नई दिल्ली: नौकरी पाने के लिए इस्तेमाल किया गया ST सर्टिफिकेट बाद में गलत साबित हो जाए, तो क्या कर्मचारी की सालों की सेवा और रिटायरमेंट के सारे फायदे भी खत्म हो जाएंगे?
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम मामले में इसका जवाब दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ जाति प्रमाण पत्र गलत पाए जाने से सालों की सेवा और रिटायरमेंट के हक खत्म नहीं हो जाते।
मामले की पूरी परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने लंबी सेवा के बाद रिटायर हुए इंजीनियर को पेंशन की राहत दी।
इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के एक रिटायर्ड इंजीनियर के मामले में उसे पेंशन और दूसरे रिटायरमेंट बेनिफिट्स देने की राहत दे दी।
मामला शिरीष पी. पाटिल का है, जिन्होंने ST कैटेगरी के सर्टिफिकेट के आधार पर 1994 में MCGM में जूनियर इंजीनियर के तौर पर नौकरी शुरू की थी।
बाद में जांच में उनका ST दावा सही नहीं पाया गया और सर्टिफिकेट अमान्य कर दिया गया।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने तक पाटिल 30 साल से ज्यादा समय तक नौकरी कर चुके थे और रिटायर भी हो चुके थे।
इसी लंबी सेवा और मामले की खास परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने उनके रिटायरमेंट बेनिफिट्स को लेकर अलग रुख अपनाया।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने उन्हें पेंशन और दूसरे रिटायरमेंट लाभ देने का रास्ता साफ किया। हालांकि, कोर्ट ने उनके ST दावे को सही नहीं माना।
पहले समझिए, मामला क्या था
याचिकाकर्ता शिरीष पी. पाटिल को 1984 में ‘टोकरे कोली’ ST का सर्टिफिकेट मिला था।
इसी सर्टिफिकेट के आधार पर उन्हें 21 अक्टूबर 1994 को बृहन्मुंबई नगर निगम (MCGM) में जूनियर इंजीनियर की नौकरी मिली।
बाद में उनके जाति सर्टिफिकेट की जांच शुरू हुई। पुराने रिकॉर्ड में उनके परिवार की जाति ‘कोली’, ‘हिंदू कोली’ और ‘हिंदू सूर्यवंशी कोली’ दर्ज मिली। इसके बाद उनके ST दावे पर सवाल उठे।
जुलाई 2009 में उन्हें शो कॉज नोटिस भी दिया गया। लंबी जांच के बाद स्क्रूटिनी कमेटी ने जुलाई 2020 में उनका ST सर्टिफिकेट अमान्य कर दिया।
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हाईकोर्ट ने भी सर्टिफिकेट अमान्य माना
स्क्रूटिनी कमेटी के फैसले के खिलाफ पाटिल बांबे हाईकोर्ट पहुंचे। उन्होंने जांच और रिकॉर्ड को लेकर कई दलीलें दीं।
लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने माना कि स्क्रूटिनी कमेटी का फैसला सही था और पाटिल का ST क्लेम स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी ST दावा सही नहीं माना
सुप्रीम कोर्ट ने भी स्क्रूटिनी कमेटी और हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने की जरूरत नहीं समझी।
यानी यहां सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि पाटिल का ST सर्टिफिकेट सही था। उनके सर्टिफिकेट को अमान्य करने वाला फैसला कायम रहा।
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। उस समय तक पाटिल 30 जून 2025 को रिटायर हो चुके थे।
यहीं से सवाल उठा कि तीन दशक से ज्यादा की सेवा के बाद रिटायर हो चुके कर्मचारी के पेंशन और रियारमेंट बेनिफिट्स का क्या होगा?
लंबी सेवा को सुप्रीम कोर्ट ने माना अहम
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पाटिल की पूरी स्थिति को देखा। उन्होंने 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक सेवा की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह करीब तीन दशक से ज्यादा की लंबी सेवा है और कर्मचारी अब रिटायर भी हो चुका है।
ऐसे में मामले की इन खास परिस्थितियों को देखते हुए उसे सीमित राहत दी जा सकती है।
इसी आधार पर कोर्ट ने Article 142 के तहत अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया और पाटिल की सेवा को पेंशन और दूसरे रियाटरमेंट की गणना के लिए सुरक्षित रखा।
पेंशन की राहत का मतलब क्या है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सीधा मतलब यह है कि पाटिल की 1994 से 2025 तक की सेवा को रिटायरमेंट और पेंशन बेनिफिट्स के लिए माना जाएगा।
उन्हें लागू नियमों के मुताबिक पेंशन और दूसरे रिटायरमेंट लाभ दिए जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इन लाभों की प्रक्रिया फैसले की तारीख से छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है।
लेकिन यहां एक बात साफ है। पेंशन देने का मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके ST दावे को सही मान लिया है।
ST सर्टिफिकेट से आगे कोई फायदा नहीं
सुप्रीम कोर्ट की दी गई राहत सिर्फ पेंशन और रिटायरमेंट लाभों तक सीमित है। इसका इस्तेमाल पाटिल अपने ST दावे को सही साबित करने के लिए नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि पाटिल या उनके परिवार का कोई सदस्य अमान्य ST सर्टिफिकेट के आधार पर भविष्य में किसी लाभ का दावा नहीं कर सकता।
यानी सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दोनों बातों को अलग-अलग देखा।
एक तरफ ST सर्टिफिकेट को अमान्य करने वाला फैसला बरकरार रखा, वहीं दूसरी तरफ पाटिल की लंबी सेवा और रिटायरमेंट को देखते हुए पेंशन और दूसरे रिटायरमेंट लाभ देने की राहत दी।
इसका मतलब ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके ST दावे को सही नहीं माना।
राहत सिर्फ इस खास मामले की परिस्थितियों को देखते हुए दी गई, ताकि तीन दशक से ज्यादा की सेवा के बाद रिटायर हुए कर्मचारी के पेंशन और रिटायरमेंट लाभ सुरक्षित रह सकें।