राजस्थान हाईकोर्ट ने मृतक कैदी के मामले की 15 दिन में न्यायिक जांच पूर्ण करने के दिए आदेश
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने न्यायिक हिरासत में बंद एक अंडरट्रायल कैदी की संदिग्ध मौत को अत्यंत गंभीर मामला मानते हुए जेल प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं।
कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा प्रहार बताते हुए 15 दिनों में न्यायिक जांच पूरी करने के आदेश दिए हैं।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने एक मृतक कैदी के परिजन की ओर से दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने इस मामले में जोधपुर सेंट्रल जेल के अधीक्षक और जेलर को शपथपत्र के जरिए अपना स्पष्टीकरण पेश करने का आदेश दिया है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने मृतक कैदी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर कहा कि रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर कई गंभीर चोटें पाई गईं।
यहां तक कि कैदी की मांसपेशियों में बड़ा हेमेटोमा, सिर के टेम्पोरल हिस्से में सूजन व चोट, दो स्पष्ट कटे हुए घाव, ताजा खून बहने के संकेत और शरीर पर खरोंच और कंट्यूज्ड लेसरेटेड वूंड पाए गए हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि डॉक्टर की राय में ये सभी चोटें मृत्यु से 0 से 6 घंटे पहले की एंटी-मॉर्टम थीं, और उस पूरे समय मृतक जेल प्रशासन की अभिरक्षा में था।
जेल अधीक्षक जिम्मेदारी से नहीं बच सकते
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जेल अधीक्षक, जो जेल में बंद कैदियों का वैधानिक संरक्षक होता है, वह इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता कि कैदी को ये चोटें कैसे लगीं।
हाईकोर्ट ने जोधपुर सेंट्रल जेल अधीक्षक, जेलर और संबंधित पुलिस अधीक्षक को आदेश दिए हैं कि वे अलग-अलग शपथपत्र दाखिल कर स्पष्ट करें कि हिरासत में रहते हुए मृतक को चोटें कैसे लगीं।
अवैध वसूली और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
मामले में मृतक के परिजन लीला की ओर से दायर याचिका में मोबाइल के कुछ स्क्रीनशॉट और लेन-देन से जुड़े साक्ष्य पेश किए गए।
अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि जेल अधिकारियों द्वारा मृतक की सुरक्षा के नाम पर परिजनों से अवैध धन की मांग की गई।
हाईकोर्ट ने माना कि जेलों में भ्रष्टाचार की शिकायतें कोई नई बात नहीं हैं और यही अवैध वसूली अक्सर जेलों के भीतर मोबाइल, नशीले पदार्थ और अन्य प्रतिबंधित वस्तुओं की पहुंच का कारण बनती है।
कस्टोडियल डेथ का मामला
अदालत ने टिप्पणी की कि कस्टोडियल डेथ के मामले लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की आत्मा पर चोट करते हैं।
कोर्ट ने कहा—
“मानव जीवन पवित्र है और ऐसे मामलों में न्यायालयों को असाधारण संवेदनशीलता, सतर्कता और तत्परता दिखानी होती है।”
जांच में देरी पर भी नाराजगी
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी कड़ी नाराजगी जताई कि जुलाई 2025 से लंबित न्यायिक जांच अब तक पूरी नहीं हो सकी।
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच में देरी साक्ष्यों को कमजोर करती है और सत्य तक पहुंच में बाधा डालती है।
कोर्ट ने कहा कि देरी के चलते न्याय व्यवस्था में आमजन का विश्वास कम होता है।
इस मामले की जांच कर रहे एसीजेएम (सीबीआई प्रकरण), जोधपुर मेट्रो को 15 दिन में जांच पूरी करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारी सभी अन्य कार्यों को प्राथमिकता से हटाकर 15 दिनों में जांच पूरी करें और रिपोर्ट हाईकोर्ट में प्रस्तुत करें।
साथ ही जिला एवं सत्र न्यायाधीश को भी जांच अधिकारी को संवैधानिक महत्व के प्रति संवेदनशील बनाने और आवश्यक प्रशासनिक सहयोग देने के आदेश दिए हैं।
23 जनवरी को अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई 23 जनवरी 2026 को तय की है, जिसमें जेल अधीक्षक और जेलर द्वारा दाखिल शपथपत्रों पर विचार किया जाएगा।