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BCI की शिकायत निवारण व्यवस्था पर उठे सवाल: AIBE सर्टिफिकेट की कथित गलती पर अभ्यर्थी ने चेयरमैन को लिखा खुला पत्र

AIBE Certificate Error Sparks Questions Over BCI Grievance Redressal Mechanism

नई दिल्ली: देश में वकालत का लाइसेंस पाने की अंतिम परीक्षा मानी जाने वाली ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) को लेकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन पास करने वाले एक अभ्यर्थी ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया की शिकायत निवारण व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

आरोप है कि ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन का सर्टिफिकेट मिलने के बाद भी अभ्यर्थी वकालत शुरू नहीं कर पा रहा है।

अभ्यर्थी का आरोप है कि परीक्षा पास करने के बाद जारी किए गए प्रैक्टिस सर्टिफिकेट में हुई कथित क्लेरिकल गलती की जानकारी समय रहते देने और कई बार शिकायत करने के बावजूद उसे ठीक नहीं किया गया।

इतना ही नहीं, कथित तौर पर वही गलती वाला सर्टिफिकेट संबंधित हाईकोर्ट को भी भेज दिया गया।

इस मामले को लेकर अभ्यर्थी ने BCI के चेयरमैन को खुला पत्र लिखकर शिकायत निवारण व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।

अभ्यर्थी ने BCI चेयरमैन को लिखे खुले पत्र में दावा किया कि परीक्षा शुल्क के रूप में ₹3,500 जमा करने के बावजूद उसे सर्टिफिकेट में कथित त्रुटि ठीक कराने के लिए कई ईमेल, फोन कॉल और ऑनलाइन शिकायतों का सहारा लेना पड़ा, लेकिन समाधान नहीं मिला।

अभ्यर्थी ने इसे केवल अपनी व्यक्तिगत परेशानी नहीं, बल्कि BCI की शिकायत निवारण व्यवस्था की खामियों का उदाहरण बताया है।

क्लेरिकल सर्टिफिकेट में गलती

ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन देशभर के कानून स्नातकों के लिए अनिवार्य परीक्षा है। यह परीक्षा पास करने के बाद ही अभ्यर्थी को प्रैक्टिस सर्टिफिकेट मिलता है, जिसके आधार पर वह वकालत शुरू कर सकता है।

इस मामले की शुरुआत अभ्यर्थी के सर्टिफिकेट में कथित क्लेरिकल गलती से हुई।

अभ्यर्थी को अपने सर्टिफिकेट में एक क्लेरिकल गलती दिखाई दी। उसका कहना है कि उसने समय रहते इस गलती की जानकारी संबंधित अधिकारियों को दी थी।

उसे आश्वासन भी दिया गया कि अंतिम सर्टिफिकेट जारी होने से पहले यह गलती सुधार दी जाएगी। हालांकि, जब अंतिम सर्टिफिकेट जारी हुआ तो उसमें वही गलती बनी रही।

अभ्यर्थी का दावा है कि बाद में यही सर्टिफिकेट संबंधित हाईकोर्ट को भी भेज दिया गया, जिससे उसके नामांकन और वकालत शुरू करने की प्रक्रिया प्रभावित हो गई।

अभ्यर्थी ने पत्र में यह भी लिखा कि अब उसे समझ नहीं आ रहा कि अपनी समस्या के समाधान के लिए आखिर किस अधिकारी से संपर्क करे और उसकी शिकायत पर कार्रवाई कौन करेगा।

शिकायतों के बाद भी समाधान नहीं

अभ्यर्थी ने अपने खुले पत्र में बीसीआई की शिकायत निवारण व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।

उसका दावा है कि उसने कई बार ईमेल भेजे, एआईबीई हेल्प डेस्क से संपर्क किया और ऑनलाइन शिकायतें भी दर्ज कराईं, लेकिन कथित त्रुटि में कोई सुधार नहीं हुआ।

अभ्यर्थी ने सवाल उठाया कि जब परीक्षा प्राधिकरण अपने रिकॉर्ड से दस्तावेजों का सत्यापन कर सकता है, तो एक क्लेरिकल गलती ठीक कराने के लिए अभ्यर्थियों को बार-बार अलग-अलग माध्यमों से संपर्क क्यों करना पड़ता है।

खुले पत्र में उसने लिखा कि आखिर वह कितनी बार ईमेल भेजे, कितनी शिकायतें दर्ज कराए और एक ही समस्या को अलग-अलग अधिकारियों के सामने दोहराए।

उसका कहना है कि गलती उसकी नहीं है, फिर भी उसे ही बार-बार उसके सुधार के लिए प्रयास करने पड़ रहे हैं।

अभ्यर्थी का यह भी दावा है कि कई शिकायतों के बावजूद या तो कोई जवाब नहीं मिला या केवल औपचारिक जवाब देकर मामला टाल दिया गया। उसके अनुसार, यह शिकायतों के निस्तारण के लिए प्रभावी और जवाबदेह व्यवस्था की कमी को दर्शाता है।

