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संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत भारत में विदेशी नागरिकों को भी समान रूप से जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त : Rajasthan High court

Right to Life and Liberty under Article 21 Applies to Foreign Nationals as Well: Rajasthan High Court

बहुचर्चित अवैध किडनी ट्रांसप्लांट और मानव अंग तस्करी के मामले में आरोपी बांग्लादेशी नागरिकों की अपराधिक विविध याचिका निस्तारित, ट्रायल कोर्ट को दिए शीघ्र ट्रायल करने के आदेश

जयपुर, 25 नवंबर

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई (Speedy Trial) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) का मौलिक अधिकार केवल भारतीय नागरिकों का ही नहीं, बल्कि विदेशी नागरिकों को भी प्राप्त है।

जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने राजस्थान के बहुचर्चित अवैध किडनी प्रत्यारोपण और मानव अंग तस्करी से जुड़े मामले में दायर दो आरोपियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में मौजूद सभी व्यक्तियों, जिनमें विदेशी नागरिक भी शामिल हैं, पर लागू होता है।

जीवन और गरिमा का अधिकार मानवाधिकार है जो सभी मनुष्यों को उपलब्ध है।

हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार—

“किसी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता।”

ट्रायल में देरी पर नाराजगी

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अदालत को बताया कि अभी तक ट्रायल कोर्ट ने किसी भी आरोपी पर आरोप तय नहीं किए हैं और मामले की अगली तारीख नवंबर 2025 तय है।

इस अत्यधिक देरी पर अदालत ने गंभीर नाराज़गी व्यक्त की और कहा कि ऐसे मामलों में सुनवाई तेज गति से होनी चाहिए, क्योंकि न्याय में देरी पीड़ित, अभियोजन और आरोपी—सभी के हितों के विपरीत है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह ट्रायल की गति तेज करे और साक्ष्य जल्द से जल्द रिकॉर्ड करे।

निष्पक्ष और शीघ्र सुनवाई का अधिकार

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष और शीघ्र सुनवाई अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा है।

आपराधिक मामलों में निष्पक्ष प्रक्रिया अनुच्छेद 21 का अनिवार्य तत्व है और इसमें भारतीय तथा विदेशी नागरिकों के बीच कोई अंतर नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि विदेशी नागरिक, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल हैं, जो भारत में मुकदमे का सामना कर रहे हैं, उन्हें भी अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा का अधिकार प्राप्त है। यह अधिकार एक सशक्त रक्षा कवच की तरह है, जो सीमाओं से परे सभी मनुष्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) और के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बिना ट्रायल के लंबे समय तक हिरासत में रखना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो सकता है.

बहुचर्चित अंग तस्करी से जुड़ा मामला

मामला राजधानी जयपुर में अवैध किडनी प्रत्यारोपण और मानव तस्करी से जुड़ा है। जयपुर जवाहर सर्किल पुलिस ने इस मामले में मार्च–अप्रैल 2024 में देशभर से कई आरोपियों को गिरफ्तार किया था।

बहुचर्चित अंग तस्करी के मामले में जयपुर पुलिस ने हरियाणा से याचिकाकर्ता आरोपी नुरूल इस्लाम और अहसानुल कबीर को गिरफ्तार किया था।

बाद में जांच के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अभियोजन पक्ष का सहयोग करने की मांग की और अपने खिलाफ लगे आरोपों को स्वीकार करते हुए अन्य आरोपियों के खिलाफ गवाही देने की सहमति जताई।

इस आधार पर कोर्ट ने उन्हें CrPC धारा 306 के तहत ‘अप्रूवर’ बनने की अनुमति दे दी। इसके बाद मुकदमे की अगली कार्यवाही ट्रायल कोर्ट में जारी है।

