गरीबी के कारण जुर्माना न भर पाने पर भी जेल में बंद आरोपी की रिहाई के आदेश, हाईकोर्ट ने कहा गरीबी सजा का आधार नहीं बन सकती
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में न केवल अधिवक्ताओं की हड़ताल पर कड़ा रुख अपनाया है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी की गरीबी उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि वकीलों के न्यायिक कार्य बहिष्कार विचाराधीन कैदियों और बंदियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, विशेष रूप से तब, जब मामला किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हो
एकलपीठ ने 24 जनवरी को एनडीपीएस एक्ट के तहत दोषसिद्ध आरोपी राजेश कुशवाह की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।.
हड़ताल के कारण अदालतों का काम ठप होना अस्वीकार्य
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जोधपुर मुख्यपीठ और जयपुर पीठ की तीन बार एसोसिएशनों द्वारा प्रत्येक माह दो कार्यशील शनिवार घोषित किए जाने के विरोध में हड़ताल का आह्वान किया गया।
इस कारण अधिवक्ता न्यायिक कार्य से अनुपस्थित रहे।
जस्टिस ढंड ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले Ex-Capt. Harish Uppal बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2003) का हवाला देते हुए दो टूक कहा कि वकीलों को न तो हड़ताल करने का अधिकार है और न ही सांकेतिक बहिष्कार का।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रकार की हड़तालें न्याय चाहने वाले आम नागरिकों को “बंधक” बना लेती हैं और न्याय व्यवस्था को ठप कर देती हैं
संवाद और बहस से निकले समाधान, हड़ताल से नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी समस्या का समाधान संवाद, बहस और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निकलता है, न कि न्यायिक कार्य के बहिष्कार से।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि बार एसोसिएशनों की आपत्तियों पर विचार के लिए पहले ही 6 जनवरी 2026 को एक समिति गठित की जा चुकी है, जिसकी रिपोर्ट अभी लंबित है।
इसके बावजूद हड़ताल का रास्ता अपनाना अनावश्यक और अनुचित है।
कार्यशील शनिवारों को लेकर पहले ही स्पष्ट निर्देश
हाईकोर्ट ने 23 जनवरी 2026 की कारण सूची (Cause List) में प्रकाशित नोट का भी उल्लेख किया, जिसमें साफ कहा गया था कि कार्यशील शनिवारों को केवल पुराने लंबित मामलों को स्वैच्छिक आधार पर सुना जाएगा और उन दिनों अधिवक्ताओं की उपस्थिति अनिवार्य नहीं होगी।
इसके बावजूद हड़ताल करना, अदालत के अनुसार, न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करना है।
हड़ताल से अनुच्छेद 21 का उल्लंघन
जस्टिस ढंड ने अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक टिप्पणी करते हुए कहा कि जब अधिवक्ता अदालत का बहिष्कार करते हैं, तो यह सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि प्रस्तावित अधिवक्ता संशोधन विधेयक, 2025 में भी वकीलों द्वारा न्यायिक कार्य के बहिष्कार पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया है।
विरोध का अधिकार है, लेकिन सीमित
हाईकोर्ट ने यह स्वीकार किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति व्यक्त करना एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार निरंकुश नहीं है। इसे शांतिपूर्ण, अहिंसक और न्याय प्रक्रिया को बाधित किए बिना प्रयोग किया जाना चाहिए।
आरोपी की रिहाई में देरी-न्यायिक विफलता
हाईकोर्ट ने आरोपी राजेश कुशवाह, जिसे 10 वर्ष की सजा सुनाई गई थी और जो लगभग 7 वर्ष 11 माह की सजा काट चुका था, उसकी सजा पहले ही 7 अक्टूबर 2025 को निलंबित की जा चुकी थी।
इसके बावजूद वह केवल इस कारण जेल में बंद रहा क्योंकि वह एक लाख रुपये का जुर्माना जमा करने में असमर्थ था
गरीबी सजा का आधार नहीं बन सकती
जस्टिस ढंड ने स्पष्ट कहा कि यदि सजा निलंबन के दौरान लगाई गई शर्तें ऐसी हों, जिन्हें आरोपी अपनी आर्थिक स्थिति के कारण पूरा न कर सके, तो यह अपील के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को निष्फल करने जैसा होगा।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले CBI बनाम अशोक सिरपाल का हवाला देते हुए कहा कि जुर्माना जमा करने की शर्त ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिसे पूरा करना असंभव हो।