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Rajasthan Highcourt : सवाई माधोपुर वक्फ कमेटी को बड़ा झटका

Rajasthan High Court Upholds Father’s Right Over Self-Acquired Property, Orders Son to Vacate House

विवादित जमीन पर ‘गैर-मुमकिन कब्रिस्तान’ घोषित करने का दावा खारिज

जयपुर, 3 नवंबर 2025

Rajasthan Highcourt की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सवाई माधोपुर मुस्लिम वक्फ कमेटी के उस दावे को खारिज कर दिया है, जिसमें ग्राम पंचायत आलनपुर में स्थित खसरा संख्या 1508 की भूमि को ‘गैर-मुमकिन कब्रिस्तान’ होने का दावा किया गया था।

जस्टिस सुदेश बंसल की एकलपीठ ने विवादित भूमि को ‘गैर-मुमकिन कब्रिस्तान’ मानने से इंकार करते हुए कहा कि —

“रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि विवादित भूमि कभी भी वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित नहीं हुई। वर्ष 1965 की वक्फ अधिसूचना में खसरा नंबर 1508 का कोई उल्लेख नहीं है।”

एकलपीठ ने कहा कि प्रथम अपीलीय न्यायालय यानी एडीजे सवाई माधोपुर द्वारा दिए गए आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है, और वक्फ कमेटी भूमि पर अपने स्वामित्व या कब्जे का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकी।

Rajasthan Highcourt ने इसके साथ ही मुस्लिम वक्फ कमेटी, जिला सवाई माधोपुर द्वारा दायर की गई सभी सात सिविल सेकंड अपीलों को खारिज करने का आदेश दिया है।

Rajasthan Highcourt ने स्पष्ट किया कि केवल राजस्व अभिलेखों में दर्ज प्रविष्टि या बिना सटीक सीमांकन के अधिसूचना के आधार पर किसी भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित नहीं किया जा सकता।

जब किसी भूमि को वैध रूप से ग्राम पंचायत या नगर निकाय द्वारा आबादी प्रयोजन के लिए परिवर्तित कर आवंटित कर दिया गया हो, तो उसका स्वामित्व निजी व्यक्तियों के पक्ष में वैध माना जाएगा।

यह है मामला

यह पूरा मामला सवाई माधोपुर के ग्राम पंचायत आलनपुर स्थित खसरा नंबर 1508 की जमीन से जुड़ा हुआ है।

वर्ष 1963 में ग्राम पंचायत आलनपुर ने उक्त भूमि को आबादी उपयोग हेतु परिवर्तित कर नीलामी के माध्यम से विभिन्न व्यक्तियों को पट्टे पर आवंटित किया था।

जिला कलेक्टर ने 20 मार्च 1963 को ग्राम पंचायत को 31 बीघा 4 बिस्वा भूमि आबादी प्रयोजन हेतु उपयोग की अनुमति दी थी।

आवश्यक लगान जमा होने के बाद पंचायत ने प्लॉटिंग कर आवंटन किया।

इनमें से याचिकाकर्ता आवंटी — केशवदास, रंचोड़दास, शंकरलाल आदि — को वर्ष 1965 में विधिवत पंजीकृत पट्टे जारी किए गए और उनका कब्जा सौंप दिया गया।

कई साल बाद मुस्लिम वक्फ कमेटी ने दावा किया कि यह भूमि ‘गैर-मुमकिन कब्रिस्तान’ के रूप में वक्फ संपत्ति है और 23 सितंबर 1965 की अधिसूचना के तहत यह वक्फ बोर्ड की संपत्ति घोषित की जा चुकी है।

कमेटी ने यह भी कहा कि इस भूमि पर मस्जिद, कोठरी (प्याऊ) और मजार बनी हुई हैं।

वक्फ कमेटी द्वारा प्रस्तुत अधिसूचना में खसरा नंबर 1508 का कोई उल्लेख नहीं है। वक्फ रजिस्टर में की गई प्रविष्टि (म्यूटेशन नंबर 357) को जिला कलेक्टर ने 1975 में ही निरस्त कर दिया था।

वक्फ कमेटी के दावे के खिलाफ आवंटियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और स्थायी व अनिवार्य निषेधाज्ञा की मांग की, ताकि वक्फ कमेटी उनके प्लॉट पर कब्जा न करे।


