नई दिल्ली, 20 नवंबर
अरावली हिल्स और अरावली रेंज की परिभाषा को लेकर दशकों से चली आ रही अनिश्चितता को समाप्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला देते हुए स्पष्ट कर दिया कि अब पूरे देश में अरावली का दायरा किस भू-भाग को माना जाएगा। अब वैज्ञानिक परिभाषा के आधार पर सभी राज्यों में खनन गतिविधियों का मूल्यांकन होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने देश की पर्यावरणीय सुरक्षा में अरावली की केंद्रीय भूमिका को स्पष्ट करते हुए नई खनन लीज़ जारी करने पर अस्थायी रोक लगा दी है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने संवेदनशील क्षेत्रों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध तथा संपूर्ण पर्वतमाला का वैज्ञानिक अध्ययन कराने के महत्वपूर्ण आदेश जारी किए हैं।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता में जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अरावली भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो उत्तर भारत को मरुस्थलीकरण से बचाने वाली “ग्रीन वॉल” की तरह काम करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अरावली के निरंतर कटाव और अवैज्ञानिक खनन से न केवल पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो रहा है, बल्कि भूजल, वन आवरण, जैव-विविधता और करोड़ों लोगों की जल-सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो चुका है।
अरावली की नई परिभाषा को मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्र द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति की उस परिभाषा को भी मंजूरी दी, जिसके अनुसार 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले सभी भू-भाग, उनसे जुड़ी ढालियाँ, घाटियाँ, पहाड़ी आकृतियाँ और उनके पारिस्थितिक जुड़ाव वाले क्षेत्र अरावली पर्वतमाला का हिस्सा माने जाएंगे।
इससे पहले अलग-अलग राज्यों में अरावली की भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ होने के कारण खनन क्षेत्र की पहचान में भ्रम था। नई परिभाषा से अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण दायरे में आ जाएगा।
वैज्ञानिक अध्ययन और मैनेजमेंट प्लान
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय को आदेश दिया है कि अरावली पर्वतमाला का समग्र भू-पर्यावरणीय मूल्यांकन एवं सतत खनन के लिए मैनेजमेंट प्लान (MPSM) भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) से तैयार कराए।
कोर्ट ने कहा कि सरंडा वन क्षेत्र में अपनाए गए मॉडल की तरह अरावली के लिए भी वैज्ञानिक पद्धति से व्यापक अध्ययन अनिवार्य है, ताकि खनन गतिविधियों को नियंत्रित, संतुलित और पर्यावरण-संगत बनाया जा सके।
नई खनन लीज़ पर रोक, पुराने पट्टों के नवीनीकरण पर भी रोक
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि MPSM रिपोर्ट आने तक नई खनन लीज़ जारी नहीं की जाएगी और न ही पुराने पट्टों का नवीनीकरण होगा।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने वर्तमान में जारी वैध और अनुमत खनन गतिविधियाँ सख्त निगरानी के साथ जारी रहने की अनुमति दी है।
कोर्ट ने कहा कि “खनन केवल वैज्ञानिक और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप ही जारी रह सकेगा।”
अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि संरक्षित वन क्षेत्र, टाइगर रिज़र्व, ईएसज़ेड, डिफ़ॉल्ट ईएसज़ेड, रैमसर साइट्स, वेटलैंड, जलस्रोत और CAMPA से पुनर्स्थापित क्षेत्रों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।
इन संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी परिस्थिति में खनन की अनुमति नहीं दी जाएगी—चाहे MPSM तैयार हो जाए या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इनके 500 मीटर से 1 किलोमीटर तक के सुरक्षा क्षेत्र शामिल हैं।
अवैध खनन रोकने के लिए राज्यों को आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र में अवैध खनन को रोकने के लिए सभी राज्यों को सख्त निर्देश देते हुए कहा है कि एकीकृत ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करें, जिला स्तरीय टास्क फोर्स बनाएं, नियमित पर्यावरणीय मूल्यांकन करवाएं अवैध खनन पर तत्काल दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करें.
सुप्रीम कोर्ट की गंभीर चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अरावली का वन कवर तेजी से घट रहा है, रेगिस्तानी रेत पूर्व दिशा की ओर बढ़ रही है, कई जिलों में भूजल स्तर समाप्ति की कगार पर है।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि खनन इसी तरह चलता रहा तो अरावली का पारिस्थितिक ढांचा टूट जाएगा, जिसका प्रभाव दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक पड़ेगा।
वैध खनन जारी रहेगा, पर सख्त शर्तों के साथ
कोर्ट ने मौजूदा कानूनी खनन कार्य जारी रखने की अनुमति दी है, परंतु यह भी स्पष्ट किया कि यह गतिविधियाँ कड़े पर्यावरणीय निरीक्षण, निगरानी और सभी शर्तों के कठोर अनुपालन के अधीन रहेंगी।
कोर्ट ने कहा कि पूर्ण प्रतिबंध लगाना उचित नहीं होगा, क्योंकि ऐसे कदमों से पहले अवैध खनन को बढ़ावा मिला था और माफिया गतिविधियाँ मजबूत हुई थीं।
कोर्ट ने कहा कि बेहतर नियंत्रण, वैज्ञानिक निगरानी और तकनीकी मूल्यांकन का पालन ही समाधान है.
राजस्थान को बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से राज्य में न केवल वैध खनन गतिविधियाँ जारी रह सकेंगी, बल्कि वैज्ञानिक नियमन और पर्यावरणीय सुरक्षा के साथ एक दीर्घकालिक मॉडल भी विकसित होगा।
यह फैसला विशेष रूप से राजस्थान के लिए महत्वपूर्ण है, जहाँ अरावली पर्वतमाला का सबसे बड़ा भू-भाग मौजूद है और राज्य की कुल खनन गतिविधियों का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अरावली से जुड़े 17 जिलों में होता है।
इस मामले में MoEF&CC की ओर से ASG सुश्री ऐश्वर्या भाटी, राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा, हरियाणा सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह मौजूद रहे। वहीं अमिकस क्यूरी के रूप में पी. परमेश्वरन ने सहायता की।