जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले ने राज्य के हजारों करदाताओं को बड़ी राहत दी है। राजस्थान हाईकोर्ट का यह आदेश इनकम टैक्स की पेनल्टी रद्द होने के बावजूद आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे करदाताओं के लिए बड़ी राहत है।
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने आयकर कानून के तहत चल रहे एक महत्वपूर्ण आपराधिक मामले में बड़ा और रिपोर्टेबल फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जब आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) द्वारा पेनल्टी को मेरिट पर रद्द कर दिया जाता है और किसी भी प्रकार की जानबूझकर कर चोरी (willful concealment) सिद्ध नहीं होती, तो उसी आधार पर शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
यह फैसला जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने नागेन्द्र चौधरी की ओर से दायर याचिका पर दिया है।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही याचिकाकर्ता के खिलाफ आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 276C(1) के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को धारा 482 सीआरपीसी के तहत रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट के फैसले में स्पष्ट किया गया कि कर कानूनों के तहत आपराधिक कार्यवाही को केवल दबाव बनाने का औजार नहीं बनाया जा सकता।
यदि विभाग स्वयं के तथ्यात्मक मंच पर असफल हो जाता है, तो आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाना न्याय और कानून दोनों के विपरीत होगा।
इनकम टैक्स की रेड और डायरी
याचिकाकर्ता नागेन्द्र चौधरी के आवास और व्यावसायिक परिसरों पर 4 सितंबर 2013 को आयकर विभाग ने धारा 132 के तहत तलाशी ली थी।
तलाशी के दौरान कुछ डायरी और दस्तावेज जब्त किए गए, जिनमें कथित रूप से करीब 1.47 करोड़ रुपये के लेन-देन का उल्लेख था।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने उक्त राशि और अतिरिक्त 3 लाख रुपये को अपनी आय मानते हुए रिटर्न में घोषित किया, जिस पर नियमित आकलन भी पूरा हुआ।
हालांकि, आकलन अधिकारी ने इसे अघोषित आय मानते हुए धारा 271AAB के तहत 15 लाख रुपये की पेनल्टी लगा दी और साथ ही धारा 276C(1) के तहत कर चोरी का आरोप लगाकर आपराधिक शिकायत भी दर्ज कराई।
ITAT से मिली राहत
याचिकाकर्ता ने पेनल्टी के खिलाफ आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया।
ITAT ने 10 जून 2019 को अपने आदेश में पेनल्टी को रद्द करते हुए कहा कि न तो पेनल्टी लगाने की वैधानिक शर्तें पूरी हुईं और न ही आय छुपाने या जानबूझकर कर चोरी का कोई ठोस प्रमाण सामने आया।
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि डायरी में दर्ज प्रविष्टियां स्वयं में अघोषित आय नहीं मानी जा सकतीं।
हाईकोर्ट का अहम फैसला
हाईकोर्ट ने कहा कि इस पूरे मामले में आपराधिक अभियोजन की नींव वही आरोप थे, जिनके आधार पर पेनल्टी लगाई गई थी।
जब ITAT ने तथ्यों और कानून के आधार पर पेनल्टी को ही खारिज कर दिया, तो आपराधिक कार्यवाही की बुनियाद स्वतः समाप्त हो जाती है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के K.C. Builders, G.L. Didwania और राधेश्याम केजरीवाल जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब तथ्यात्मक स्तर पर किसी करदाता को राहत मिल जाती है और mens rea यानी आपराधिक मंशा सिद्ध नहीं होती, तो उसी आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
पेनल्टी और अभियोजन का संबंध
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिद्धांत रूप में पेनल्टी और आपराधिक अभियोजन स्वतंत्र हो सकते हैं, लेकिन जब दोनों की तथ्यात्मक नींव एक जैसी हो और वह नींव न्यायिक रूप से ध्वस्त हो जाए, तो अभियोजन को जारी रखना न्यायसंगत नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आयकर विभाग द्वारा ITAT के आदेश के खिलाफ अपील दायर करना, बिना किसी स्थगन (stay) के, अभियोजन को जीवित नहीं रख सकता।
फैसले में यह भी कहा गया कि धारा 278E के तहत कर अपराधों में culpable mental state की जो कानूनी धारणा है, वह तभी लागू होती है जब पहले चरण में कर छुपाने या जानबूझकर कर चोरी के तथ्य साबित हों।
जब वही तथ्य ITAT द्वारा नकार दिए गए हों, तो यह धारणा अपने आप लागू नहीं हो सकती।