जोधपुर। पैतृक संपत्ति से जुड़े मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए साफ कर दिया कि किसी जांच से शिकायतकर्ता संतुष्ट नहीं है या जांच में उसके आरोप के मुताबिक साफ नतीजा नहीं आया है, तो सिर्फ इसी आधार पर जांच एजेंसी की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पैतृक जमीन के दस्तावेजों में पिता के कथित फर्जी हस्ताक्षर और जमीन हड़पने के आरोप की जांच को लेकर गीता देवी की याचिका खारिज कर दी।
गीता देवी ने मांग की थी कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और विवादित दस्तावेजों पर उनके पिता के हस्ताक्षरों की एफएसएल से जांच कराई जाए।
लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस इस मामले की जांच कर चुकी है और विवादित हस्ताक्षर दो बार एफएसएल भेजे जा चुके हैं, लेकिन दोनों बार रिपोर्ट किसी साफ नतीजे पर नहीं पहुंची।
जस्टिस सुनील बेनीवाल ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि जांच की निष्पक्षता पर संदेह करने की कोई वजह नहीं है। कोर्ट ने यह भी देखा कि जमीन को लेकर पहले से रेवेन्यू और सिविल कोर्ट में केस चल रहे हैं और विवादित दस्तावेज कई साल पुराने हैं।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने जांच में दखल देने से इनकार कर दिया और गीता देवी की याचिका खारिज कर दी।
14 बीघा पैतृक जमीन के दस्तावेजों पर विवाद
गीता देवी ने बालोतरा के जसोल थाने में एफआईआर नंबर 34/2024 दर्ज कराई थी। मामला खसरा नंबर 318 की 14 बीघा 2 बिस्वा 10 बिस्वांसी पैतृक जमीन से जुड़ा था। इसमें धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने, उनका इस्तेमाल करने और साजिश से जुड़ी धाराओं में केस दर्ज किया गया था।
गीता देवी का आरोप था कि उनके पिता नैनाराम के नाम दर्ज करीब 14 बीघा 2 बिस्वा 10 बिस्वांसी पैतृक जमीन से जुड़े दस्तावेजों में बाद में हेरफेर किया गया। उनका कहना था कि कुछ लोगों ने मिलीभगत कर उनके पिता के हस्ताक्षर फर्जी किए और जमीन को किसी तीसरे व्यक्ति के नाम ट्रांसफर कराने की कोशिश की।
इस विवाद में 1996 और 2005 के बिक्री दस्तावेज भी जांच के दायरे में थे।
पहले पुलिस ने दी थी निगेटिव रिपोर्ट
एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की पड़ताल की। इसके बाद अंतिम रिपोर्ट पेश करते हुए कहा गया कि आरोपियों के खिलाफ अपराध साबित नहीं हुआ।
गीता देवी ने इसका विरोध किया और आगे की पड़ताल की मांग की। 19 अक्टूबर 2024 को संबंधित कोर्ट ने मामले में आगे जांच के निर्देश दिए। कोर्ट ने खास तौर पर 2005 के कुछ दस्तावेजों और 1986 के पट्टे से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करने को कहा।
साथ ही विवादित हस्ताक्षरों को एफएसएल भेजकर यह पता लगाने के निर्देश दिए गए कि उन पर किए गए हस्ताक्षर असली हैं या नहीं।
हस्ताक्षरों की जांच दो बार हुई, लेकिन साफ नतीजा नहीं आया
गीता देवी का कहना था कि पुलिस ने मामले की पूरी तरह पड़ताल नहीं की और एफएसएल की रिपोर्ट भी सामने नहीं रखी। उनका कहना था कि हस्ताक्षरों की सही तरह से जांच होने पर कथित फर्जीवाड़े की सच्चाई सामने आ सकती है।
