टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

“हर गंभीर चोट हत्या का प्रयास नहीं” – गंभीर चोट मात्र से नहीं बनता धारा 307 का मामला, हाईकोर्ट ने हटाई ‘हत्या के प्रयास’ की धारा

Serious Injury Alone Not Attempt to Murder: Rajasthan High Court Removes Section 307 IPC Charge

पारिवारिक संपत्ति विवाद में लाठी से लगी गंभीर चोट को आधार बनाकर लगाए गए ‘हत्या के प्रयास’ के आरोप को अदालत ने किया निरस्त, कहा-सिर्फ चोट की गंभीरता नहीं, आरोपी की हत्या की स्पष्ट मंशा होना आवश्यक

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के प्रयास के आरोप में लगाई जाने वाली आईपीसी की धारा 307 को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए स्पष्ट किया है कि केवल गंभीर चोट लगना या पारिवारिक विवाद होना अपने-आप में हत्या के प्रयास (धारा 307 IPC) का मामला नहीं बनाता, जब तक यह साबित न हो कि आरोपी के पास हत्या करने की स्पष्ट मंशा (हॉमिसाइडल इंटेंट) थी।

हाईकोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराते हुए एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका में ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए गए धारा 307 के आरोप को निरस्त कर दिया, जबकि अन्य धाराओं के तहत मुकदमा जारी रखने का आदेश दिया।

हाईकोर्ट की एकलपीठ ने अपने इस फैसले में विस्तार से बताया है कि किन परिस्थितियों में धारा 307 लागू होगी और किन परिस्थितियों में नहीं।

मामला क्या था

बीकानेर जिले में संपत्ति विवाद को लेकर एक ही परिवार के सदस्यों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि मई 2021 में आरोपी पक्ष ने हमला कर गंभीर चोट पहुँचाई, छेड़छाड़ की और जान से मारने की कोशिश की।

पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किया, जिसमें आरोपियों के खिलाफ धारा 307 (हत्या का प्रयास), 354, 325, 323, 341 आदि धाराएँ लगाई गईं।

ट्रायल कोर्ट ने भी उपलब्ध सामग्री के आधार पर आरोप तय कर दिए, जिसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की और कहा कि घटना में हत्या करने की कोई मंशा नहीं थी तथा धारा 307 लगाना कानून का दुरुपयोग है।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका में कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किए बिना ही धारा 307 (हत्या के प्रयास) सहित गंभीर धाराओं में आरोप तय कर दिए, जबकि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई prima facie साक्ष्य मौजूद नहीं था जिससे हत्या करने की मंशा सिद्ध होती हो।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि कथित घटना पारिवारिक संपत्ति विवाद से उत्पन्न हुई थी और दोनों पक्षों के बीच पहले से कई दीवानी और आपराधिक मुकदमे लंबित थे। ऐसे में शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप द्वेषपूर्ण और बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए हैं।

अधिवक्ता Sanjay Kumar Poonia ने यह भी कहा कि घटना में किसी घातक हथियार का उपयोग नहीं किया गया, बल्कि साधारण लकड़ी (लाठी) का उपयोग बताया गया है, जिससे हत्या की स्पष्ट मंशा सिद्ध नहीं होती।

अधिवक्ता ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज चोटें गंभीर हो सकती हैं, लेकिन यह कहीं भी उल्लेख नहीं है कि वे चोटें सामान्य रूप से मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त थीं। न तो बार-बार घातक वार किए गए और न ही आरोपी घटना के बाद हमला जारी रखते हुए हत्या सुनिश्चित करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं।

अधिवक्ता ने दलील दी कि धारा 307 IPC एक अत्यंत गंभीर प्रावधान है, जिसका प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब अभियोजन सामग्री से स्पष्ट रूप से हत्या की मंशा या ज्ञान सिद्ध हो। केवल गंभीर चोट या पारिवारिक झगड़े के आधार पर इस धारा का प्रयोग करना कानून की भावना के विपरीत है और इससे आरोपियों को अनावश्यक रूप से कठोर मुकदमे का सामना करना पड़ता है।

सरकार-प्रतिवादी की दलीलें

राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों, एफआईआर, गवाहों के बयानों तथा मेडिकल रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद ही आरोप तय किए हैं, इसलिए पुनरीक्षण स्तर पर आरोपों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।

अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता पर घात लगाकर हमला किया, उसे जमीन पर गिराया और सिर पर जोरदार वार किया, जिससे गंभीर चोट आई। ऐसी परिस्थितियाँ स्वयं यह दर्शाती हैं कि हमला गंभीर प्रकृति का था और हत्या की मंशा से भी किया जा सकता था।

