साक्ष्यों के अभाव में हत्या व दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा रद्द, राजस्थान हाईकोर्ट ने दो आरोपियों को किया बरी
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने 2013 के आमेर के बहुचर्चित हत्या एवं दुष्कर्म मामले में फैसला सुनाते हुए पॉक्सो कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद सहित अन्य कठोर सजाओं को रद्द करते हुए दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने 31 पेज के विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में, संदेह से परे प्रमाण प्रस्तुत करने में विफल रहा और निचली अदालत ने कई स्थानों पर साक्ष्यों का गलत मूल्यांकन किया।
जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस चन्द्र प्रकाश श्रीमाली की खंडपीठ ने दोनों दोषियों की ओर से दायर अपीलों को मंजूर करते हुए जयपुर पॉक्सो कोर्ट के 19 दिसंबर 2017 के फैसले को रद्द कर दिया है।
ये है मामला
अभियोजन के अनुसार, 2 फरवरी 2013 को एक नाबालिग लड़की ने पुलिस थाना आमेर में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उसे दो युवकों ने उसके परिचित युवक के पास ले जाकर दुष्कर्म किया।
इसके साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि नाबालिग लड़की के परिचित युवक की पत्थरों से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।
आरोप था कि वारदात के बाद उसे उसके घर के पास छोड़ दिया गया।
इस मामले में आरोपी हिम्मत मीणा पर अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म, हत्या, लूट, सबूत मिटाने सहित भारतीय दंड संहिता की कई गंभीर धाराओं और POCSO अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया गया था, जबकि रामकेश पर लूट का माल रखने (धारा 412 IPC) का आरोप लगाया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने हिम्मत मीणा को हत्या और दुष्कर्म सहित कई अपराधों में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में क्या हुआ
हाईकोर्ट ने पूरे मामले के साक्ष्यों, गवाहों के बयानों, मेडिकल रिपोर्ट, एफएसएल रिपोर्ट, पहचान परेड और जांच प्रक्रिया के आधार पर अभियोजन के कमजोर पक्ष को बेहद कमजोर बताया।
हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन का पूरा मामला मुख्य रूप से पीड़िता की गवाही पर आधारित था, लेकिन यह गवाही कई गंभीर विरोधाभासों और असंगतियों से ग्रस्त पाई गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि सहायक गवाहों की गवाही श्रुतलेख (hearsay) थी, प्रत्यक्षदर्शी नहीं थी और केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि कानून की कसौटी पर खरे उतरने वाले साक्ष्य अनिवार्य हैं।
पीड़िता की गवाही पर अदालत की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पीड़िता की गवाही को लेकर कहा कि पीड़िता की लिखित रिपोर्ट में दुष्कर्म का आरोप केवल एक बार का था, जबकि न्यायालय में दिए गए बयान में दो बार दुष्कर्म की बात कही गई और यह अंतर मामले की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि घटना के तुरंत बाद पुलिस को दी गई सूचना और बाद में दर्ज रिपोर्ट में घटना का स्वरूप पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया गया, जबकि पीड़िता के अनुसार उसने घर लौटकर पूरा घटनाक्रम परिजनों को बता दिया था।
मेडिकल साक्ष्य ने अभियोजन को कमजोर किया
हाईकोर्ट ने मेडिकल रिपोर्टों को लेकर भी कहा कि पीड़िता के शरीर पर ताजा दुष्कर्म के कोई स्पष्ट निशान नहीं मिले। दोनों मेडिकल जांचों में हिंसा के चिह्नों का अभाव पाया गया।
कथित घटनास्थल ऊबड़-खाबड़ होने के बावजूद शरीर पर चोटों का न होना संदेहास्पद है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मेडिकल साक्ष्य अभियोजन के कथन का समर्थन नहीं करते।
पहचान परेड (TIP) पर भी सवाल
अदालत ने आरोपी की पहचान को लेकर भी गंभीर टिप्पणियां कीं।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पहचान परेड से पहले ही पीड़िता आरोपी को पुलिस के साथ देख चुकी थी, ऐसे में पहचान परेड का साक्ष्य मूल्य समाप्त हो जाता है।
यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि पहले से दिखाई गई पहचान, पहचान परेड को निष्प्रभावी बना देती है।
हत्या के आरोप पर भी नहीं टिक पाया अभियोजन
मामले में मृतक युवक की हत्या को लेकर भी हाईकोर्ट ने कहा कि हत्या का कोई ठोस उद्देश्य (motive) अभियोजन स्थापित नहीं कर सका।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में केवल तीन चोटें पाई गईं, जबकि कथित रूप से कई बार हमला बताया गया।
कोर्ट ने कहा कि शव को घसीटने और बार-बार पत्थर से मारने के आरोप मेडिकल साक्ष्यों से मेल नहीं खाते।
अदालत ने माना कि हत्या के आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हुए।
फुटप्रिंट और एफएसएल रिपोर्ट भी अविश्वसनीय
निचली अदालत ने जिन फुटप्रिंट और जूते के सोल के मिलान को महत्वपूर्ण माना था, हाईकोर्ट ने उन्हें भी खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फुटप्रिंट उठाने की प्रक्रिया कानूनी नियमों के अनुरूप नहीं थी, न मजिस्ट्रेट मौजूद था, न स्वतंत्र गवाह। ऐसे साक्ष्य को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।
पीड़िता की उम्र पर भी संदेह
POCSO अधिनियम लागू होने का आधार पीड़िता की नाबालिग होना था। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूल रिकॉर्ड कानूनी रूप से प्रमाणित नहीं किया गया और केवल हड्डी परीक्षण (ossification test) के आधार पर उम्र तय की गई।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार इसमें 2 वर्ष की त्रुटि की संभावना होती है।
अदालत ने कहा कि इस संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए।
दोषी रामकेश को भी राहत
इस पूरे मामले में दूसरे दोषी रामकेश पर लूट का माल रखने का आरोप था, लेकिन कथित खरीददार और मध्यस्थ अभियोजन से मुकर गए।
यहां तक कि अभियोजन बरामद सामान की पहचान भी नहीं करा पाया। पहचान संदेहास्पद पाई गई। इस आधार पर रामकेश को भी दोषमुक्त किया गया।
Case Details
- HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN BENCH AT JAIPUR
- Bench : JUSTICE MAHENDAR KUMAR GOYAL & JUSTICE CHANDRA PRAKASH SHRIMALI
- Date of Judgment Pronounced : 30/01/2026
(1) D.B. Criminal Appeal No. 49/2018
Himmat Meena S/o Shri Badri Narain Versus State of Rajasthan through - (2) D.B. Criminal Appeal No. 50/2018
Ramkesh S/o Hanuman Sahai Versus State of Rajasthan through