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डुप्लीकेट डिप रॉड मामला: राजस्थान हाईकोर्ट ने IOCL की कार्रवाई को ठहराया वैध, पूरी टैंकर फ्लीट की ब्लैकलिस्टिंग बरकरार

Duplicate Dip Rod Case: Rajasthan High Court Validates IOCL’s Blacklisting of Full Tanker Fleet


हाईकोर्ट ने कहा पेट्रोलियम उत्पादों की शुद्धता, मात्रा और सुरक्षा से जुड़े मामलों में कठोर मानक और सख्त कार्रवाई आवश्यक

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने पेट्रोलियम उत्पादों के परिवहन से जुड़े एक अहम मामले में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) की कार्रवाई को वैध ठहराते हुए ट्रांसपोर्टर की याचिका खारिज कर दी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऑयल इंडस्ट्री ट्रांसपोर्ट डिसिप्लिन गाइडलाइंस (ITDG) के तहत डुप्लीकेट डिप रॉड (Duplicate Dip Rod – DDR) जैसे गंभीर उल्लंघन के मामलों में पूरी टैंकर फ्लीट को ब्लैकलिस्ट करना नियमों के अनुरूप है और इसमें अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

जस्टिस सुनील बेनीवाल ने यह आदेश Rajputana Freight Carrier की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं।

हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल फैसले में कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों की शुद्धता, मात्रा और सुरक्षा से जुड़े मामलों में कठोर मानक और सख्त कार्रवाई आवश्यक है, क्योंकि इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अनियमितता सार्वजनिक हित और उपभोक्ताओं के विश्वास को प्रभावित कर सकती है।

ये है मामला

मैसर्स राजपूताना फ्रेट कैरियर, जोधपुर को IOCL ने वर्ष 2021 में पेट्रोलियम उत्पादों के परिवहन का ठेका दिया था।

ठेके के अनुबंध की शर्तों के अनुसार, ट्रांसपोर्टर को इंडस्ट्री ट्रांसपोर्ट डिसिप्लिन गाइडलाइंस (ITDG) का पालन करना अनिवार्य था।

कंपनी ने अपने अनुबंध के तहत 10 टैंकर ट्रकों को परिवहन के लिए सूचीबद्ध करते हुए काम शुरू किया।

4 मई 2024 को IOCL के अधिकारियों द्वारा एक अचानक किए गए निरीक्षण के दौरान एक टैंकर (RJ-19-GD-8064) में डुप्लीकेट डिप रॉड पाई गई, जो कैलिब्रेशन चार्ट से मेल नहीं खाता था। इसके बाद संबंधित टैंकर को अनलोड कर दिया गया और चालान रद्द कर दिया गया।

शो-कॉज नोटिस और ब्लैकलिस्टिंग

IOCL ने 28 अगस्त 2024 को याचिकाकर्ता ट्रांसपोर्टर को शो-कॉज नोटिस जारी किया और ITDG के क्लॉज 8.2.2 के उल्लंघन का आरोप लगाया।

ट्रांसपोर्टर ने जवाब में कहा कि डिप रॉड जानबूझकर नहीं रखा गया था और इससे किसी प्रकार का नुकसान नहीं हुआ।

इसके बावजूद, व्यक्तिगत सुनवाई के बाद 16 अक्टूबर 2025 को IOCL ने आदेश पारित करते हुए न केवल संबंधित टैंकर, बल्कि पूरी फ्लीट को अलग-अलग अवधियों के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया। इस आदेश से आहत होकर ट्रांसपोर्टर ने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि यदि कोई कार्रवाई बनती भी है, तो वह केवल उसी टैंकर तक सीमित होनी चाहिए, जिसमें कथित डुप्लीकेट डिप रॉड मिला।

पूरी फ्लीट को ब्लैकलिस्ट करना अत्यधिक और अनुपातहीन कार्रवाई है।

याचिका में कहा गया कि डुप्लीकेट डिप रॉड के उपयोग से किसी प्रकार का वास्तविक नुकसान सिद्ध नहीं किया गया और ITDG के प्रावधानों की गलत व्याख्या कर कठोर कार्रवाई की गई।

याचिका में यह भी कहा गया कि मामले में वजन एवं माप विभाग से सत्यापन नहीं कराया गया।

IOCL की दलीलें

मामले की सुनवाई के दौरान IOCL की ओर से कहा गया कि ITDG में डुप्लीकेट डिप रॉड को गंभीर अनियमितता माना गया है और ऐसे मामलों में “डीमिंग क्लॉज” लागू होता है, जिसके तहत ट्रांसपोर्टर की संलिप्तता स्वतः मानी जाती है।

ट्रांसपोर्टर को पहले ही नियमों की जानकारी थी और उसने अनुबंध में इन शर्तों को स्वीकार किया था।

शो-कॉज नोटिस में संभावित दंड और ब्लैकलिस्टिंग की जानकारी स्पष्ट रूप से दी गई थी, जिससे प्राकृतिक न्याय का पालन हुआ।

हाईकोर्ट का फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की बहस और दलीलें सुनने के बाद कहा कि डुप्लीकेट डिप रॉड, फर्जी/छिपे कम्पार्टमेंट और अवैध सुरक्षा चाबियां जैसी अनियमितताएं अत्यंत गंभीर हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि इन मामलों में दिशानिर्देशों में स्पष्ट रूप से पूरी फ्लीट की ब्लैकलिस्टिंग का प्रावधान है।

हाईकोर्ट ने कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों की मात्रा और गुणवत्ता से छेड़छाड़ जनहित के विरुद्ध है।

हाईकोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए कहा कि अनुबंध की शर्तों और विशेषज्ञ निकाय द्वारा बनाए गए नियमों में तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक वे मनमाने या असंवैधानिक न हों।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रांसपोर्टर डीमिंग क्लॉज के अनुमान को खंडित करने में असफल रहा।

फैसले का हवाला

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के कई पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ब्लैकलिस्टिंग का निर्णय प्रशासनिक है और अदालत अपील प्राधिकरण की तरह कार्य नहीं कर सकती।

जब नियम स्पष्ट हों और उचित प्रक्रिया अपनाई गई हो, तो हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

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