अप्रूवर बनने के आधार पर याचिका

ट्रायल जारी रहने के दौरान याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में अपराधिक विविध याचिका दायर कर यह दलील दी कि वे अभियोजन की सहायता कर रहे हैं, इसलिए उन्हें हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने कहा कि वे जांच में सहयोग कर रहे हैं और आगे भी अदालत में उपस्थित रहेंगे।

सरकार का विरोध

राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया।

सरकार ने कहा कि CrPC की धारा 306(4) स्पष्ट रूप से निर्देश देती है कि अप्रूवर बनने वाले आरोपी को बयान रिकॉर्ड होने तक न्यायिक हिरासत में रहना होगा।

सरकार ने कहा कि यदि आरोपी को इस चरण पर जमानत दे दी जाती है और बाद में वह बयान बदलकर शत्रुतापूर्ण (Hostile) हो जाता है, तो उसे दोबारा गिरफ्तार करना कठिन हो जाएगा, जिससे पूरी प्रक्रिया लंबी और जटिल हो जाएगी।

अभियोजन पक्ष ने यह भी याद दिलाया कि राजस्थान हाईकोर्ट की बड़ी पीठ ने “नूर टकी उर्फ मम्मू बनाम राज्य” मामले में स्पष्ट किया है कि अप्रूवर बनने वाले आरोपी को बयान दर्ज होने तक हिरासत में रहना अनिवार्य है।

शीघ्र ट्रायल करने के आदेश

इस मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए ट्रायल कोर्ट को लंबित कार्यवाही को त्वरित गति से आगे बढ़ाने के निर्देश देना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को आदेश दिए हैं कि वह सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आरोप/खारिजी (Discharge) पर चार सप्ताह में आदेश पारित करे।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि यदि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय कर दिए जाते हैं, तो वह याचिकाकर्ताओं के बयान को प्राथमिकता के आधार पर अप्रूवर गवाह संख्या 1 एवं 2 के रूप में दर्ज करे।

हाईकोर्ट ने मामले के दोनों बांग्लादेशी आरोपियों को यह छूट दी है कि वे अपने बयान दर्ज होने के बाद हाईकोर्ट में जमानत याचिका पेश कर सकते हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इसी फैसले में दोहराया है कि किसी आपराधिक मामले में यदि कोई आरोपी स्वयं आगे बढ़कर अभियोजन पक्ष का सहयोग करने और ‘Approver’ बनने की अनुमति मांगता है, तो उसे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 306(4) के अनुसार तब तक जमानत नहीं दी जा सकती जब तक उसके बयान रिकॉर्ड न हो जाएं या मुकदमे की सुनवाई पूरी न हो जाए।

जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल निर्णय में कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करना और साक्ष्यों की रक्षा करना है, ताकि गवाह किसी बाहरी दबाव, लालच या धमकी से प्रभावित न हो सके।

कानून का उद्देश्य-न्याय की सुरक्षा

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 306(4) एक सुरक्षा उपाय है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गवाह किसी बाहरी दबाव, धमकी, भय या प्रलोभन से प्रभावित न हो और उसके बयान स्वतंत्र एवं निष्पक्ष हों।

।राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मामले में यदि कोई आरोपी स्वयं आगे बढ़कर अभियोजन पक्ष का सहयोग करने की इच्छा जताता है और approver गवाह बनने की अनुमति मांगता है, तो उसे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 306(4) के अनुसार तब तक जमानत नहीं दी जा सकती, जब तक उसके बयान कोर्ट में रिकॉर्ड न हो जाएं या मुकदमे की सुनवाई पूरी न हो जाए।

जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करना और साक्ष्यों की रक्षा करना है, ताकि गवाह किसी बाहरी दबाव, लालच या धमकी से प्रभावित न हो सके

हाईकोर्ट का आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एप्रवूर से जुड़े दो अन्य महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट किए—

  1. अप्रूवर बनने वाला आरोपी स्वचालित रूप से जमानत पाने का हकदार नहीं हो जाता।
  2. धारा 306(4) के तहत उसके बयान रिकॉर्ड होने तक हिरासत अनिवार्य है।

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