अधिवक्ता Dharmveer Choudhary और N. S. Chandawat, Dy. G.A. ने कहा कि आरोप तय करने के चरण पर विस्तृत साक्ष्य परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती; केवल इतना देखना होता है कि उपलब्ध सामग्री से prima facie अपराध बनता है या नहीं।

अधिवक्ता ने कहा कि शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयानों में आरोपियों द्वारा सामूहिक रूप से हमला करने, मारपीट करने और छेड़छाड़ करने का स्पष्ट उल्लेख है, इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा सभी संबंधित धाराओं में आरोप तय करना पूरी तरह उचित था।

अभियोजन ने यह भी तर्क दिया कि घटना के पीछे पारिवारिक विवाद होना स्वयं यह दर्शाता है कि दोनों पक्षों के बीच गहरी दुश्मनी थी, जो हत्या की मंशा का संकेत भी हो सकती है। इसलिए केवल इस आधार पर कि हथियार साधारण था या चोटें एक ही बार लगीं, धारा 307 को हटाना उचित नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

दोनों पक्षों की दलीलें और बहस सुनने के साथ ही अदालत ने पूरे रिकॉर्ड, एफआईआर, गवाहों के बयान और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर कहा कि धारा 307 लागू करने का सबसे महत्वपूर्ण तत्व ‘हत्या की मंशा’ है, न कि केवल चोट की गंभीरता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  • चोट लगना या गंभीर चोट लगना अपने-आप धारा 307 का आधार नहीं है।
  • यह देखना जरूरी है कि हमला किस हथियार से किया गया, कितनी बार किया गया और किस तरह किया गया।
  • आरोपी की घटना से पहले और बाद की गतिविधियों से भी उसकी मंशा का आकलन किया जाता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में लाठी से एक चोट लगी, जिसे डॉक्टर ने गंभीर बताया, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट से यह साबित नहीं हुआ कि चोट जानलेवा थी या मृत्यु होने की संभावना थी।

“हर गंभीर चोट हत्या का प्रयास नहीं”

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बेहद विस्तार से बताया कि भारतीय दंड संहिता में चोट से जुड़े अपराधों की एक पूरी श्रेणी बनाई गई है-साधारण चोट, गंभीर चोट, खतरनाक हथियार से चोट आदि—ताकि अपराध की गंभीरता के अनुसार उचित दंड तय किया जा सके।

कोर्ट ने कहा यदि हर गंभीर चोट को हत्या के प्रयास में बदल दिया जाए तो यह कानून की मूल संरचना को ही कमजोर कर देगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 307 केवल उन मामलों में लागू होनी चाहिए जहाँ परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से दिखाती हों कि आरोपी ने हत्या करने की कोशिश की, जैसे कि बार-बार जानलेवा वार करना, घातक हथियार का उपयोग करना या हमला तब तक जारी रखना जब तक मौत की संभावना पैदा न हो जाए।

पारिवारिक विवाद का पहलू भी महत्वपूर्ण

फैसले में हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पक्षकार एक ही परिवार से हैं और उनके बीच संपत्ति विवाद लंबे समय से चल रहा है। ऐसी परिस्थितियों में केवल दुश्मनी होना हत्या की मंशा साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि पारिवारिक विवादों में झूठे आरोप लगाए जाने की संभावना भी रहती है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि घटना के बाद आरोपी मौके से भाग गए और उन्होंने लगातार हमला जारी नहीं रखा, जिससे यह संकेत मिलता है कि उनका उद्देश्य हत्या करना नहीं था।

ट्रायल कोर्ट का आदेश आंशिक रूप से रद्द

हाईकोर्ट ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से धारा 307 का आरोप prima facie साबित नहीं होता, इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा इस धारा के तहत आरोप तय करना गलत था। अदालत ने धारा 307 के आरोप को निरस्त करते हुए कहा कि:

धारा 341 (गलत तरीके से रोकना), धारा 323 (साधारण चोट), धारा 325 (गंभीर चोट), धारा 354 (छेड़छाड़) के तहत मुकदमा जारी रहेगा। साथ ही, इन धाराओं का ट्रायल मजिस्ट्रेट अदालत में चलाने का आदेश दिया गया।

फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि धारा 307 का प्रयोग सावधानी से किया जाना चाहिए और इसके लिए आरोपी की मानसिक स्थिति और घटना की परिस्थितियों का गहन विश्लेषण आवश्यक है।

अक्सर पुलिस और ट्रायल कोर्ट कई मामलों में गंभीर चोट लगने पर सीधे धारा 307 जोड़ देते हैं, जिससे मुकदमे की प्रकृति और सजा की गंभीरता दोनों बदल जाती हैं।

सबसे अधिक लोकप्रिय