एडीजे कोर्ट का फैसला

सवाई माधोपुर की अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश अदालत ने 2015 में इस मामले में आवंटियों के दावे को खारिज करते हुए वक्फ कमेटी के पक्ष में फैसला दिया।

अदालत ने आवंटियों के कब्जाधारित भूखंड होने का दावा स्वीकार नहीं किया, जिसे आवंटियों द्वारा एडीजे कोर्ट में चुनौती दी गई।

आवंटियों द्वारा दी गई चुनौती पर वर्ष 2022 में एडीजे कोर्ट सवाई माधोपुर ने इस आदेश को पलटते हुए कहा कि आवंटियों को भूमि का विधिसम्मत पट्टा प्राप्त है, उनका कब्जा सिद्ध है और वक्फ कमेटी के दावे को खारिज कर दिया।


वक्फ कमेटी की दलील

सवाई माधोपुर मुस्लिम वक्फ कमेटी ने एडीजे कोर्ट के फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर कर चुनौती दी।

हाईकोर्ट में मुस्लिम वक्फ कमेटी की ओर से अधिवक्ता नईमुद्दीन काजी ने दलील दी कि यह भूमि 1965 की अधिसूचना के अंतर्गत वक्फ संपत्ति घोषित है।

वादी ने इस अधिसूचना को एक वर्ष के भीतर चुनौती नहीं दी, इसलिए उनका दावा अवैध है।

वादी के पास कब्जा नहीं था, अतः केवल स्थायी निषेधाज्ञा का मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता था।


प्रतिवादियों का जवाब

अपील का विरोध करते हुए आवंटियों की ओर से अधिवक्ता शोवित झांझरिया, शांतनु गुप्ता, हर्षित नेहरा, नितिन सिनसिनवार, इमरान खान और उत्कर्ष दुबे ने अदालत से कहा कि 23 सितंबर 1965 की अधिसूचना में विवादित भूमि का कोई स्पष्ट विवरण नहीं है; अतः यह वक्फ संपत्ति नहीं मानी जा सकती।

जिला कलेक्टर के आदेश के तहत भूमि को आबादी उपयोग के लिए परिवर्तित कर दिया गया था और इसका विधिवत आवंटन उन्हें ग्राम पंचायत द्वारा किया गया।

वादी के पास 1963 का पंजीकृत पट्टा है, जिसका कभी खंडन नहीं हुआ।

अधिवक्ताओं ने कहा कि वक्फ कमेटी भूमि के कब्रिस्तान या मस्जिद के उपयोग का कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी।

फोटो साक्ष्य और गवाहों के बयानों से यह भी स्पष्ट हुआ कि वक्फ कमेटी द्वारा 1980 में किराए पर देने का दावा असत्य था; प्रस्तुत तस्वीरें 2012 की थीं।

अदालत से कहा गया कि प्रथम अपीलीय न्यायालय ही अंतिम तथ्यपरक न्यायालय होता है, और जब तक उसके निष्कर्षों में कोई “स्पष्ट गलती या विकृति” न हो, हाईकोर्ट उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।


हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट की एकलपीठ ने मामले में सभी पक्षों की बहस के बाद फैसले में कहा कि —

“पहली अपीलीय अदालत ने सही पाया कि वादी प्लॉट का वैध स्वामी और कब्जाधारी है।
वक्फ कमेटी न तो स्वामित्व और न ही कब्जे का कोई प्रमाण दे सकी। अतः अपील में कोई महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न उत्पन्न नहीं होता।”

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आवंटन पत्र 24 जुलाई 1963 को जारी हुआ और 19 जुलाई 1965 को विधिवत पंजीकृत किया गया था।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वक्फ कमेटी द्वारा प्रस्तुत म्यूटेशन एंट्री नंबर 357 को पहले ही जिला कलेक्टर ने वर्ष 1975 में निरस्त कर दिया था।

इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने वक्फ कमेटी की सभी सात अपीलें खारिज कर दीं और कहा कि अपीलीय अदालत यानी एडीजे कोर्ट का आदेश यथावत रहेगा।


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