हाईकोर्ट ने कहा विभागीय जांच में भी न्यायसंगत प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय का पालन अनिवार्य है
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पेंशन से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की 100 प्रतिशत पेंशन आजीवन रोक दी गई थी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल पुलिस जांच के दौरान धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयान के आधार पर, बिना गवाह की पेशी और जिरह का अवसर दिए, विभागीय सजा देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने विलायती राम की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट ने 19 अगस्त 2020 के उस आदेश को मनमाना, अवैध और कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत करार देते हुए निरस्त कर दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता की पूरी पेंशन जब्त कर ली गई थी
ये हैं पूरा मामला
अधिवक्ता त्रिभुवन नारायण सिंह ने मामले में याचिकाकर्ता विलायती राम की ओर से पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि विलायती राम का चयन राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के माध्यम से वर्ष 1994 में विधि एवं विधिक कार्य विभाग में विधि रचनाकार पद पर हुआ था।
वर्ष 1997 में उनकी सेवा की पुष्टि भी हो गई। सेवा के दौरान उनके विरुद्ध यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने अनुसूचित जाति का फर्जी प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर सरकारी नौकरी हासिल की।
शिकायत के आधार पर वर्ष 2008 में उन्हें निलंबित किया गया और राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के तहत विभागीय जांच शुरू की गई।
इसी दौरान वर्ष 2012 में उनके खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज हुआ, जिसमें IPC की धाराएं 419, 420 और 471 लगाई गईं।
विभागीय जांच में मिली थी क्लीन चिट
मामले की जांच आयुक्त, विभागीय जांच, राजस्थान द्वारा की गई।
विस्तृत जांच के बाद जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा कि दोनों आरोप सिद्ध नहीं होते।
जांच रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि— कथित जाति प्रमाण पत्र जारी करने वाले तहसीलदार को विभागीय जांच में गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया.
न ही सरपंच और पटवारी, जिनकी रिपोर्ट के आधार पर प्रमाण पत्र जारी होने का दावा किया गया था, को गवाही के लिए बुलाया गया
शिकायतकर्ता नसरू खान को भी न तो विभागीय जांच में और न ही आपराधिक मुकदमे में गवाह बनाया गया
इसके बावजूद अनुशासनिक प्राधिकारी ने जांच अधिकारी की रिपोर्ट से असहमति जताई।
बरी हो चुके याचिकाकर्ता
अधिवक्ता त्रिभुवन नारायणसिंह ने बताया कि महत्वपूर्ण तथ्य यह भी रहा कि संबंधित आपराधिक मामले में जयपुर महानगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने याचिकाकर्ता को सम्मानपूर्वक बरी कर दिया।
कोर्ट के समक्ष यह भी तथ्य आया कि इस बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने कोई अपील दायर नहीं की।
इसके बावजूद, याचिकाकर्ता के सेवानिवृत्त होने के बाद अनुशासनिक प्राधिकारी ने 19 अगस्त 2020 को आदेश पारित करते हुए राजस्थान पेंशन नियम, 1996 के नियम 7 के तहत उनकी 100 प्रतिशत पेंशन आजीवन रोकने का निर्णय लिया।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले में कहा कि अनुशासनिक प्राधिकारी ने अपना पूरा निष्कर्ष केवल एक बयान पर आधारित तैयार किया.
हाईकोर्ट ने कहा कि यह बयान पुलिस जांच के दौरान धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज किया गया था
इस बयान की न तो विभागीय जांच में पुष्टि हुई, न ही बयान देने वाले व्यक्ति को जिरह के लिए प्रस्तुत किया गया
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयान का स्वतंत्र साक्ष्य मूल्य नहीं होता। जब तक उस गवाह को पेश कर, जिरह का अवसर न दिया जाए, तब तक ऐसे बयान के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर बनाम श्रीनाथ गुप्ता सहित अन्य फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय जांच में भी न्यायसंगत प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय का पालन अनिवार्य है
बिना गवाह पेश किए, बिना क्रॉस-एग्जामिनेशन के, केवल फाइल पर उपलब्ध बयान के आधार पर सजा देना कानूनन अस्वीकार्य है
इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुशासनिक प्राधिकारी यह दर्ज करने में विफल रहा कि कथित कृत्य “गंभीर कदाचार (Grave Misconduct)” की श्रेणी में आता है या नहीं, जबकि पेंशन जब्ती जैसे कठोर दंड के लिए यह आवश्यक है।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ 19 अगस्त 2020 को दिए गए पेंशन जब्ती के आदेश को रद्द कर दिया हैं.
साथ ही सरकार को आदेश दिया हैं कि वह याचिकाकर्ता को सभी परिणामी लाभ प्रदान करें, जो इस अवैध आदेश के कारण वंचित रह गए थे