पेंशन में 34 लाख मिले” कहकर नियुक्ति ठुकराना गलत, हाईकोर्ट ने कहा-अनुकंपा नियुक्ति में ‘अत्यंत निर्धनता’ की कठोर परिभाषा लागू नहीं-परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति देखे अधिकारी
जयपुर, 27 नवंबर
राजस्थान हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि करुणा आधारित नियुक्ति (Compassionate Appointment) के लिए परिवार का ‘सड़क पर आ जाना’ या ‘भिखारी जैसी हालत’ में होना आवश्यक नहीं है।
जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि- “करुणा को अंकगणित के खेल में नहीं बदला जा सकता।”
हाईकोर्ट ने ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स के उस आदेश को रद्द करते हुए यह फैसला दिया है, जिसमें एक मृतक कर्मचारी के बेटे को केवल इसलिए नौकरी देने से इनकार कर दिया गया था क्योंकि परिवार को रिटायरमेंट लाभ के रूप में लगभग ₹34 लाख मिले थे।
जस्टिस फरजंद अली ने मामले को फिर से बैंक को भेजते हुए आदेश दिया हैं कि वह 4 सप्ताह के भीतर मामले पर दोबारा विचार करे और “तर्कसंगत आदेश” जारी कर नियुक्ति प्रदान करें।
हाईकोर्ट ने बैंक के रवैये पर हैरानी जताते हुए कहा कि-
“अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को भुखमरी से बचाना है, न कि भुखमरी की स्थिति आने का इंतजार करना।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति एक सामाजिक-कल्याण आधारित व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य परिवार को अचानक हुए आर्थिक संकट से उबारना होता है, न कि यह देखना कि परिवार बिल्कुल “दरिद्र” है या नहीं.
‘इंडीजेंट’ शब्द की संकीर्ण गलत
जस्टिस फरजंद अली ने फैसले में “indigent” शब्द की परिभाषा को लेकर भी सख्त टिप्पणी की हैं.
कोर्ट ने कहा कि जो परिभाषा सिविल प्रक्रिया संहिता में मुकदमेबाजी के लिए दी गई है (जिसमें व्यक्ति के पास कुल एक हजार रुपये से अधिक की संपत्ति न हो), उसको अनुकंपा नियुक्ति पर लागू करना एक गंभीर त्रुटि है.
कोर्ट ने कहा—
“यदि इतनी कठोर परिभाषा को आधार बनाया जाए तो कोई भी सरकारी/बैंक कर्मचारी परिवार कभी भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र नहीं रह जाएगा। यह योजना फिर केवल कागज़ी औपचारिकता बनकर रह जाएगी।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार की तत्काल आर्थिक स्थिति को संभालना है, न कि यह देखना कि परिवार बिल्कुल भूखा या भिखारी जैसी स्थिति में है या नहीं।
बैंक ने कहा पेंशन में मिले 34 लाख, गरीब नहीं
मृतक दर्शन सिंह ओरियेंटल बैंक में असिस्टेंट मैनेजर थे, जिनकी 37 साल की सेवा के बाद 17 जनवरी 2019 को बीमारी से मौत हो गई थी.
अनुकंपा नियुक्ति के लिए किए गए बेटे के आवेदन को बैंक ने यह कहकर खारिज कर दिया कि मृतक कर्मचारी के परिवार को ग्रेच्युटी और पीएफ मिलाकर करीब 34.66 लाख रुपए मिले हैं.
बैंक ने इस आधार पर परिवार को ‘निर्धन’ या दयनीय स्थिति में (Indigent or Penurious Condition) में नहीं माना.
बैंक ने यह भी कहा कि परिवार में फैमिली पेंशन चल रही है और कोई आश्रित बेटी नहीं है.
बैंक की सक्षम समिति ने मृतक की उम्र, 37 साल की लंबी सेवा और अन्य कारकों को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि परिवार योजना के तहत पात्र नहीं है.
बैंक ने काटे 9 लाख
वही याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता की मां कमलजीत कौर ने पुनर्विचार याचिका में भी बैंक को बताया कि ग्रेच्युटी में से ही बैंक ने ओवरड्राफ्ट, व्हीकल लोन और फेस्टिवल लोन मिलाकर 8.58 लाख रु. काट लिए थे.
चार साल चले इलाज के लिए उन्होंने बजाज फाइनेंस, मुथूट फाइनेंस से कुल 7.5 लाख और बाजार से 7–8 लाख का कर्ज लिया था
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि परिवार किराए के मकान में रहता है, हरजीत बेरोजगार हैं और सारी देनदारियाँ चुकाने के बाद उनके पास कुछ नहीं बचा.
इसके बावजूद बैंक ने 7 मार्च 2020 को पुनर्विचार भी खारिज कर दिया.
बैंक द्वारा खारिज कि गयी पुनर्विचार अर्जी के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर कि गयी.
स्थितियों को नजरअंदाज नहीं कर सकते
हाईकोर्ट ने मामले में याचिकाकर्ता की ओर से दी गई दलीलों पर कहा कि मृतक कर्मचारी परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था.
