहा गया कि मृतका की मृत्यु घुटन (Asphyxiation) से हुई, जो स्वाभाविक नहीं थी, और मृतका की मां ने अपने बयान में बताया था कि ससुराल पक्ष ₹50,000 की Dowry demand कर रहा था।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से राजकीय Government Advocate Vivek Chaudhary ने मृतका के पिता की ओर से दायर निगरानी याचिका का विरोध किया.
सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि इस मामले में Trial Court का फैसला तथ्यों और सबूतो पर आधारित हैं.
इस मामले में FSL Report कभी कोर्ट में पेश नहीं कि गयी.
High Court का फैसला
Justice Anand Sharma की एकलपीठ ने कहा कि मृतका के पिता और मां Dowry demand को साबित करने में असफल रहे हैं।
विवाह के समय दोनों ने यह स्वीकार किया था कि न तो दहेज की कोई मांग की गई थी और न ही दिया गया था।
अदालत ने कहा कि मृतका की मां ने ₹50,000 की मांग का उल्लेख तो किया, लेकिन यह भी माना कि वह राशि उन्होंने पहले अभियुक्तों से उधार ली थी — इसलिए यह Dowry demand नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने यह भी पाया कि कई गवाह Hostile (पक्षद्रोही) हो गए और उन्होंने अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन नहीं किया।
ये हैं मामला
6 सितंबर 2005 को गोनेर रोड निवासी Mohammad Ayub ने कानोता थाने में अपनी बेटी की Dowry Death का मामला दर्ज कराया था।
FIR के अनुसार, बेटी की शादी विजयपुरा निवासी सलीम खान से हुई थी। विवाह के बाद ससुराल पक्ष द्वारा Dowry की मांग और मारपीट की जाती थी। 3 सितंबर को शबनम अपनी मां से मिलने आई थी और स्वस्थ थी, लेकिन 5 सितंबर को उसकी मृत्यु हो गई।
पुलिस ने FIR के आधार पर मामला दर्ज कर Charge-sheet पेश की। ट्रायल में 20 गवाहों के बयान हुए, जिनमें से कई Hostile हो गए।
Jaipur District Sessions Court ने 16 मई 2006 को फैसला सुनाते हुए आरोपी पति सलीम खान, ससुर हनीफ खान सहित सभी को बरी कर दिया।