राजस्थान हाईकोर्ट ने कक्षा 6 की बच्ची के बयानों के आधार पर शिक्षक के बर्खास्तगी आदेश को रखा बरकरार,
जयपुर, 28 नवंबर 2025
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक शिक्षक द्वारा कक्षा 6 की बच्ची के साथ किए गए यौन दुव्यवहार के मामले में बेहद सख्त नाराजगी जताते हुए शिक्षक के इस कृत्य को “गंभीर, घोर अनैतिक एवं शिक्षक के पद की गरिमा के विपरीत” बताया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कक्षा 6 की बच्ची के बयान के आधार पर किए गए शिक्षक के बर्खास्तगी आदेश को बरकरार रखते हुए रिपोर्टेबल और ऐतिहासिक फैसले में बेहद गंभीर टिप्पणियां की हैं।
JUSTICE VINIT KUMAR MATHUR और JUSTICE RAVI CHIRANIA की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि:
“हमारे समाज में स्त्री और विशेषकर बच्चियों की सुरक्षा सर्वोच्च नैतिक सिद्धांत है। शिक्षा जैसे पवित्र पेशे से जुड़े व्यक्ति का ऐसा व्यवहार न केवल अनुशासनहीनता है, बल्कि यह समाज के लिए घातक और अस्वीकार्य है।”
कोर्ट ने कहा कि एक शिक्षक, जो बच्चों का मार्गदर्शक और संरक्षक होता है, यदि ऐसा आचरण करता है तो उसके लिए किसी प्रकार की सहानुभूति नहीं दिखाई जा सकती।
खंडपीठ ने आरोपी शिक्षक की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था की पवित्रता बनाए रखना आवश्यक है और बच्चों की गरिमा व सुरक्षा सर्वोपरि है।
स्त्री और बालिकाओं का सम्मान सर्वोपरि
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले की शुरुआत संस्कृत श्लोक
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः…”
से करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में महिलाओं और बालिकाओं के प्रति सम्मान सर्वोच्च माना गया है। जो समाज अपनी बच्चियों का सम्मान नहीं करता, उसके सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।
इसलिए महिला एवं बालिका पर किसी प्रकार का अनैतिक कृत्य “केवल अपराध नहीं बल्कि समाज के नैतिक ढांचे पर प्रहार” है।
JUSTICE VINIT KUMAR MATHUR ने कहा कि एक समृद्ध देश में महिलाओं का सम्मान किया जाता है और यह हमारी संस्कृति का मूल आधार है।
हल्का नहीं किया जा सकता दंड
राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी शिक्षक द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के आचरण के मद्देनजर बर्खास्तगी ही सर्वाधिक उचित और कानूनसम्मत दंड है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा आचरण शिक्षा प्रणाली में “शून्य सहिष्णुता” के अंतर्गत आता है, जिसमें किसी तरह की दया नहीं दिखाई जा सकती।
ऐसे टीचर स्कूल में ही न रहें…
“यदि इस प्रकार के मामले में भी शिक्षक को सेवा में बनाए रखने पर विचार किया जाए तो यह समाज के लिए गलत संदेश होगा। विद्यालय बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान हैं, उनका संरक्षण सर्वोपरि है।”
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही अपने आदेश के अंत में कहा कि ऐसे मामलों में बाल पीड़ितों की पहचान उजागर न की जाए।
बच्ची का नाम रहे गोपनीय
हाईकोर्ट ने सलाह दी कि भविष्य में ऐसे मामलों में आदेश पारित करते समय, जांच रिपोर्टों में और किसी भी सरकारी दस्तावेज़ में बच्चियों का नाम गोपनीय रखा जाए।
हाईकोर्ट ने इस मामले में विभागीय जांच को सही बताते हुए CAT के आदेश को भी बरकरार रखा है।
कोर्ट ने कहा कि आरोप गंभीर और सिद्ध होते हैं, जिसके लिए बर्खास्तगी ही पूर्णतः वैध है।
आरोपी शिक्षक पर आरोप साबित
केंद्रीय विद्यालय नंबर–3, गांधीनगर कैंट (गुजरात) में TGT शिक्षक यतेन्द्र कुमार नागौरी के खिलाफ फरवरी 2015 में विद्यालय प्रशासन को कक्षा 6 की छात्रा ने शिकायत की कि शिक्षक लंबे समय से उसके साथ अनुचित तरीके से पेश आ रहे थे।
छात्रा ने यह भी कहा कि शिक्षक उसे स्टोर रूम में अकेला बुलाकर अनुचित स्पर्श करते थे और आपत्तिजनक बातचीत करते थे।
छात्रा ने पहली बार यह बात अपनी सहेली को बताई, जिसके बाद उसने अपनी शिक्षिका से संपर्क किया।
इसके बाद छात्रा ने अपने माता-पिता को यह जानकारी दी और माता-पिता ने विद्यालय में लिखित शिकायत दर्ज करवाई। शिकायत प्राप्त होते ही प्रिंसिपल ने जांच समिति गठित की।
विद्यालय स्तर की समिति ने 11 फरवरी 2015 को अपनी रिपोर्ट में आरोपों को prima facie सही पाया। इस रिपोर्ट के आधार पर शिक्षक को 12 फरवरी 2015 को निलंबित कर दिया गया।