वहीं, सरकारी पक्ष ने हाईकोर्ट को बताया कि विवादित दस्तावेज एफएसएल को दो बार भेजे गए। लेकिन दोनों बार जांच के बाद विशेषज्ञ किसी पक्के नतीजे पर नहीं पहुंच सके। यानी एफएसएल की रिपोर्ट से यह साफ नहीं हो सका कि विवादित हस्ताक्षर असली थे या फर्जी।
यही वजह थी कि गीता देवी ने हाईकोर्ट से मामले की जांच में फिर से दखल देने की मांग की। लेकिन कोर्ट ने देखा कि इन हस्ताक्षरों को एफएसएल में दो बार जांच के लिए भेजा गया और दोनों बार कोई साफ नतीजा नहीं आया।
ऐसे में सिर्फ इस बात से कि गीता देवी जांच के नतीजे से संतुष्ट नहीं हैं, पुलिस की पूरी जांच को गलत या पक्षपातपूर्ण नहीं माना जा सकता।
जमीन को लेकर पहले से चल रहे हैं सिविल और रेवेन्यू केस
हाईकोर्ट ने मामले के रिकोर्ड को देखते हुए यह भी पाया कि जमीन का विवाद नया नहीं है। इससे संबंधित एक राजस्व मुकदमा 2008 से बालोतरा की राजस्व अदालत में लंबित है। इसके अलावा गीता देवी बनाम चंपालाल नाम से 2020 का सिविल मुकदमा भी चल रहा है।
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि विवादित जमीन को लेकर पहले से कई मामले चल रहे हैं। बालोतरा की रेवेन्यू कोर्ट में रेवेन्यू सूट नंबर 41/2008 लंबित है। इसके अलावा गीता देवी बनाम चंपालाल सिविल सूट नंबर 1/2020 भी चल रहा है।
हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि विवादित बिक्री दस्तावेज 1996 और 2005 के हैं। बाद में जमीन अलग-अलग लोगों को बेचे जाने और वहां मकान बन जाने की बात भी जांच में सामने आई। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए पुलिस ने पहली बार फाइनल रिपोर्ट पेश की थी।
इन्हीं बातों को देखते हुए कोर्ट को यह मामला पहली नजर में सिविल विवाद से जुड़ा हुआ लगा।
हाईकोर्ट ने कहा- जांच का नतीजा पसंद नहीं आना अलग बात
हाईकोर्ट ने माना कि शिकायतकर्ता की मांग पर विवादित हस्ताक्षरों की एफएसएल जांच दोबारा भी कराई गई। लेकिन दूसरी बार की जांच में भी कोई साफ नतीजा सामने नहीं आया।
हाईकोर्ट ने कहा कि पूरे रिकॉर्ड को देखने पर जांच एजेंसी की निष्पक्षता पर संदेह करने की कोई वजह नहीं है। सिर्फ इसलिए कि जांच से शिकायतकर्ता को वह नतीजा नहीं मिला जिसकी वह उम्मीद कर रही थी, हाईकोर्ट अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर जांच में दखल नहीं दे सकता।
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
हाईकोर्ट ने निष्पक्ष जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता कानून के अनुसार उचित स्तर पर अपनी आपत्तियां उठा सकते हैं।
साथ ही कोर्ट ने गीता देवी को छूट दी कि वह कानून के मुताबिक उचित स्तर पर अपनी आपत्तियां उठा सकती हैं। यानी इस आदेश में कोर्ट ने यह तय नहीं किया कि विवादित हस्ताक्षर असली हैं या फर्जी, दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा हुआ है या नहीं और जमीन पर असल हक किसका है।
हाईकोर्ट ने सिर्फ इतना माना कि रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस की जांच को पक्षपातपूर्ण या गलत मानने की कोई वजह नहीं है। एफएसएल की दोनों रिपोर्ट में साफ नतीजा नहीं आया, लेकिन इसके बावजूद हाईकोर्ट को जांच में अपने स्तर से दोबारा दखल देने की जरूरत नहीं लगी।