राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को सशर्त दी राहत, 25 छायादार पेड़ लगाने और उनकी देखभाल के आदेश
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी मुकदमे में सामने वाले पक्षकारों यानी प्रतिवादी को समन की कानूनी तरीके से सेवा नहीं हुई है, तो उसके विरुद्ध पारित एक्स-पार्टी (एकतरफा) डिक्री टिकाऊ नहीं मानी जा सकती।
राजस्थान हाईकोर्ट ने 14 वर्ष पुराने एक सिविल मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित एक्स-पार्टी डिक्री को निरस्त करते हुए कहा कि समन की सेवा केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि प्राकृतिक न्याय का मूल आधार है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने देवकृष्ण की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।
क्या था पूरा मामला
वर्ष 2010 के एक संपत्ति विवाद में एक ही दिन दो अलग-अलग रजिस्टर्ड बेचान या बिक्री विलेख निष्पादित किए गए।
जमीन की खरीद करने वाले मूल क्रेता की मृत्यु के बाद उन रजिस्टर्ड दस्तावेज़ों को निरस्त कराने के लिए उसके कानूनी उत्तराधिकारियों के खिलाफ दो अलग-अलग अदालतों में वाद दायर किए गए।
एक वाद सिविल जज के समक्ष दायर हुआ, जबकि दूसरा अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, जयपुर के समक्ष दर्ज किया गया।
दोनों ही मामलों में प्रतिवादी अदालत में उपस्थित नहीं हुए और “समन लेने से इनकार” की रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ एक्स-पार्टी कार्यवाही कर दी गई।
ट्रायल कोर्ट की चूक
हाईकोर्ट ने पाया कि जिस आधार पर समन की सेवा मान ली गई, वह प्रक्रिया आदेश 5 नियम 17 और 19 सीपीसी के अनुकूल नहीं थी।
प्रक्रिया सर्वर द्वारा जो “इनकार रिपोर्ट” पेश की गई, उसमें जिन दो व्यक्तियों के हस्ताक्षर थे, वे प्रतिवादियों के गांव के निवासी ही नहीं थे।
इसके बावजूद न तो प्रक्रिया सर्वर को शपथ पर परखा गया और न ही उन गवाहों की अदालत में जांच कराई गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि—
“समन की सेवा को स्वीकार करना एक गंभीर न्यायिक कार्य है, कोई खाली औपचारिकता नहीं।”
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने फैसले में स्पष्ट किया कि—
एक्स-पार्टी कार्यवाही तभी हो सकती है, जब न्यायालय पूरी तरह संतुष्ट हो जाए कि प्रतिवादी को वास्तव में समन की जानकारी थी।
केवल प्रक्रिया सर्वर की रिपोर्ट पर भरोसा कर लेना, बिना उसकी जांच किए, न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है।
कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को सुने बिना उसके अधिकारों पर निर्णय लेना कानून का उद्देश्य नहीं हो सकता।
कोर्ट ने यह भी माना कि प्रतिवादियों द्वारा आदेश 9 नियम 13 सीपीसी के तहत एक्स-पार्टी डिक्री निरस्त करने का आवेदन देरी से दाखिल किया गया था, लेकिन देरी के कारण संतोषजनक रूप से स्पष्ट किए गए थे।
एक्स-पार्टी डिक्री रद्द, लेकिन शर्तों के साथ
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 9 अप्रैल 2019 के आदेश और 23 दिसंबर 2011 की एक्स-पार्टी डिक्री दोनों को रद्द करते हुए मामला पुनः ट्रायल कोर्ट को भेजने का आदेश दिया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों पर 15 दिन में वादकारियों को ₹25,000 की लागत अदा करने का भी आदेश दिया।
याचिकाकर्ता/प्रतिवादी 25 छायादार पेड़ सार्वजनिक स्थान पर लगाएंगे और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी भी निभाएंगे।
लगाए गए पेड़ों की तस्वीरें और शपथ-पत्र समय-समय पर ट्रायल कोर्ट में प्रस्तुत करने होंगे।
समन (Summons) एक कानूनी नोटिस होता है, जिसमें कोर्ट किसी व्यक्ति को एक तय तारीख पर अदालत में हाज़िर होने का आदेश देती है – चाहे वह केस का पक्षकार हो या गवाह। समन मिलने के बाद व्यक्ति को कोर्ट के निर्देशों का पालन करना ज़रूरी होता है, वरना उसके खिलाफ वारंट या अन्य कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।