मृतक चार वर्षों तक गंभीर बीमारी से जूझते रहे, जिसका खर्च परिवार को भारी कर्ज लेकर उठाना पड़ा हैं.
कोर्ट ने कहा कि बैंक ने ग्रेच्युटी और अन्य देयों से लगभग 9 लाख रुपये की वसूली की हैं जबकि परिवार पर बाजार का भारी कर्ज है और वे किराए के मकान में रहते हैं।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता स्वयं बेरोजगार है और इन सभी परिस्थितियों को नज़रअंदाज कर केवल यह कहना कि परिवार indigent नहीं है, गलत और गैर-मानवीय दृष्टिकोण है.
देनदारियाँ और परिस्थितियाँ भी देखी जाएँगी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि बैंक अधिकारी यह नहीं तय कर सकते कि परिवार केवल इसलिए आर्थिक संकट में नहीं है क्योंकि उसे मृत्यु उपरांत कुछ रकम मिली है या उसे पारिवारिक पेंशन मिलती है.
हाईकोर्ट ने कहा कि क्योंकि यह रकम एक बार की है और उस पर मेडिकल खर्च व कर्ज की अदायगी का भार भी जुड़ा होता है.
इसलिए अधिकारियों को इन बातों का मूल्यांकन करना अनिवार्य है कि कुल देनदारियाँ कितनी हैं,
इलाज पर कितना खर्च हुआ, बैंक द्वारा कितनी रिकवरी कि गई, आश्रितों की बेरोजगारी स्थिति
परिवार की वास्तविक दैनिक आय और व्यय क्या हैं.
Pauper की परिभाषा कानूनी बिंदु
हाईकोर्ट ने मामले में कानूनी बिंदु को लेकर कहा कि CPC (सिविल प्रोसीजर कोड) की ‘कंगाल’ (Pauper) की परिभाषा यहां लागू नहीं होगी।
“वेतनभोगी कर्मचारी मरने के बाद भी परिवार को भिखारी की हालत में आना आवश्यक नहीं है।”
हाईकोर्ट ने टर्मिनल बेनिफिट्स को ‘आय’ नहीं मानते हुए स्पष्ट किया कि PF और ग्रेच्युटी जीवन सुरक्षा के लिए हैं, इन्हें स्थायी आय मान लेना गलत है।
हाईकोर्ट ने बैंक की स्कीम में विरोधाभास को लेकर कहा कि नियम-10 के अनुसार, परिवार में कमाने वाला सदस्य होने पर भी अनुकंपा नियुक्ति दी जा सकती है।
जिस पर कोर्ट ने कहा—
“जब कमाने वाले सदस्य के रहते नियुक्ति संभव है, तो बेरोजगार बेटे को ‘गरीब नहीं हो’ कहकर कैसे मना किया जा सकता है?”
ये है मामला
मामला याचिकाकर्ता श्रीगंगानगर निवासी हरजीत सिंह का है। उनके पिता दर्शन सिंह ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स में असिस्टेंट मैनेजर थे और 37 वर्षों की सेवा के दौरान बीमारी के कारण 17 जनवरी 2019 को उनका निधन हो गया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, वे परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे।
हरजीत सिंह ने 19 मार्च 2019 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन बैंक ने 1 अक्टूबर 2019 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि मृतक कर्मचारी के परिवार को PF और ग्रेच्युटी मिलाकर ₹34.66 लाख प्राप्त हुए।
बैंक ने यह कहते हुए आवेदन को खारिज किया कि परिवार ‘Indigent or Penurious Condition’ में नहीं है और फैमिली पेंशन मिलने से आय का साधन मौजूद है।
पेंशन और ग्रेच्युटी से प्राप्त राशि के आधार पर बैंक की समिति ने निष्कर्ष निकाला कि परिवार योजना के तहत पात्र नहीं है.
याचिकाकर्ता की दलील
हाईकोर्ट में दायर याकिचा में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसके पिता की लम्बी बीमारी, लगातार उपचार और भारी कर्ज में डूबने के कारण परिवार पूर्ण आर्थिक संकट में आ गया.
इसके बावजूद बैंक ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि परिवार “इंडीजेंट (indigent)”—अर्थात बेहद निर्धन—श्रेणी में नहीं आता।
बैंक के आदेश रद्द
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बैंक द्वारा 1 अक्टूबर 2019 और 7 मार्च 2020 को दो बार जारी किए गए उन आदेशों को रद्द कर दिया हैं जिसमें आवेदन अस्वीकार कर दिया गया था.
हाईकोर्ट ने मामले को फिर से बैंक को भेजते हुए संबंधित सक्षम अधिकारी को आदेश दिया हैं कि वह
सभी तथ्यों को सही कानूनी मानकों के साथ परखते हुए और परिवार की संपूर्ण आर्थिक स्थिति का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करते हुए चार सप्ताह के भीतर नया आदेश जारी करे.
हाईकोर्ट ने आदेश दिया हैं कि यदि याचिकाकर्ता पात्र पाया जाता है, तो नियुक्ति का आदेश तुरंत जारी किया जाए.