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Reportable Judgement : सहकारी समितियों को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका, 3.50 करोड़ रुपये के 500-1000 के नोट हुए रद्दी

राजस्थान हाईकोर्ट ने माना नोटबंदी के दौरान सहकारी बैंकों पर आरबीआई का प्रतिबंध वैध, कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी जैसे नियामक निर्णयों में अदालतों को अत्यधिक संयम बरतना चाहिए

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ से प्रदेश की सहकारी बैंकों को बड़ा झटका लगा है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने नोटबंदी के दौरान प्रदेश की 7 सहकारी बैंकों पर आरबीआई द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को वैध ठहराया है।

जस्टिस डॉ. पुष्पेन्द्र सिंह भाटी और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने दुधू ग्राम सेवा सहकारी समिति लिमिटेड सहित सात सहकारी समितियों की ओर से दायर याचिकाओं पर रिपोर्टेबल जजमेंट पारित किया है.

रिज़र्व बैंक ने लगाया था प्रतिबंध

नोटबंदी के दौरान जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (डीसीसीबी) और प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों (पीएसीएस) द्वारा 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट स्वीकार करने पर प्रतिबंध लगाया गया था।

प्रतिबंध लगाने के दौरान इन बैंकों ने आम जनता से करीब 3.50 करोड़ रुपये के पुराने नोट स्वीकार कर लिए थे।

लेकिन बाद में रिज़र्व बैंक ने नए नोटों से बदलने से इनकार कर दिया था।

जिसके बाद इन बैंकों ने नोटबंदी के करीब नौ वर्ष बाद करीब 3.50 करोड़ रुपये के पुराने नोट बदलने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

परिपत्र सार्वजनिक हित में

जस्टिस डॉ. पुष्पेन्द्र सिंह भाटी और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा 14 और 17 नवंबर 2016 को जारी किए गए परिपत्र वैधानिक, तर्कसंगत और सार्वजनिक हित में थे।

इन परिपत्रों के जरिए सहकारी बैंकों और पीएसीएस को पुराने नोट स्वीकार करने से अस्थायी रूप से रोका गया था।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि 8 नवंबर 2016 को केंद्र सरकार द्वारा आरबीआई अधिनियम, 1934 की धारा 26(2) के तहत जारी अधिसूचना के अनुसार पुराने नोटों को बैंकिंग चैनलों के माध्यम से जमा किया जाना था।

याचिका में कहा गया कि जिला केंद्रीय सहकारी बैंक भी लाइसेंस प्राप्त बैंक हैं, इसलिए उन्हें पुराने नोट स्वीकार करने से रोका नहीं जाना चाहिए था।

याचिकाकर्ता समितियों ने दावा किया कि 8 नवंबर 2016 को उनके पास बड़ी मात्रा में पुराने नोट मौजूद थे, जिन्हें वे वैध रूप से जमा नहीं कर सके। इससे उनकी कार्यशील पूंजी प्रभावित हुई।

याचिका में कहा गया कि आरबीआई के 14 और 17 नवंबर के परिपत्र, 8 नवंबर की अधिसूचना के विपरीत हैं और किसी कार्यकारी निर्देश के जरिए वैधानिक अधिसूचना को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।

याचिका में कुछ समितियों को प्रारंभिक दिनों में पुराने नोट जमा करने की अनुमति मिलने और अन्य को नहीं मिलने को भी संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया गया।

केंद्र, आरबीआई का जवाब

मामले में केंद्र सरकार, आरबीआई और अन्य प्रतिवादियों की ओर से जवाब पेश करते हुए दलील दी गई कि नोटबंदी एक असाधारण आर्थिक निर्णय था।

अधिवक्ता ने कहा कि यह राष्ट्रीय हित में लिया गया निर्णय था।

अधिवक्ता ने कहा कि आरबीआई को यह अधिकार है कि वह परिस्थितियों के अनुसार संचालन संबंधी निर्देश जारी करे।

प्रतिवादियों ने कहा कि सहकारी बैंकों और पीएसीएस की ऑडिट व्यवस्था, तकनीकी तैयारी और निगरानी तंत्र को देखते हुए उनमें पुराने नोटों के दुरुपयोग का जोखिम अधिक था। इसी कारण इन्हें पुराने नोट स्वीकार करने से अस्थायी रूप से रोका गया।

नोटबंदी पर विचार नहीं

कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि वह नोटबंदी की नीति की संवैधानिक वैधता पर विचार नहीं कर रहा है, क्योंकि इसे पहले ही सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने विवेक नारायण शर्मा बनाम भारत संघ मामले में सही ठहराया जा चुका है।

हाईकोर्ट ने दोहराया कि आर्थिक और मौद्रिक नीतियों के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा अत्यंत सीमित होती है।

खंडपीठ ने कहा कि 8 नवंबर 2016 की अधिसूचना ने किसी भी संस्था को पुराने नोट स्वीकार करने का पूर्ण और अपरिवर्तनीय अधिकार नहीं दिया था।

अधिसूचना में स्पष्ट था कि जमा और विनिमय की प्रक्रिया आरबीआई के निर्देशों के अनुसार होगी।

इसलिए 14 और 17 नवंबर 2016 के परिपत्र अधिसूचना के विपरीत नहीं, बल्कि उसके कार्यान्वयन का हिस्सा हैं।

भेदभाव नहीं

भेदभाव के आरोपों पर कोर्ट ने कहा कि केवल अलग-अलग प्रभाव पड़ना भेदभाव नहीं होता।

यदि वर्गीकरण तार्किक आधार पर और उद्देश्य से जुड़ा हुआ है, तो वह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता। कोर्ट ने माना कि सहकारी बैंकों को अलग श्रेणी में रखने के पीछे उचित कारण थे।

अदालतों को संयम

नाबार्ड की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि नाबार्ड आरबीआई के निर्देशों के अधीन कार्य करता है और वह आरबीआई के आदेशों के विपरीत कोई स्वतंत्र अनुमति नहीं दे सकता।

कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ताओं के अनुच्छेद 19(1)(जी) और अनुच्छेद 300-ए के तहत अधिकारों का उल्लंघन नहीं हुआ, क्योंकि लगाए गए प्रतिबंध अस्थायी, नियामक और सार्वजनिक हित में थे।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नोटबंदी जैसे असाधारण आर्थिक कदम के दौरान लिए गए नियामक निर्णयों में अदालतों को अत्यधिक संयम बरतना चाहिए, जब तक कि वे स्पष्ट रूप से मनमाने या असंवैधानिक न हों।

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