हाईकोर्ट ने कहा जल्दबाजी या “मोरल हाई ग्राउंड” के नाम पर जांच से बचना स्वीकार्य नहीं
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने अर्धसैनिक बलों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया हैं कि अनुशासन बनाए रखने के नाम पर भी संवैधानिक सुरक्षा और प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि गंभीर आरोपों के बावजूद नियमित विभागीय जांच किए बिना किसी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने बलराम सिंह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है.
CISF में इंस्पेक्टर
याचिकाकर्ता बलराम सिंह, CISF में इंस्पेक्टर/एक्जीक्यूटिव के पद पर कार्यरत थे। उनकी नियुक्ति वर्ष 2003 में हुई थी।
वर्ष 2017 में उन्हें मुंबई स्थित CISF यूनिट से एक मृत CISF जवान के परिजनों से जुड़े मामले की जांच के लिए देहरादून भेजा गया।
देहरादून प्रवास के दौरान बलराम सिंह के खिलाफ मृतक जवान के परिजनों द्वारा आरोप लगाए गए और उनके विरुद्ध आईपीसी की धारा 352 (मारपीट) और 504 (जानबूझकर अपमान) के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई।
एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद CISF प्रशासन ने उन्हें निलंबित कर दिया।
मामले में सबसे अहम पहलू यह रहा कि एफआईआर के मात्र चार दिन के भीतर, बिना किसी विभागीय जांच, बिना चार्जशीट और बिना साक्ष्य परीक्षण के, CISF ने नियम 39, CISF नियम 2001 के तहत विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए बलराम सिंह को सेवा से बर्खास्त कर दिया।
विभागीय अपील खारिज
बर्खास्तगी आदेश के बाद बलराम सिंह ने विभागीय अपील दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया।
इसके बाद निगरानी और समीक्षा याचिकाएं भी खारिज कर दी गईं। जिसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हालांकि, इससे पहले भी उन्होंने एक रिट याचिका दायर की थी, जिसे न्यायालय ने यह कहते हुए वापस लेने की अनुमति दी कि वे पहले विभागीय समीक्षा का विकल्प अपनाएं। समीक्षा याचिका खारिज होने के बाद वर्तमान याचिका दायर की गई।
बिना जांच के बर्खास्तगी पर सवाल
CISF प्रशासन के खिलाफ याचिका दायर कर याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि CISF नियम, 2001 के तहत बड़ी सजा देने से पहले नियम 36 के अंतर्गत विधिवत विभागीय जांच अनिवार्य है।
नियम 39 के तहत जांच से छूट केवल असाधारण परिस्थितियों में दी जा सकती है, जब जांच कर पाना “यथोचित रूप से व्यावहारिक” न हो।
लेकिन इस मामले में न तो ऐसी परिस्थितियां थीं और न ही अनुशासनिक प्राधिकारी ने ठोस कारण दर्ज किए।
CISF का जवाब
मामले में याचिका के जवाब में CISF की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप अत्यंत गंभीर थे और पीड़िता व उसके परिवार की सुरक्षा तथा बल की छवि को देखते हुए त्वरित कार्रवाई आवश्यक थी।
CISF की ओर से दलील दी गई कि आरोप अत्यंत गंभीर और नैतिक अधःपतन से जुड़े हैं। बल एक सशस्त्र और अनुशासित बल है, जहां अनुशासन सर्वोपरि है। ऐसे मामलों में त्वरित और कठोर कार्रवाई से ही बल की छवि और मनोबल बनाए रखा जा सकता है।
CISF ने यह भी तर्क दिया कि नियमित जांच से पीड़ित पक्ष और गवाहों की गरिमा प्रभावित हो सकती थी, इसलिए जांच से छूट उचित थी।
साथ ही यह भी कहा गया कि नियमित जांच कराने से गवाहों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता था।
हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख
राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों सुनने के बाद 27 नवंबर 2025 को फैसला सुरक्षित रखा था जिसे बुधवार को सुनाते हुए कहा कि
“गंभीर आरोप अपने आप में विभागीय जांच से छूट का आधार नहीं बन सकते।”
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुशासनिक प्राधिकारी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि नियमित जांच क्यों व्यावहारिक रूप से असंभव थी।
बर्खास्तगी आदेश में केवल बल की छवि, अनुशासन और त्वरित कार्रवाई जैसे सामान्य कारण बताए गए, जो नियम 39 की आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करते।
छूट कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि नियम 39 के तहत जांच से छूट कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है।
इसके लिए अनुशासनिक प्राधिकारी को यह स्पष्ट रूप से दर्ज करना आवश्यक है कि नियमित जांच क्यों संभव नहीं थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी आदेश में केवल आरोपों की गंभीरता और संगठन की छवि का हवाला दिया गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि जांच कराना व्यावहारिक रूप से असंभव कैसे था।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तुलसीराम पटेल का हवाला देते हुए कहा कि जांच से छूट तभी दी जा सकती है जब गवाहों को डराने-धमकाने, व्यापक हिंसा या गंभीर अव्यवस्था जैसी परिस्थितियां हों।
केवल जल्दबाजी या “मोरल हाई ग्राउंड” के नाम पर जांच से बचना स्वीकार्य नहीं है।
न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी के विरुद्ध लगे आरोपों की सच्चाई का निर्धारण या तो सक्षम आपराधिक अदालत द्वारा किया जाना चाहिए या फिर विधिवत विभागीय जांच के माध्यम से।
बिना जांच के सीधे बर्खास्तगी से कर्मचारी को अपना पक्ष रखने और गवाहों से जिरह करने का अवसर नहीं मिलता, जो संविधान के अनुच्छेद 311 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
बर्खास्तगी आदेश मुंबई का लेकिन
मामले की सुनवाई के दौरान CISF की ओर से हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार को लेकर भी दलील दी गयी.
अधिवक्ता ने कहा कि यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट के सुनवाई का क्षेत्राधिकार नहीं है, क्योंकि बर्खास्तगी आदेश मुंबई में पारित हुआ था।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय, पुनरीक्षण और समीक्षा आदेश याचिकाकर्ता के राजस्थान स्थित निवास पर तामील किए गए, जिससे आंशिक कारण-ए-दावा राजस्थान में उत्पन्न हुआ।
इसलिए हाईकोर्ट को याचिका सुनने का अधिकार है।