जोधपुर, 7 अक्टूबर
Rajasthan Highcourt ने रिटायर्ड कर्मचारी, चुरू निवासी फूलाराम फगेड़िया को अंतरिम राहत देते हुए उनके खिलाफ जारी आजीवन पेंशन रोकने के आदेश पर रोक लगा दी है।
जस्टिस रेखा बोराणा की एकलपीठ ने राज्य सरकार द्वारा 1 जुलाई 2025 को जारी आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाई है।
साथ ही, Rajasthan Highcourt ने राज्य सरकार के कार्मिक सचिव और उच्च शिक्षा विभाग के सचिव को नोटिस जारी कर मामले में जवाब मांगा है।
यह है मामला
मामला चुरू निवासी फूलाराम फगेड़िया से जुड़ा है, जो राजकीय लोहिया कॉलेज, चुरू में पी.टी.आई. के पद पर कार्यरत थे।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता नरपत सिंह चारण ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि वर्ष 2018 में प्रार्थी को एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया गया था और मामला अभी कोर्ट में ट्रायल पर है।
याचिकाकर्ता की सेवा अवधि में अनुपस्थिति को विभाग ने दुराचार मानते हुए कार्यवाही शुरू कर दी।
अधिवक्ता ने कहा कि ट्रायल जारी रहने के दौरान ही विभाग ने उन पर दुराचार के आरोप लगाते हुए सी.सी.ए. नियम 1958 के तहत विभागीय जांच शुरू की।
100 प्रतिशत पेंशन रोकी गई
सेवानिवृत्ति के करीब दो वर्ष बाद, जांच में दोषी ठहराए जाने पर सरकार ने राजस्थान पेंशन नियम 1996 के तहत उनकी 100 प्रतिशत पेंशन आजीवन रोकने का आदेश जारी किया।
अधिवक्ता नरपत सिंह चारण ने अदालत से कहा कि सरकार द्वारा 1 जुलाई 2025 को जारी किया गया आदेश असंवैधानिक, नियम-विरुद्ध और “कठोरतम दंड” के समान है।
कैंसर पीड़ित याचिकाकर्ता
अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता की पूरी पेंशन स्थायी रूप से रोक दी गई, जबकि आपराधिक प्रकरण अब भी विचाराधीन है और किसी तरह की दोषसिद्धि नहीं हुई है।
उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता गंभीर बीमारियों, जिनमें कैंसर भी शामिल है, से पीड़ित था। इलाज के लिए उसने कई बार चिकित्सीय अवकाश के लिए आवेदन दिया, परंतु विभाग ने उन्हें स्वीकार नहीं किया, जिसके चलते वह अनुपस्थित रहा और उसकी अनुपस्थिति को दुराचार मान लिया गया।
पेंशन “अनुग्रह” नहीं, वैधानिक अधिकार
मामले से जुड़ी चार्जशीट वर्ष 2020 में जारी की गई, जबकि आरोप वर्ष 2018 के थे। अब सेवानिवृत्ति के बाद, जब याचिकाकर्ता जीवन के अंतिम चरण में हैं, तब यह कठोर दंड दिया गया है।
अदालत में यह दलील दी गई कि पेंशन कोई “अनुग्रह” नहीं बल्कि सेवानिवृत्त कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है। इस प्रकार 100 प्रतिशत पेंशन रोकना अत्यंत कठोर और अनुचित सजा है।
Rajasthan Highcourt ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है और मामले में अगली सुनवाई 10 नवंबर को तय करते हुए जवाब पेश करने का आदेश दिया है।