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‘दोषमुक्ति के बाद बर्खास्त किया तो कर्मचारी को देना होगा बकाया वेतन’, राजस्थान हाईकोर्ट ने बदला सिंगल बेंच का फैसला; बर्खास्तगी अवधि का वेतन देने का आदेश

Rajasthan HC Acquits Man After 13 Years in Jail, Sets Aside Life Sentence in Murder Case

जयपुर। अगर किसी सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त करने से पहले ही कोर्ट से दोषमुक्ति मिल चुकी है, तो उस बर्खास्तगी की अवधि का बकाया वेतन देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक पुलिस कांस्टेबल के मामले में यह अहम फैसला सुनाते हुए बर्खास्तगी से दोबारा नौकरी मिलने तक का बकाया वेतन देने का आदेश दिया है।

चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस इंद्रजीत सिंह की डिवीजन बेंच ने कहा कि अगर किसी कर्मचारी को दोषसिद्धि के आधार पर नौकरी से हटाया गया था, तो बाद में मिली दोषमुक्ति से उस कार्रवाई के सभी असर अपने आप खत्म नहीं हो जाते।

लेकिन अगर कर्मचारी को बर्खास्त करने से पहले ही अपीलीय कोर्ट उसकी दोषसिद्धि खत्म कर चुकी है, तो उसके बाद उसी दोषसिद्धि के आधार पर बर्खास्तगी नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने कर्मचारी को अगस्त 2017 में बर्खास्त किए जाने से फरवरी 2018 में दोबारा सेवा में लिए जाने तक का बकाया वेतन देने का निर्देश दिया है।

हाईकोर्ट ने सिंगल बेंच के उस फैसले में इसी हिस्से में बदलाव किया है, जिसमें बर्खास्तगी की इस अवधि का बकाया वेतन देने से इनकार किया गया था।

पहले ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 5 साल की सजा

मामला राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने उसे एक क्रिमिनल केस में दोषी मानते हुए 5 साल की कठोर जेल की सजा और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

इसके बाद कर्मचारी ने इस फैसले के खिलाफ अपील की। अपीलीय कोर्ट ने जून 2017 में उसे दोषमुक्त कर दिया।

यानी कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त किए जाने से पहले ही उसकी दोषसिद्धि खत्म हो चुकी थी। इसके बावजूद अगस्त 2017 में उसके खिलाफ बर्खास्तगी का ऑर्डर जारी कर दिया गया।

दोषमुक्ति के बाद भी कर दिया गया बर्खास्त

बर्खास्तगी के खिलाफ कर्मचारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सिंगल बेंच ने उसकी बर्खास्तगी रद्द कर दी और उसे मिलने वाले दूसरे सेवा लाभ देने का रास्ता साफ किया। हालांकि, सिंगल बेंच ने बर्खास्तगी से दोबारा नौकरी मिलने तक का बकाया वेतन देने से इनकार कर दिया।

कर्मचारी ने इसी हिस्से को डिवीजन बेंच के सामने चुनौती दी। उसका कहना था कि जब बर्खास्तगी से पहले ही वह क्रिमिनल केस में दोषमुक्त हो चुका था, तो उसके बाद हुई बर्खास्तगी की अवधि के लिए वेतन रोकने का कोई आधार नहीं है।

दोषसिद्धि से पहले और बाद की बर्खास्तगी में फर्क समझाया

डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी को उसकी दोषसिद्धि के कारण सेवा से बाहर रखा गया हो और बाद में वह दोषमुक्त हो जाए, तो हर स्थिति में उस पूरे समय का बकाया वेतन अपने आप नहीं मिल जाता।

ऐसे मामलों में यह भी देखा जाता है कि कर्मचारी सेवा से बाहर क्यों रहा। कोर्ट ने ‘नो वर्क, नो पे’ के सिद्धांत और कर्मचारी की गैरहाजिरी की परिस्थितियों को भी अहम माना।

लेकिन इस मामले में स्थिति अलग थी। कर्मचारी की दोषसिद्धि जून 2017 में ही खत्म हो चुकी थी, जबकि उसे बर्खास्त करने का आदेश अगस्त 2017 में जारी हुआ। यानी बर्खास्तगी के समय उसके खिलाफ पुरानी दोषसिद्धि कायम नहीं थी। ऐसे में उसी दोषसिद्धि को आधार बनाकर उसे नौकरी से हटाना सही नहीं माना जा सकता।

दोषमुक्ति के बाद नहीं हो सकती थी बर्खास्तगी

हाईकोर्ट ने कहा कि जब अपीलीय कोर्ट कर्मचारी को पहले ही दोषमुक्त कर चुकी थी, तो उसके बाद उसी पुरानी दोषसिद्धि को आधार बनाकर उसे बर्खास्त नहीं किया जा सकता था।

इस मामले में कर्मचारी जून 2017 में ही दोषमुक्त हो चुका था, जबकि बर्खास्तगी का आदेश अगस्त 2017 में जारी हुआ। यानी बर्खास्तगी के समय उसके खिलाफ पुरानी दोषसिद्धि कायम नहीं थी।

इसी वजह से हाईकोर्ट ने माना कि अगस्त 2017 से फरवरी 2018 तक कर्मचारी को सेवा से बाहर रखने का आधार नहीं था। डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले में आंशिक बदलाव करते हुए इस अवधि का बकाया वेतन देने का निर्देश दिया।

हर दोषमुक्ति पर पिछली अवधि का वेतन नहीं मिलेगा

हाईकोर्ट ने साथ ही यह भी साफ किया कि हर मामले में दोषमुक्ति के बाद कर्मचारी को पिछली पूरी अवधि का बकाया वेतन मिलना जरूरी नहीं है।

अगर किसी कर्मचारी को दोषसिद्धि के कारण सेवा से बाहर रहना पड़ा और बाद में वह दोषमुक्त हुआ, तो उस पूरी अवधि का वेतन अपने आप नहीं मिलेगा। ऐसे मामलों में कर्मचारी के सेवा से बाहर रहने की वजह और ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ के सिद्धांत को भी देखा जाएगा।

यानी इस मामले में बकाया वेतन इसलिए मिला क्योंकि बर्खास्तगी उस समय हुई, जब कर्मचारी पहले ही दोषमुक्त हो चुका था। यही इस केस को उन मामलों से अलग करता है, जहां कर्मचारी पहले दोषसिद्धि के कारण सेवा से बाहर रहा और बाद में दोषमुक्त हुआ।

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