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कार्मिक की मृत्यु के बाद जन्मे पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार, Rajasthan Highcourt ने सरकार को जारी किया नोटिस

Rajasthan HC Grants Relief, Says ‘Unsatisfactory’ Entry Can’t Hinder Employee Promotion

जोधपुर, 11 नवंबर

राज्य के शिक्षा विभाग ने एक कार्मिक की मृत्यु के बाद जन्मे पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति देने से इंकार कर दिया है।

कार्मिक पिता की मृत्यु के समय पुत्र अपनी गर्भवती मां की कोख में था और पिता की मृत्यु के बाद उसका जन्म हुआ।

पिता की सेवा के दौरान मृत्यु के आधार पर पुत्र ने शिक्षा विभाग में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, जिसे विभाग ने देरी के आधार पर खारिज कर दिया।

Rajasthan Highcourt के जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की एकलपीठ ने मृतक कार्मिक के पुत्र की याचिका पर शिक्षा विभाग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

Rajasthan Highcourt ने सरकार को जवाब के लिए तीन सप्ताह का समय देते हुए मामला फिर से 27 नवंबर को सूचीबद्ध करने के आदेश दिए हैं।

वर्ष 2003 में हुआ कार्मिक का निधन

डीडवाना के बेरी गांव निवासी समीर खान के पिता सुलेमान खान की वर्ष 2003 में सेवा के दौरान मृत्यु हो गई थी। सुलेमान खान शिक्षा विभाग में कार्यरत थे।

कार्मिक सुलेमान खान के निधन के समय उनकी पत्नी गर्भवती थीं, जिन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद पुत्र समीर खान को जन्म दिया।

बालिग होने पर समीर खान ने अपने पिता के स्थान पर अनुकंपात्मक नियुक्ति के लिए आवेदन किया, तो सरकार ने इसे “देरी” का हवाला देते हुए अस्वीकार कर दिया।

सरकार ने Supreme Court के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि कार्मिक की मृत्यु के कई वर्षों बाद अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती.

हाईकोर्ट में दलील

अधिवक्ता रजाक हैदर के जरिए Rajasthan Highcourt में दायर की गई याचिका में दलील दी गई कि याचिकाकर्ता अपने पिता के निधन के समय मां की कोख में था और उसके बड़े भाई के नि:शक्त होने के कारण आवेदन करने में देरी हुई.

याचिका में कहा गया कि पिता के निधन के बाद उनका परिवार आर्थिक संकट में है.

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसके आवेदन करने में हुई देरी “प्राकृतिक देरी” है क्योंकि वह अपने जन्म से पहले आवेदन नहीं कर सकता था।

अधिवक्ता ने कहा कि राज्य सरकार ने Supreme Court के उमेश कुमार नागपाल बनाम हरियाणा राज्य के फैसले की गलत व्याख्या की है।

अधिवक्ता ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता का परिवार आज भी आर्थिक संकट से जूझ रहा है, ऐसे में यह मामला संविधान के तहत दिए गए समानता और न्याय के अधिकार से जुड़ा है।

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