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Nims University और University छात्रों को Rajasthan Highcourt से बड़ी राहत, डिप्लोमा इन लैब और रेडियोग्राफी कोर्स की मान्यता का मामला

Rajasthan Highcourt

जयपुर, 25 अक्टूबर।

Rajasthan Highcourt की खंडपीठ ने Nims University के डिप्लोमा इन लैब और डिप्लोमा इन रेडियोग्राफी कोर्स के सैकड़ों छात्रों को बड़ी राहत दी है।

खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश को आंशिक रूप से रद्द करते हुए मामला पुनः सुनवाई के लिए एकलपीठ के समक्ष भेज दिया है।

पहले इन छात्रों के रजिस्ट्रेशन को राजस्थान पैरामेडिकल काउंसिल (RPMC) ने इस आधार पर रद्द कर दिया था कि उनके कोर्स को मान्यता प्राप्त नहीं है।

काउंसिल के इस फैसले के खिलाफ छात्रों ने Rajasthan Highcourt की एकलपीठ में याचिकाएं दायर कर आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन एकलपीठ ने छात्रों की याचिकाएं खारिज करते हुए राजस्थान पैरामेडिकल काउंसिल के निर्णय को सही ठहराया था।

Nims University बना पक्षकार

एकलपीठ के फैसले से Nims University और उसके सैकड़ों छात्रों को बड़ा झटका लगा था. इसके बाद प्रभावित छात्रों ने एकलपीठ के आदेश के खिलाफ खंडपीठ में अपील दायर कर दी।

हालांकि Nims University मूल रिट याचिका में पक्षकार नहीं थी, लेकिन उसे 20 जनवरी 2017 को एक आदेश के तहत अपील दायर करने की अनुमति दी गई थी।

यह है मामला

राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने सहायक रेडियोग्राफर (Assistant Radiographer), लैब तकनीशियन (Lab Technician) और प्रयोगशाला सहायक (Laboratory Assistant) के पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था।

इसके बाद कुछ अभ्यर्थियों ने यह कहते हुए रिट याचिका दायर की कि उनके पास आवश्यक योग्यता और अनुभव होने के बावजूद उनकी उम्मीदवारी यह कहकर अस्वीकार कर दी गई कि वे अयोग्य हैं।

इन अभ्यर्थियों ने अपने-अपने डिप्लोमा जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर, निम्स यूनिवर्सिटी, जयपुर, टेक्निकल यूनिवर्सिटी, पंजाब, जीवाजी यूनिवर्सिटी, मानव भारती यूनिवर्सिटी तथा अन्य संस्थानों से प्राप्त किए थे।

एकलपीठ के समक्ष यह प्रश्न था कि क्या याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों के पास विज्ञापन तथा राजस्थान मेडिकल एंड हेल्थ सबऑर्डिनेट सर्विस रूल्स, 1965 के अनुसार आवश्यक योग्यता थी या नहीं।

एकलपीठ का आदेश

अभ्यर्थियों के अनुसार उन्होंने अपने-अपने संस्थानों से सहायक रेडियोग्राफर और लैब तकनीशियन के डिप्लोमा प्राप्त किए थे।

इसके बावजूद, एकलपीठ ने यह कहते हुए रिट याचिकाएं खारिज कर दीं कि याचिकाकर्ता यह सिद्ध नहीं कर सके कि जिन विश्वविद्यालयों या संस्थानों से उन्होंने डिप्लोमा प्राप्त किया है, वे संस्थान राजस्थान पैरामेडिकल काउंसिल विनियम, 2014 के अनुसार आवश्यक संरचनात्मक सुविधाओं (infrastructural facilities) से युक्त थे।

एकलपीठ ने यह भी माना कि याचिकाकर्ताओं द्वारा ऐसे कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए जिनसे यह स्पष्ट होता कि उनके संस्थानों को राज्य सरकार, केंद्र सरकार या राजस्थान पैरामेडिकल काउंसिल (RPMC) से मान्यता प्राप्त थी, जो उन्हें संबंधित पदों के लिए आवेदन करने का अधिकार देती है।

अपील में दलील

एकलपीठ के आदेश के खिलाफ छात्रों और निम्स यूनिवर्सिटी की ओर से अधिवक्ता तनवीर अहमद, सुनील कुमार शर्मा, कृतिका राजावत, आयुष बिश्नोई, एस.एस. होरा, अचिन्त्य कौशिक, रघुनंदन शर्मा और अभिनव श्रीवास्तव ने पैरवी की।

अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि यह मुद्दा पहले ही खंडपीठ द्वारा राजस्थान पैरामेडिकल काउंसिल बनाम तारा चंद शर्मा एवं अन्य मामले में 6 मई 2024 को तय किया जा चुका है।

उन्होंने कहा कि उस निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया था कि निम्स यूनिवर्सिटी राजस्थान, जयपुर अधिनियम, 2008 की अनुसूची-II (Schedule-II) में ये पाठ्यक्रम (Diploma Courses) शामिल हैं, और इस कारण राजस्थान पैरामेडिकल काउंसिल (RPMC) उन अभ्यर्थियों का पंजीकरण करने के लिए बाध्य है जिन्होंने 2014 के विनियम की धारा 42 के तहत पंजीकरण के लिए आवेदन किया है।

अधिवक्ताओं ने यह भी दलील दी कि जिन डिप्लोमा कोर्सों का प्रश्न है, वे विश्वविद्यालय अधिनियम की अनुसूची-II में स्पष्ट रूप से सम्मिलित हैं, तथा आवश्यक अनुमति से संबंधित सभी दस्तावेज रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किए जा चुके हैं।

हाईकोर्ट का आदेश

दलीलें सुनने के बाद Rajasthan Highcourt की खंडपीठ ने कहा कि यह देखा जाना आवश्यक है कि छात्रों द्वारा प्राप्त डिप्लोमा संबंधित विश्वविद्यालय अधिनियम की अनुसूची-II (Schedule-II) में शामिल हैं या नहीं, और ये कोर्स नियमित शिक्षा (Regular Mode) के तहत किए गए हैं या डिस्टेंस एजुकेशन मोड में।

Rajasthan Highcourt ने यह भी कहा कि यदि कोर्स विश्वविद्यालय अधिनियम की अनुसूची-II में शामिल हैं, तो राजस्थान पैरामेडिकल काउंसिल (RPMC) छात्रों का पंजीकरण करने के लिए बाध्य होगी।

Rajasthan Highcourt खंडपीठ ने इसके साथ ही एकलपीठ के आदेश पर रोक लगाते हुए मामला पुनः सुनवाई के लिए एकलपीठ को भेज दिया

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