हाईकोर्ट ने कहा वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं कर सकती कोर्ट
जयपुर, 3 नवंबर 2025
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले में नाबालिग से रेप के मामले में रेप और पॉक्सो ( Rape and POCSO ) के तहत आरोपी को, पीड़िता के बालिग होने के बाद दिए गए बयान और विवाह करने के दस्तावेज पेश करने पर एफआईआर रद्द करने का आदेश दिया है।
जस्टिस अनुप कुमार धंड की एकलपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए कहा कि “किसी भी सभ्य समाज का कानून निश्चित नहीं होता; वह समाज की आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।”
मामले के आरोपी ने जेल में रहने के दौरान अंतरिम जमानत पर बाहर आकर पीड़िता से शादी की थी और याचिकाकर्ता आरोपी फिलहाल जयपुर की सेंट्रल जेल में बंद है।
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने आरोपी के खिलाफ रेप और पॉक्सो की धाराओं में दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि जब कोई बालिग पीड़िता आरोपी से विवाह कर ले और स्वयं अदालत के समक्ष यह कहे कि वह आरोपी के साथ खुशहाल वैवाहिक जीवन जीना चाहती है, तो अदालत ऐसे मामलों में “वास्तविक परिस्थितियों” को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
कानून कठोरता के लिए नहीं
जस्टिस अनुप कुमार धंड ने अपने आदेश में कहा कि कानून किसी सभ्य समाज का स्थायी ढांचा नहीं है, बल्कि यह समय और परिस्थितियों के साथ बदलता रहता है।
उन्होंने प्रसिद्ध विधिवेत्ता ब्लैकस्टोन और अमेरिकी जज बेंजामिन कार्डोजो के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि “कानून का अंतिम उद्देश्य समाज का कल्याण है।”
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि बलात्कार जैसे अपराध गंभीर और अमानवीय होते हैं, लेकिन जब पीड़िता स्वयं यह कहे कि वह आरोपी के साथ रहना चाहती है और उनकी शादी कानूनी रूप से पंजीकृत है, तो ऐसे में अदालत को व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
फैसला नज़ीर नहीं
राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए दिए इस महत्वपूर्ण फैसले में यह भी स्पष्ट किया है कि इस फैसले को नज़ीर (precedent) के रूप में पेश नहीं किया जा सकेगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह आदेश केवल इस विशेष मामले की परिस्थितियों में दिया गया है। इसे भविष्य में किसी अन्य मामले में नज़ीर के रूप में लागू नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने कहा —
“यह निर्णय पीड़िता और आरोपी के विवाह तथा उनके सुखी जीवन को ध्यान में रखकर लिया गया है। ऐसे मामलों में सामान्य रूप से पॉक्सो या बलात्कार के मामलों को समझौते के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने आरोपी को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया, बशर्ते कि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।
रेप, मुकदमा, जेल, बेल और रिहाई
मामला जयपुर उत्तर के आमेर थाना क्षेत्र में वर्ष 2021 का है जब पीड़िता नाबालिग थी और उसके साथ आरोपी ने रेप किया था।
शिकायत पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 376 और पॉक्सो एक्ट की धारा 3/4 के तहत मामला दर्ज किया था।
पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
जेल में रहते हुए की थी शादी
पीड़िता के साथ रेप के आरोपी को पीड़िता से ही शादी के लिए अंतरिम जमानत मिली थी।
आरोपी ने जेल में रहते हुए अदालत से शादी के लिए अंतरिम जमानत की मांग की थी।
8 मई 2025 को हाईकोर्ट ने यह अनुमति दी और जमानत पर रिहा होने के बाद आरोपी ने पीड़िता से विवाह किया।
और अब रिहा करने का आदेश
हाईकोर्ट ने इस फैसले में आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए रिहा करने का आदेश दिया है।
अदालत ने माना कि इस विशेष मामले में मुकदमे को जारी रखने से पीड़िता और आरोपी दोनों के वैवाहिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
कोर्ट ने कहा — इसलिए अदालत ने विशेष न्यायाधीश, पॉक्सो एक्ट-2, जयपुर मेट्रोपॉलिटन-II में चल रहे मुकदमे की कार्यवाही को रद्द करने का आदेश दिया है।
साथ ही आरोपी के खिलाफ कोई अन्य केस नहीं होने पर रिहा करने का आदेश दिया है।
कोर्ट में पेश हुई थी पीड़िता
मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता स्वयं अदालत में पेश हुई और अपने वकील की मौजूदगी में बताया कि उसने आरोपी से 14 मई 2025 को मुस्लिम रीति-रिवाज से विवाह किया है तथा 15 मई 2025 को विवाह का पंजीकरण भी कराया है।
अपने बयानों में पीड़िता ने स्पष्ट कहा कि वह अब आरोपी के साथ शांतिपूर्ण और खुशहाल वैवाहिक जीवन जी रही है और उसे किसी तरह की आपत्ति नहीं है।
पीड़िता ने अदालत से आग्रह किया कि अब इस मुकदमे को खत्म कर दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता S.S. Hora, T.C. Vyas और Himanshu Agarwal ने अदालत में पैरवी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में कई मामलों में ऐसी परिस्थितियों में एफआईआर रद्द की है, जिनमें पीड़िता और आरोपी ने बाद में विवाह कर लिया था।
उन्होंने विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट के मामलों के. धंडपानी बनाम स्टेट ऑफ तमिलनाडु (2022), महेश मुकुंद पटेल बनाम स्टेट ऑफ यूपी (2025), और के. किरुबाकरण बनाम स्टेट ऑफ तमिलनाडु (2025) का हवाला देते हुए कहा कि इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक और पारिवारिक जीवन की स्थिरता को ध्यान में रखते हुए “न्याय में करुणा और व्यावहारिकता” का संतुलन बनाने की बात कही है.