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हिरासत में मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप पर राजस्थान हाईकोर्ट सख्त, सरकार ने किया थाना प्रभारी को निलंबित

Custodial Human Rights Violation: Rajasthan High Court Cracks Down, SHO Suspended

राजस्थान हाईकोर्ट ने न्यायिक जांच को पूर्ण स्वतंत्रता देते हुए संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट की की तारीफ, मजिस्ट्रेटी जांच में हस्तक्षेप से इनकार

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन के एक गंभीर मामले में सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार की त्वरित कार्रवाई की सराहना की है।

राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने इस मामले में थाना प्रभारी को निलंबित किए जाने, विभागीय जांच शुरू होने और स्वतंत्र न्यायिक जांच को बिना किसी हस्तक्षेप के आगे बढ़ाने के आदेश दिए हैं।

जस्टिस फरजंद अली ने यह आदेश याचिकाकर्ता शाकिर शेख की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं।

याचिकाकर्ता ने पुलिस हिरासत के दौरान उसके साथ कथित क्रूरता और मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाया है। हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया आरोपों को गंभीर मानते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया है।

थाना प्रभारी के नाम में हुई त्रुटि सुधारी

हाईकोर्ट ने 23 जनवरी 2026 को पारित आदेश में सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि पूर्व आदेश में एक अनजानी त्रुटि के कारण गलत अधिकारी का नाम अंकित हो गया था।

कोर्ट ने इसे सुधारते हुए स्पष्ट किया कि कथित रूप से दोषी अधिकारी पुलिस निरीक्षक दीपक बंजारा हैं, न कि कोई अन्य अधिकारी।

सरकारी की सराहना

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से धीरेन्द्र सिंह, प्रियंका बोराणा और रोबिन सिंह ने अदालत को अवगत कराया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस निरीक्षक दीपक बंजारा को 22 जनवरी 2026 को निलंबित कर दिया गया है।

इसके साथ ही उनके विरुद्ध विभागीय जांच भी तत्काल प्रभाव से शुरू कर दी गई है।

सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि मामले की जांच अब अपर पुलिस अधीक्षक, प्रतापगढ़ को सौंपी गई है, ताकि निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच सुनिश्चित की जा सके।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की इस त्वरित और जिम्मेदार कार्रवाई की खुले शब्दों में सराहना करते हुए कहा कि यह कदम प्रशासन की संवेदनशीलता और गंभीरता को दर्शाता है।

न्यायिक जांच को पूरी स्वतंत्रता

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि इस मामले में न्यायिक जांच पहले से ही चल रही है, इसलिए न्यायालय किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप उचित नहीं समझता।

अदालत ने न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रतापगढ़ को आदेश दिया कि वे पूर्ण स्वतंत्र और निष्पक्ष हाथों से जांच को निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और शीघ्रता से पूरा करें।

कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा मामले में संज्ञान लेने के तरीके की भी प्रशंसा की और इसे न्यायिक साहस, जीवंत न्यायिक चेतना और कानून के शासन के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक बताया।

मानवाधिकार उल्लंघन

हाईकोर्ट ने आदेश में कहा कि याचिका में प्रस्तुत तथ्यों और रिकॉर्ड के अवलोकन से हिरासत के दौरान मानवाधिकारों के क्रूर उल्लंघन के प्रथम दृष्टया संकेत मिलते हैं।

इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया और मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

प्रगति रिपोर्ट

अदालत ने राज्य सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन पर भरोसा जताते हुए आदेश दिया कि मामले में उठाए गए सभी आवश्यक कदमों की प्रगति रिपोर्ट 16 फरवरी 2026 को अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाए।

तब तक मामले को “पार्ट-हर्ड” श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है।

याचिकाकर्ता को कानूनी स्वतंत्रता

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को यह पूरी स्वतंत्रता होगी कि वह न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष NDPS एक्ट की धारा 59 तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत झूठे साक्ष्य गढ़ने से संबंधित प्रावधानों सहित सभी वैधानिक दलीलें उठा सके।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट इन सभी बिंदुओं पर कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से विचार करेंगे और हाईकोर्ट की किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना उचित आदेश पारित करेंगे।

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