इसके बाद अहमदाबाद क्षेत्रीय कार्यालय ने एक सार-संक्षिप्त जांच समिति गठित की, जिसने 18 मार्च 2015 को अपनी रिपोर्ट में कहा कि शिक्षक का व्यवहार “अनैतिक, यौन प्रकृति का और विद्यालय की गरिमा के विपरीत” था।
इस आधार पर केवीएस ने 4 मई 2015 को कारण बताओ नोटिस जारी किया। शिक्षक ने जवाब दिया, लेकिन विभाग ने इसे असंतोषजनक पाया और 16 अक्टूबर 2015 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
CAT ने भी खारिज की थी याचिका
आरोपी शिक्षक ने इस विभाग के फैसले को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), जयपुर में चुनौती दी थी।
CAT ने 28 अगस्त 2024 को विभागीय कार्रवाई को पूर्णतः सही ठहराते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
CAT के निर्णय को आरोपी शिक्षक ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने आरोपी शिक्षक की इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए यह रिपोर्टेबल जजमेंट सुनाया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी शिक्षक के खिलाफ जांच प्रक्रिया सुवैधानिक और निष्पक्ष रही है तथा छात्रा द्वारा लगाए गए आरोप प्रत्यक्ष, विश्वसनीय और गंभीर प्रकृति के हैं।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि “शिक्षक का ऐसा व्यवहार न केवल गंभीर अनुशासनहीनता है बल्कि समाज और शिक्षा प्रणाली दोनों के लिए घातक है। बच्चों के साथ किसी भी प्रकार के यौन या अशोभनीय आचरण को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कठोर और स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चियों के साथ यौन प्रकृति के अपराध किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकते। कोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विस्तृत आदेश जारी किया है।
छात्रा का बयान विश्वसनीय और स्वाभाविक
कोर्ट ने कहा कि छात्रा का बयान सरल, स्पष्ट और तार्किक है। वह किसी भी तरह की बनावट या बाहरी दबाव का परिणाम नहीं लगता।
हाईकोर्ट ने बच्ची के उस बयान को बेहद मार्मिक माना जिसमें बच्ची ने कहा कि मैने बहुत मना किया तो भी सर नहीं माने.
कोर्ट ने कहा कि:
“एक 11–12 वर्ष की कक्षा 6 की छात्रा इतनी परिपक्व नहीं होती कि वह इस प्रकार का झूठा और विस्तृत आरोप गढ़ सके। उसके बयान का स्वभाविक और भावनात्मक स्वरूप घटना की विश्वसनीयता को मजबूत करता है।”
कोर्ट ने यह भी माना कि छात्रा ने घटना को तुरंत अपनी सहेली, फिर शिक्षिका और फिर अपने माता–पिता को बताया, जिससे यह स्पष्ट है कि वह मनोवैज्ञानिक दबाव और डर में थी।
आठ अन्य छात्रों का बयान
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच रिपोर्टों के अनुसार आठ अन्य छात्रों ने भी बताया था कि छात्रा अक्सर परेशान और डर के माहौल में रहती थी। यह भी पाया गया कि शिक्षक द्वारा छात्रा को स्टोर रूम में अकेले बुलाने की बात कई छात्रों ने स्वीकार की।
कोर्ट ने कहा कि यह गवाही सीधे रूप से छात्रा के कथन को मजबूती देती है और घटना के परिवेश को प्रमाणित करती है।
शिक्षक की रंजिश वाली दलील खारिज
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि स्कूल की एक शिक्षिका के साथ विवाद के चलते उन्हें फंसाया गया।
कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा:
यह आरोप बाद में बनाया गया लगता है, इसका कोई साक्ष्य नहीं यदि किसी शिक्षक से व्यक्तिगत विवाद भी हो, तब भी छात्रा द्वारा ऐसा गंभीर आरोप लगाना संभव नहीं.
कोर्ट ने कहा कि “यह तर्क अविश्वसनीय और तर्कहीन है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसे बचाव के लिए बाद में गढ़ा गया।”
प्राकृतिक न्याय का पूर्ण पालन
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शिक्षक को कारण बताओ नोटिस दिया गया, उन्हें लिखित बचाव प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर दिया गया, विभाग ने जवाब पर विचार किया, जांच समिति स्वतंत्र रूप से गठित की गई थी।
इसलिए अनुच्छेद 81(B) शिक्षा संहिता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूरा पालन हुआ है।
कोर्ट ने कहा:
“न्याय के मूल सिद्धांतों का किसी प्रकार का उल्लंघन नहीं हुआ। प्रक्रिया पारदर्शी, विवेकपूर्ण और विधिसम्मत रही।”
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