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Rajasthan Highcourt का बड़ा फैसला: दुष्कर्म और Pocso मामलों में सिर्फ DNA रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, राज्य की अपील खारिज

Rajasthan High Court on Media Ethics: Press Freedom Does Not Mean Freedom Above Law, FIR Against Journalist Ashish Dave Not Quashed

हाईकोर्ट ने कहा कि DNA रिपोर्ट एक विशेषज्ञ की राय मात्र है, इसकी भूमिका सहायक (corroborative) है, लेकिन अकेले इसे दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।

जयपुर, 24 नवंबर

Rajasthan High court की जयपुर पीठ ने पॉक्सो के मामले में एक महत्वपूर्ण बड़ा फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि दुष्कर्म और Pocso Act जैसे मामलों में केवल डीएनए रिपोर्ट को आधार बनाकर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि अभियोजन जांच, गवाहों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के माध्यम से यह सिद्ध न कर दे कि अपराध वास्तव में हुआ है।

Justice Anoop Kumar Dhand की एकलपीठ ने अपने इस फैसले में राज्य सरकार की ओर से दायर क्रिमिनल लीव टू अपील को खारिज करते हुए DNA रिपोर्ट होने के बावजूद Pocso Act मामले में ट्रायल कोर्ट का आरोपी को बरी करने के फैसले को सही ठहराया है।

Rajasthan High courtने कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला तर्कसंगत और कानून की दृष्टि से सही है।

पिता ने दर्ज कराया मुकदमा

मामला बूंदी जिले के डबलाना थाना क्षेत्र की एक नाबालिग लड़की से जुड़े पॉक्सो और दुष्कर्म के मुकदमे से जुड़ा है। जिसमें श्याम कुमार नामक 26 वर्षीय युवक पर नाबालिग का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म करने के चलते Pocso Act की गंभीर धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।

4 फरवरी 2022 को पीड़िता के पिता ने पुलिस थाना डबलाना में लिखित रिपोर्ट दी, जिसमें आरोप लगाया गया कि एक दिन पूर्व 3 फरवरी को आरोपी श्याम कुमार उनकी नाबालिग बेटी को घर से बहला-फुसलाकर भगा ले गया।

पिता की शिकायत में यह भी दर्ज किया गया कि लड़की के साथ कुछ आभूषण और नकद भी ले गए।

पिता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 363 सहित पॉक्सो अधिनियम की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया।

जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट कोर्ट में प्रस्तुत की गई और ट्रायल शुरू हुआ।

नाबालिग बेटी ने किया इनकार

मुकदमे की ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष की सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि इस मामले में स्वयं नाबालिग पीड़िता ने ही अदालत में दिए गए बयान में अभियोजन का साथ नहीं दिया।

पीड़िता ने अदालत में कहा कि आरोपी ने उसके साथ किसी प्रकार का दुष्कर्म या जबरन कार्रवाई नहीं की।

बयान दर्ज होने के बाद अभियोजन ने उसे hostile घोषित कर दिया, जबकि मेडिकल साक्ष्यों में भी पीड़िता के साथ किसी यौन हिंसा की पुष्टि नहीं हो पाई।

ट्रायल कोर्ट ने किया बरी

अभियोजन ने 9 गवाहों के बयान दर्ज करवाए, किन्तु कोई भी गवाह, चिकित्सीय रिपोर्ट, या दस्तावेज इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा कि आरोपी वास्तव में यौन अपराध का दोषी था।

मामले में आरोपी की DNA रिपोर्ट भी हासिल की गई थी।

ट्रायल कोर्ट ने 21 अक्टूबर 2023 को दिए फैसले में कहा कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ संदेह से परे अपराध सिद्ध करने में विफल रहा है और इसलिए आरोपी को सभी आरोपों से बरी किया जाता है।

ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती

ट्रायल कोर्ट के फैसले से असहमति जताते हुए राज्य सरकार ने Highcourt में क्रिमिनल लीव टू अपील दायर की।

राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अमित पुनिया ने दलील दी कि भले ही पीड़िता अदालत में पलट गई हो, लेकिन DNA रिपोर्ट आरोपी की संलिप्तता को सिद्ध करती है।

सरकार ने कोर्ट में कहा कि DNA वैज्ञानिक प्रमाण होने के कारण इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

राज्य का कहना था कि DNA रिपोर्ट इस बात का वैज्ञानिक साक्ष्य है कि आरोपी का संबंध अपराध से है, और इसका महत्व अन्य किसी प्रत्यक्ष गवाही से कम नहीं समझा जाना चाहिए।

सरकार ने कहा कि किसी भी मुकदमे के लिए DNA रिपोर्ट एक मजबूत आधार है।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की लंबी बहस के बाद हाईकोर्ट ने अपने जजमेंट में कहा कि ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड, गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और कानूनी स्थिति का विश्लेषण करने के बाद ट्रायल कोर्ट के फैसले को गलत नहीं कहा जा सकता।

Rajasthan High court ने कहा कि—

किसी भी आपराधिक मुकदमे में ‘दोष साबित करने’ का दायित्व पूरी तरह अभियोजन पर होता है। अपराध की एक-एक कड़ी साक्ष्यों द्वारा अदालत के समक्ष प्रमाणित होनी चाहिए।

सहायक सबूत,खुद में पर्याप्त नहीं DNA

Rajasthan High court ने अपने फैसले में कहा कि DNA रिपोर्ट वैज्ञानिक साक्ष्य अवश्य है, लेकिन यह तभी प्रभावी है जब अभियोजन अन्य प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत कर सके।

Rajasthan High court ने कहा कि केवल DNAरिपोर्ट को आधार बनाकर किसी को दोषी घोषित कर देना उचित नहीं है।

Rajasthan High court ने राजस्थान हाईकोर्ट के दो पूर्व फैसलों—डल्ला राम वर्सेज स्टेट ऑफ राजस्थान (2022) और भगवान बैरवा वर्सेज स्टेट ऑफ राजस्थान (2023)—का हवाला देते हुए कहा कि—

“सिर्फ DNA रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जब तक विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध न हों, डीएनए को निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।”

विशेषज्ञ की राय मात्र

Rajasthan High courtने कहा कि DNA रिपोर्ट एक विशेषज्ञ की राय मात्र है। इसकी भूमिका सहायक (corroborative) है, लेकिन अकेले इसे दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।

Highcourt ने कहा कि विशेषकर जब पीड़िता, परिवार, स्वतंत्र गवाह और मेडिकल रिपोर्ट आरोपों की पुष्टि नहीं करते।

Highcourt ने सुप्रीम कोर्ट के Manoj vs State of MP फैसले का भी हवाला देते हुए कहा कि—

डीएनए विज्ञान विकसित हो रहा क्षेत्र है, और मानवीय त्रुटि या तकनीकी विसंगतियों से इनकार नहीं किया जा सकता।

अपराध सिद्ध होना जरूरी

Highcourt ने कहा कि पॉक्सो मामलों में धारा 29 और 30 की presumption तभी लागू होती है जब अपराध साबित हो।

Highcourt ने यह भी स्पष्ट किया कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 29 और 30 के तहत आरोपी के विरुद्ध presumption (कानूनी धारणा) तभी लागू होती है जब अभियोजन यह सिद्ध कर दे कि- अपराध हुआ, और आरोपी द्वारा किया गया।

Highcourt ने कहा कि इस मामले में पीड़िता ने आरोप से इनकार कर दिया और कोई प्रत्यक्ष गवाह उपलब्ध नहीं था।

मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी अभियोजन का समर्थन नहीं करते थे।

हाईकोर्ट ने कहा—

“जब अपराध सिद्ध ही नहीं होता, तो presumption लागू होने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता।”

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