हेल्प डेस्क पर भी सवाल

अभ्यर्थी ने अपने खुले पत्र में एआईबीई हेल्प डेस्क की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं।

उसका दावा है कि उम्मीदवारों की सहायता के लिए बनाई गई व्यवस्था उसकी शिकायत का समाधान करने में कारगर साबित नहीं हुई।

उसका कहना है कि कई ईमेल, फोन कॉल और ऑनलाइन शिकायतें दर्ज कराने के बावजूद न तो कोई ठोस जवाब मिला और न ही कथित त्रुटि में सुधार हुआ।

कई बार केवल ऑटोमेटेड जवाब मिले, जबकि कुछ शिकायतों पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आई।

खुले पत्र में अभ्यर्थी ने सवाल उठाया कि आखिर वह किस अधिकारी से संपर्क करे, कितनी बार शिकायत दर्ज कराए और अपनी समस्या का समाधान कराने के लिए कितने समय तक इंतजार करे।

उसके अनुसार, यह व्यवस्था शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण और जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े करती है।

क्लेरिकल गलती का करियर पर असर

प्रैक्टिस सर्टिफिकेट किसी भी कानून स्नातक के लिए वकालत शुरू करने का सबसे अहम दस्तावेज होता है। इसके आधार पर राज्य बार काउंसिल में आगे की प्रक्रिया पूरी की जाती है और पेशेवर रूप से वकालत शुरू करने का रास्ता खुलता है।

ऐसे में यदि सर्टिफिकेट में नाम, जन्मतिथि या अन्य विवरण से जुड़ी कोई गलती रह जाए, तो उसे ठीक कराना जरूरी हो जाता है।

अभ्यर्थी का दावा है कि उसके मामले में कथित क्लेरिकल गलती समय पर नहीं सुधारी गई, जिससे आगे की प्रक्रिया प्रभावित हुई।

अभ्यर्थी के अनुसार, उसके सर्टिफिकेट में कथित क्लेरिकल गलती समय पर नहीं सुधारी गई, जिससे आगे की प्रक्रिया प्रभावित हुई।

उसका कहना है कि इस प्रशासनिक चूक के कारण उसे बार-बार संबंधित अधिकारियों से संपर्क करना पड़ा। इससे न केवल उसका समय बर्बाद हुआ, बल्कि मानसिक तनाव भी बढ़ा।

उसका कहना है कि ऐसी स्थिति किसी भी नए वकील के लिए निराशाजनक होती है, क्योंकि वर्षों की पढ़ाई और परीक्षा पास करने के बाद भी वह समय पर अपने पेशे की शुरुआत नहीं कर पाता।

अभ्यर्थी ने दिए सुझाव

खुले पत्र में अभ्यर्थी ने केवल अपनी शिकायत ही नहीं रखी, बल्कि शिकायत निवारण व्यवस्था में सुधार के लिए कई सुझाव भी दिए हैं।

उसने मांग की है कि क्लेरिकल गलतियों को ठीक करने के लिए स्पष्ट रूप से जिम्मेदार अधिकारी तय किए जाएं, ताकि अभ्यर्थियों को यह पता हो कि उन्हें किससे संपर्क करना है और उनकी शिकायत पर जवाबदेही किसकी होगी।

इसके साथ ही शिकायतों के निस्तारण के लिए तय समय-सीमा लागू करने, ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्टम शुरू करने और हर शिकायत की प्रगति की जानकारी अभ्यर्थियों को उपलब्ध कराने का भी सुझाव दिया गया है।

अभ्यर्थी का कहना है कि यदि बीसीआई अपने डिजिटल रिकॉर्ड का बेहतर इस्तेमाल करे, तो अधिकांश मामलों में दस्तावेजों का सत्यापन और त्रुटियों का सुधार जल्दी किया जा सकता है।

इससे अभ्यर्थियों को बार-बार ईमेल भेजने या अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

समय पर समाधान की मांग

यह मामला फिलहाल एक अभ्यर्थी के खुले पत्र और उसमें किए गए दावों पर आधारित है। इस संबंध में बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

हालांकि, इस मामले ने शिकायत निवारण व्यवस्था की प्रभावशीलता को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं।

यदि किसी अभ्यर्थी के रिकॉर्ड या सर्टिफिकेट में कथित त्रुटि रह जाए, तो उसके सुधार के लिए पारदर्शी, जवाबदेह और समयबद्ध व्यवस्था कितनी प्रभावी है, यह इस पूरे मामले का प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आया है।

अभ्यर्थी ने अपने पत्र में बीसीआई से ऐसी व्यवस्था विकसित करने की अपील की है, जिसमें रिकॉर्ड संबंधी त्रुटियों का तय समय-सीमा के अंदर समाधान हो, शिकायतों की ऑनलाइन ट्रैकिंग की जा सके और हर अभ्यर्थी को अपनी शिकायत की स्थिति की स्पष्ट जानकारी मिलती रहे।

फिलहाल खबर लिखने तक इस पूरे मामले पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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