जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने 12 साल पुराने जमीन अधिग्रहण के मामले में याचिकाकर्ता को अपनी गवाही पेश करने का आखिरी मौका दिया है। लेकिन इसके लिए कोर्ट ने दो शर्तें रखी हैं- उन्हें 10 हजार रुपये जमा करने होंगे और 25 छायादार पेड़ लगाने होंगे।
यह मामला याचिकाकर्ता परमिला गुप्ता की जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा है। उन्होंने 2014 में अपनी जमीन से जुड़े विवाद को लेकर सीनियर सिविल जज की कोर्ट में रेफरेंस केस दायर किया था। इस मामले में उन्हें अपनी गवाही देने के कई मौके मिले, लेकिन वह गवाही पेश नहीं कर सकी थीं।
इसके बाद 17 सितंबर 2019 को निचली कोर्ट ने उनकी गवाही बंद कर दी। परमिला गुप्ता का कहना था कि उस समय वह भारत में नहीं थीं। हालांकि, निचली कोर्ट ने उनकी इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
इसी आदेश को उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और कानून को देखते हुए उन्हें गवाही का आखिरी मौका दिया।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने यह मौका कुछ शर्तों के साथ दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर परमिला गुप्ता 15 दिन के अंदर 10 हजार रुपये जमा करती हैं और 25 छायादार पेड़ लगाती हैं, तो निचली कोर्ट उनकी गवाही रिकॉर्ड करेगी। साथ ही ये भी कहा कि शर्तें पूरी नहीं होने या तय तारीख पर गवाही नहीं देने पर उन्हें आगे कोई मौका नहीं मिलेगा।
2014 से लंबित है जमीन अधिग्रहण का मामला
मामला परमिला गुप्ता बनाम जयपुर एयरपोर्ट अथॉरिटी से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की जमीन के अधिग्रहण के बाद उन्होंने 2014 में जयपुर के सीनियर सिविल जज के सामने रेफरेंस आवेदन दायर किया था।
इस आवेदन में जमीन अधिग्रहण से जुड़े मुआवजे और अन्य दावों को लेकर अपनी मांग रखी गई थी। मामले की सुनवाई आगे बढ़ी और कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी तरफ से सबूत और गवाही पेश करने के कई मौके दिए।
हालांकि, इन मौकों के बावजूद वह अपनी गवाही और सबूत रिकॉर्ड पर पेश नहीं कर सकीं। इसी वजह से बाद में निचली कोर्ट ने उनकी गवाही बंद कर दी, जिसके खिलाफ उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया।
कई मौके मिलने के बाद भी नहीं दी थी गवाही
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि 2014 में रेफरेंस केस दायर होने के बाद परमिला गुप्ता को गवाही देने के कई मौके दिए गए थे। लेकिन वह किसी भी मौके पर अपनी गवाही दर्ज नहीं करा सकीं।
इसी वजह से निचली कोर्ट ने 17 सितंबर 2019 को उनकी गवाही बंद कर दी थी। हाईकोर्ट ने भी माना कि गवाही देने में देरी के लिए उनकी लापरवाही रही।
विदेश में होने की दलील हाईकोर्ट ने नहीं मानी
याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि जिस समय उसकी गवाही बंद की गई, वह भारत में मौजूद नहीं थी। 17 सितंबर 2019 को जब उनकी गवाही बंद की गई, तब वह ऑस्ट्रेलिया में थीं। रिकॉर्ड के मुताबिक, वह 17 मई 2019 से 27 नवंबर 2019 तक ऑस्ट्रेलिया में ही थीं।
हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ इस दौरान विदेश में होना पर्याप्त वजह नहीं है, क्योंकि उन्हें पहले भी गवाही देने के कई मौके मिल चुके थे। इसलिए कोर्ट ने साफ कहा कि मामले को आगे बढ़ाने में याचिकाकर्ता की लापरवाही रही है।
फिर हाईकोर्ट ने क्यों दिया आखिरी मौका?
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की लापरवाही को माना, लेकिन उसे पूरी तरह गवाही पेश करने से वंचित करना उचित नहीं समझा। हाईकोर्ट ने माना कि रेफरेंस केस में कानून और तथ्यों से जुड़े अहम सवाल हैं, जिनका फैसला मामले के मेरिट पर होना जरूरी है।
इसी को देखते हुए कोर्ट ने परमिला गुप्ता को गवाही पेश करने का आखिरी मौका दिया। हालांकि, इस राहत को कुछ शर्तों के साथ जोड़ा गया।
10 हजार रुपये कहां जमा करने होंगे?
हाई कोर्ट ने परमिला गुप्ता को 15 दिन के भीतर 10 हजार रुपये राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जयपुर के ‘जूनियर एडवोकेट्स वेलफेयर फंड फॉर परचेजिंग ऑफ लॉ बुक्स’ में जमा करने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस रकम का इस्तेमाल 5 साल से कम प्रैक्टिस वाले युवा वकीलों के लिए कानून की किताबें उपलब्ध कराने में किया जाएगा।
याचिकाकर्ता को 25 पेड़ भी लगाने होंगे
दूसरी शर्त के तौर पर कोर्ट ने उन्हें सार्वजनिक जगह पर 25 छायादार पेड़ लगाने को कहा है। यह काम भी 15 दिन के भीतर करना होगा।
पेड़ लगाने के बाद उनकी फोटो और पेड़ों की देखभाल करने का लिखित आश्वासन निचली कोर्ट में जमा करना होगा। इसके बाद मामले की सुनवाई पूरी होने तक हर छह महीने में पेड़ों की स्थिति की फोटो भी कोर्ट में जमा करनी होगी।
कोर्ट ने कहा कि पेड़ लगाने की यह शर्त सार्वजनिक हित से जुड़ी है। पेड़ों से लंबे समय तक शहर और आसपास के लोगों को फायदा
शर्तें पूरी हुईं तो गवाही का मिलेगा आखिरी मौका
हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट को निर्देश दिया है कि अगर परमिला गुप्ता दोनों शर्तें पूरी कर देती हैं, तो उन्हें एविडेंस पेश करने का आखिरी और अंतिम अवसर दिया जाए।
अगर तय तारीख पर उनकी गवाही रिकॉर्ड नहीं हो पाती, तो निचली कोर्ट एक और छोटी तारीख तय कर सकती है। लेकिन अगर वह शर्तें पूरी नहीं करतीं या तय मौके पर गवाही दर्ज नहीं करातीं, तो इसके बाद कोई और समय नहीं दिया जाएगा।
हाईकोर्ट ने आखिर में यह भी कहा कि जमीन अधिग्रहण से जुड़ा रेफरेंस केस 12 साल से ज्यादा समय से पेंडिंग है। इसलिए निचली कोर्ट से इसे जल्द से जल्द तय करने की कोशिश करने को कहा गया है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आगे किसी भी पक्ष की ओर से मामले को टालने के लिए अनावश्यक या बेवजह की तारीख मांग को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
